उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान जारी किए गए भारतीय जनता पार्टी के संकल्प पत्र में कई बातें थीं. इनमें से एक थी राज्य में समाजवादी सरकार के दौरान सरकारी संरक्षण में चल रहे अवैध खनन को पूरी तरह से बंद करने के साथ साथ खनन माफिया पर पूरी तरह अंकुश लगाने की घोषणा. भारी बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ ने भी अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसी बात को दोहराते हुए राज्य को अवैध खनन से निजात दिलाने का वादा किया था.

मगर एक साल पूरा होने के बाद भी स्थितियां जस की तस हैं. बल्कि व्यावहारिक तौर पर देखा जाय तो आम लोगों की तकलीफें पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं. भवन निर्माण सामग्री के दामों में भी कोई खास गिरावट नहीं आई. खनन माफिया की हरकतें भी ज्यादा बेलगाम हो गई हैं. नई सरकार माफिया पर अंकुश लगाने में इस कदर असफल दिख रही है कि अब कई इलाकों में ग्रामीणों से खनन माफिया का सीधा टकराव शुरू हो गया है.

बागपत को ही लें. यहां के निवाड़ा थाना क्षेत्र में इन दिनों किसान खनन माफिया के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के लिए लामबंद हो रहे हैं. बागपत में खनन माफिया का विरोध करने पर खनन कर रहे गुंडों ने अंधाधुंध फायरिंग की थी जिससे कई किसान घायल हो गए. इस पर किसान भड़क गए और उन्होंने तोड़फोड़ शुरू कर दी. अब किसानों ने पंचायत कर फैसला किया है कि चाहे उनकी जान चली जाए पर वे अब वहां अवैध खनन नहीं होने देंगे.

फरवरी के अंतिम हफ्ते में एक और अहम खबर आई. राज्य के महाराजगंज जिले की फरेंदा तहसील के एसडीएम आरबी सिंह को अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई के लिए छापामारी के दौरान कुचल कर मार डालने का प्रयास किया गया. वे स्थानीय पुलिस के साथ बरातगाढ़ा इलाके में अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई के लिए गए थे. लेकिन खनन माफिया ने उन्हें ठीक उसी तरह से कुचल कर मार डालने का प्रयास किया जिस तरह 2009 में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की हत्या ट्रैक्टर से कुचल कर की गई थी.

इससे पहले बीती 31 दिसंबर को आई एक खबर ने भी सबका ध्यान खींचा था. लखनऊ में एक शख्स अचानक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के काफिले के सामने कूद गया था. श्याम मिश्रा नाम के इस युवक का आरोप था कि सोनभद्र में भाजपा विधायक और जिलाध्यक्ष अवैध खनन में शामिल हैं और उसकी शिकायत की कहीं सुनवाई नहीं हो रही.

खनन राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा

उत्तर प्रदेश में खनन का काला कारोबार राज्य की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन चुका है. बसपा सरकार में मायावती के घरेलू सेवक से मंत्री बने बाबूसिंह कुशवाहा और अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार में गरीबी की रेखा से नीचे वाली पारिवारिक पृष्ठभूमि से खनन मंत्री बने गायत्री प्रसाद प्रजापति की राजनीतिक हैसियत अपनी अपनी सरकारों में सबसे महत्वपूर्ण मंत्रियों जैसी हो गई थी. दोनों मंत्रियों ने अपनी अपनी सरकारों में खनन के काले कारोबार में अकूत सम्पदा कमाई और अपने राजनीतिक आकाओं को भी कमवाई. यह अलग बात है कि ये दोनों अलग अलग कारणों से अभी जेल में है. लेकिन खनन के अवैध कारोबार के लिए इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई उल्टे सरकारों की ओर से इन्हें संरक्षण ही दिया गया.

अखिलेश सरकार के काल में खनन की अवैध कारगुजारियों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में शिकायत हुई थी. अदालत ने खनन के गोरखधंधे की सीबीआई जांच के आदेश दिए तो राज्य सरकार इससे खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. 2013 के एक आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खनन के नए आवेदनों की मंजूरी पर रोक लगा दी थी, फिर भी अवैध खनन रुका नहीं और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचने के साथ सरकारी खजाने को भी चपत लगती रही. जिले जिले में खनन के काले कारोबारी अरबपति बनते रहे और अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ाते रहे.

नई नीति

इसीलिए 2017 के विधानसभा चुनाव में अवैध खनन एक बड़ा मुद्दा था और भाजपा ने उसे खूब हवा भी दी थी. सरकार बनने के बाद पार्टी ने उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में तीन मंत्रियों की एक समिति बना कर उत्तर प्रदेश के लिए नई खनन नीति का प्रस्ताव तैयार किया. इलाहाबाद हाईकोर्ट की सहमति के बाद 30 मई 2017 को नई खनन नीति की घोषणा की गई. इस नीति में ईंट भट्टों के लिए मिट्टी खनन, सरकारी निर्माण कार्यों के लिए मिट्टी खनन, रेत, मोरंग आदि उपखनिजों तथा इमारती पत्थर व ग्रेनाइट आदि के खनन के लिए नई व्यवस्था लाई गई. खनन पट्टों के लिए ई टेंडरिंग व्यवस्था लागू की गई. अवैध खनन अपराधों के लिए त्वरित न्यायालय गठित करने की बात भी इस नीति में थी.

