शी जिनपिंग चीन के स्थायी राष्ट्रपति बन गए हैं. रविवार को चीनी संसद नेशनल पीपल्स कांग्रेस ने उस संविधान संशोधन को मंजूरी दे दी जिसमें राष्ट्रपति के लगातार दो कार्यकाल (10 साल) की अधिकतम सीमा को खत्म करने की बात कही गई है. रविवार को संसद में हुए गुप्त मतदान में 2,958 प्रतिनिधियों ने संशोधन के पक्ष में मतदान किया. जबकि दो प्रतिनिधियों ने विरोध में वोट डाला और तीन ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया. हालांकि, नेशनल पीपल्स कांग्रेस द्वारा इन बदलावों को स्वीकार किए जाने की प्रबल संभावना पहले से ही जताई जा रही थी क्योंकि उसने आज तक चीनी राष्ट्रपति की किसी इच्छा के विपरीत काम नहीं किया है.

इस प्रस्ताव के पास होने के बाद अब ये तय हो गया है कि शी जिनपिंग 2023 में खत्म हो रहे अपने दूसरे कार्यकाल के बाद भी इस पद पर बने रहेंगे. यानी जिनपिंग चीनी क्रांति के जनक रहे माओ त्से तुंग के बाद चीन के दूसरे स्थायी राष्ट्रपति होंगे. यूं भी कहा जा सकता है कि अब चीन में उनका दर्जा राजा जैसा हो गया है.

दुनियाभर के जानकार शी जिनपिंग का कार्यकाल बढ़ने को भारत के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं. इनके मुताबिक अगर जिनपिंग के अब तक के कार्यकाल को देखें तो भारत के चीन के साथ संबंध खराब ही हुए हैं. डोकलाम विवाद हो या फिर चीन की महत्वाकांक्षी ‘वन वेल्ट वन रोड’ परियोजना, भारत के लिए जिनपिंग ने हर जगह मुश्किलें ही बढ़ाई हैं. इन नीतियों के चलते ही भारत के कई करीबी देश भी उससे दूर होते जा रहे हैं. जानकार ऐसा होने का कारण भी ‘वन वेल्ट वन रोड’ परियोजना को ही मानते हैं जिसकी सफलता के लिए जिनपिंग कुछ भी करने को तैयार हैं.

कूटनीति के कई जानकारों का यह भी मानना है कि जिनपिंग की ताकत में बढ़ोत्तरी केवल भारत ही नहीं बल्कि पूर्वी चीन सागर और दक्षिण चीन सागर में स्थित कई देशों के लिए भी चिंता की बात है क्योंकि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद से चीनी सेना इन क्षेत्रों में ज्यादा ही आक्रामक रुख अपनाए हुए है.

शी जिनपिंग का कार्यकाल चीन में मानवाधिकारों के मामले में भी खासा बदनाम रहा है. यही वजह है कि चीन के साथ-साथ पूरी दुनिया के सामाजिक कार्यकर्ता उनके स्थायी राष्ट्रपति बनने की कोशिश को आशंकित होकर देख रहे हैं. हालांकि एक बड़ा तबका इसे चीन के लिए फायदेमंद ही मानता है. ऐसे लोगों की एक दलील है कि जिनपिंग के कार्यकाल में आर्थिक सुधार और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बड़ा अभियान चलाया गया जिससे चीन में काफी सुधार देखने को मिला. उनसे आगे भी ऐसी ही उम्मीद की जा रही है.

न्यूयॉर्क के एशिया सोसायटी संस्थान में चीनी मामलों के विशेषज्ञ ओर्विल स्कील एक साक्षात्कार में कहते हैं कि शी जिनपिंग एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं जिनकी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा यूरोपीय देशों को पछाड़कर चीन को दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बनाना है. यही वजह है कि जिनपिंग के आने के बाद चीन ने ‘वन बेल्ट वन रोड’ सहित दुनियाभर में कई बड़ी परियोजनाएं शुरू की हैं. स्कील के मुताबिक ऐसे में जाहिर है कि अगर जिनपिंग लंबे समय तक राष्ट्रपति बने रहे तो चीन की इन परियोजनाओं के सफल होने की गारंटी बढ़ जाएगी.

हालांकि, कुछ जानकार कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को माओ त्से तुंग के समय की याद दिलाते हुए उससे सबक लेने की सलाह भी देते हैं. चीनी क्रांति के जनक रहे माओ 1949 से 1976 में अपनी मृत्यु होने तक चीन के राष्ट्रपति रहे थे. इस दौरान उनके कई तानाशाही फैसलों की कीमत चीनी अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ी थी और इनको करोड़ों लोगों की असमय मौत के लिए जिम्मेदार भी ठहराया जाता है.

ये विशेषज्ञ कहते हैं कि माओ भी चीनी अस्मिता और राष्ट्रवाद के सशक्त समर्थक थे और चीन में बड़ा परिवर्तन लाने के लिए कटिबद्ध थे. लेकिन, उनकी ‘द ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ की नीति, जिसके तहत वे कृषि प्रधान देश को औद्योगिक राष्ट्र में बदलना चाहते थे, का उल्टा प्रभाव देखने को मिला. इस नीति के चलते ही लाखों ग्रामीणों की भुखमरी से मौत हुई थी.

इसके अलावा माओ की सांस्कृतिक क्रांति की विफलता और इसके नाम पर सालों तक जिस तरह से देशभर में लोगों को यातनाएं दी गई वह किसी त्रासदी से कम नहीं था. यही कारण था कि माओ के शासन से सबक लेकर चीन के सुधारवादी नेता डेंग ज़ियाओपिंग ने अधिकतम 10 साल के कार्यकाल का प्रावधान चीनी संविधान में जोड़ा था. 1982 से 1987 तक कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख रहे ज़ियाओपिंग का मानना था इस बदलाव के बाद चीन में अतीत की त्रासदियों के दोहराव की आशंका खत्म हो जाएगी.