चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की प्रचार टीम में वापसी की चर्चाएं हैं. प्रशांत किशोर ने 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त नरेंद्र मोदी के साथ काम शुरू किया था. 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी के प्रचार अभियान की बागडोर भी प्रशांत किशोर के हाथ में ही थी. लेकिन बाद में उन्होंने रास्ता बदल लिया. कहा गया कि इसकी वजह अमित शाह के साथ उनके मतभेद थे.

बाद में प्रशांत किशोर ने बिहार में नीतीश कुमार के साथ काम किया और पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ. जिस वक्त प्रशांत किशोर ने इन दोनों नेताओं के साथ काम किया, उस वक्त इन दोनों नेताओं की पहचान मोदी विरोधी नेता की थी. लेकिन अब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के पद पर भाजपा के समर्थन से हैं और कहना गलत नहीं होगा कि आज वे नरेंद्र मोदी के खेमे में हैं.

बिहार में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के असंभव सरीखे गठबंधन को 2015 में कामयाबी दिलाने में प्रशांत किशोर की अहम भूमिका मानी गई थी. इसके बाद उनके बारे में चर्चा यह भी चली थी कि वे कांग्रेस के साथ फुल टाइम काम करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से उनकी मेल-मुलाकात भी बढ़ी और उत्तर प्रदेश में उन्हें कुछ जिम्मेदारी दी भी गई, लेकिन कांग्रेस में प्रशांत चल नहीं पाए. बीच में यह खबर भी आई कि वे आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी के साथ काम कर रहे हैं.

अब खबर आ रही है कि प्रशांत किशोर एक बार फिर से मोदी की प्रचार टीम में लौट सकते हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि इस सिलसिले में प्रशांत नरेंद्र मोदी के संपर्क में हैं. पिछले छह महीने में दोनों के बीच कुछ मुलाकातों की चर्चा भी है. कहा तो यह भी जा रहा है कि प्रशांत किशोर और अमित शाह के बीच भी बातचीत हुई है और दोनों अपने पुराने मतभेदों को भुलाकर मोदी की टीम में फिर से एक साथ काम करने की दिशा में काम कर रहे हैं.

लेकिन सवाल यह उठता है कि चुनावी रणनीति के मामले में भाजपा के अंदर चाणक्य की पहचान बनाने वाले अमित शाह के रहते हुए नरेंद्र मोदी को प्रशांत किशोर की जरूरत क्यों पड़ी. इसकी दो-तीन वजहें नजर आती हैं.

पहली बात तो यह है कि गुजरात में जिस तरह का चुनाव प्रबंधन अमित शाह ने किया उससे भाजपा को आखिरी दिनों में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. एक बार तो ​स्थिति ऐसी बनती लगने लगी कि भाजपा के लिए गुजरात में फिर से सरकार बनाना काफी मुश्किल लगने लगा. गुजरात भाजपा के नेताओं की आपसी बातचीत में इस स्थिति के लिए अमित शाह के कुप्रबंधन को जिम्मेदार माना जा रहा था.

2016 में आनंदीबेन पटेल की जगह विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाते वक्त अमित शाह ने नरेंद्र मोदी को गुजरात की जीत के प्रति आश्वस्त किया था. लेकिन​ विधानसभा चुनावों में पार्टी की खराब स्थिति को देखते हुए अंत में वहां पूरी तरह से नरेंद्र मोदी को जुटना पड़ा. तब जाकर वहां भाजपा की सरकार बची. नरेंद्र मोदी ऐसी स्थिति अगले लोकसभा चुनावों के लिए बिल्कुल नहीं चाहेंगे क्योंकि गुजरात में तो उन्होंने आखिरी समय पर स्थिति संभाल ली, लेकिन लोकसभा चुनावों में कुछ गड़बड़ होता है तो आखिरी समय में उसे संभालना असंभव जैसा होगा. इसलिए 2019 के लोकसभा चुनावों में जीत के लिए नरेंद्र मोदी प्रशांत किशोर को लाकर अपनी टीम मजबूत करना चाह रहे होंगे.

दूसरी वजह यह कही जा रही है कि अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा अपने बूते बहुमत पाती नहीं दिख रही. ऐसे में नरेंद्र मोदी कोई जोखिम नहीं लेते हुए अपनी तैयारियों को पूरी तरह चाक-चौबंद रखना चाहते हैं. अभी की स्थिति यह है कि मोदी चुनावी रणनीति के मामले में अमित शाह पर और राजनीतिक प्रबंधन के लिए अरुण जेटली पर पूरी तरह निर्भर हैं. ऐसे में अगर प्रशांत किशोर आते हैं तो इस मोर्चे पर नरेंद्र मोदी के पास अतिरिक्त विकल्प रहेगा.

तीसरी वजह यह बताई जा रही है कि प्रशांत किशोर के भाजपा खेमे से जाने के बाद पार्टी ने कुछ चुनावी रणनीतिकारों को आजमाया. इनमें रजत शेट्ठी का प्रमुख नाम है. लेकिन भाजपा के अंदर यह बात चल रही है कि प्रशांत ​के मुकाबले इन लोगों का प्रदर्शन उतना प्रभावी नहीं है. ऐसे में प्रशांत किशोर नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए एक बार फिर से प्रासंगिक हो जाते हैं.

भाजपा के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘प्रशांत किशोर की सेवाओं की बात करें तो वे अपने काम की वजह से हर पार्टी के लिए उपयोगी हैं लेकिन भाजपा के साथ उन्हें जोड़ने का निर्णय सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ही ले सकते हैं.’ और जिन वजहों का जिक्र पहले किया गया है, उन्हें देखते हुए अगर एक बार फिर से प्रशांत किशोर नरेंद्र मोदी के लिए काम करते नजर आएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.