नई नीति में अवैध खनन पर प्रति हेक्टेयर जुर्माना 25 हजार से बढ़ा कर पांच लाख रु और अधिकतम सजा छह महीने से बढ़ा कर पांच साल करने की भी बात कही गई थी. इस नीति के जरिए राज्य के कुल राजस्व में खनन की आय का हिस्सा 1.3 फीसदी से बढ़ा कर तीन फीसदी करने का लक्ष्य भी रखा गया था. इस नीति के तहत जिलाधिकारियों के अधिकार बढ़ाए गए थे और ओवर लोडिंग पर रोक की भी बात की गई थी.

हालात और उलझे

नई नीति में ई टेंडरिंग के जरिए माफिया पर रोक लगाने की बात भी कही गई थी लेकिन दिसंबर 2017 में इसके लागू होने के बाद से स्थितियां और उलझ गई हैं. ई टेंडरिंग के कारण दूसरे राज्यों से खनन के और बड़े खिलाड़ी उत्तर प्रदेश में पहुंच गए हैं. बड़े खिलाड़ियों ने टेंडर की दरें मौजूदा दरों से तीन से चार गुना ज्यादा भरी हैं. इसके कारण पहले से काला कारोबार कर रहे स्थानीय खिलाड़ी बेरोजगार हो गए हैं, लेकिन हर महीने करोड़ों की कमाई कर रहे ये पुराने धंधेबाज अब नए इलाकों में अवैध खनन करने लगे हैं और सरकार की नीति को मुंह चिढ़ा कर अपनी कमाई बरकरार रखने में जुट गए हैं. जाहिर है इस काम में उन्हें स्थानीय पुलिस से लेकर राजनेताओं तक का सहयोग मिल रहा है.

खनन माफिया की धमक इसी बात से समझी जा सकती है कि बागपत में भाजपा विधायक और पार्टी के ही एक दूसरे नेता के हितों का टकराव किसानों से ताजा संघर्ष का कारण बना है. बलिया के बीजेपी विधायक सुरेंद्र सिंह खुले आम सार्वजनिक मंच से कहते हैं कि ‘कोई पुलिस वाला खनन करने से रोके तो उसे चार थप्पड़ मारो. कोई पुलिस वाला रोक नहीं सकता’. इसी तरह राजस्व बढ़ाने के लिए कई जिलों में संवेदनशील इलाकों में भी खनन पट्टे दिए जा रहे हैं. कुशीनगर जिले में तो गंडक के अहिरौलीदान-पिपराघाट के तटबन्ध पर खनन पट्टा जारी करने के खिलाफ बाढ़ अनुसंधान के मुख्य अभियन्ता ने राज्य सरकार को पत्र लिख कर पट्टा रद्द करने की मांग तक कर डाली है. इसी तरह की शिकायतें अन्य कई जिलों से भी आ रही हैं.

हालांकि सरकार ने अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए ओवर लोडिंग के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया है लेकिन, पुराने खिलाड़ी इससे बचने के लिए नए तरीके ईजाद कर रहे हैं. झांसी मे गठौरा क्षेत्र में जिला प्रशासन ने नदी तट से अवैध खनन रोकने के लिए बालू लाने वाले रास्तों में मशीनों से बड़े गड्ढे खुदवा दिए ताकि ट्रकों की आवाजाही बन्द हो जाए. योगी सरकार ने अवैध खनन के खिलाफ छापेमारी भी तेज की है. लेकिन स्थानीय प्रशासन और पुलिस के बीच तालमेल न होने और नाम मात्र को काम कर रहे खनिज विभाग की लचर कार्रवाई के चलते इसका कोई प्रभावी असर दिख नहीं रहा.

योगी सरकार के लिए यह मुद्दा गले की हड्डी बनता जा रहा है क्योंकि मौजूदा सरकार में खुद योगी आदित्यनाथ के पास ही खनन विभाग की जिम्मेदारी है. जबकि खनन के काले कारोबारी और उनके चेले नई सरकार में या तो चोला बदल कर भगवा हो गए हैं या फिर उन्होंने आसानी से अमीर बनने के प्रलोभन के जरिए सत्ता के रंग वाले लोगों को अपने साथ जोड़ लिया है. कांग्रेस के विधायक और विधानमंडल दल के नेता अजय कुमार लल्लू कहते हैं, ‘इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा अखिलेश सरकार के दौरान रामपुर में अवैध खनन पर कार्रवाई न करने के आरोप में वर्तमान में गोरखपुर के डीएम राजीव रौतेला और कानपुर देहात के डीएम राजेश कुमार प्रथम के खिलाफ बड़ी र्कारवाई का आदेश दिया गया था. उस पर योगी सरकार दो महीने तक चुप्पी साधे रही. अब फिर जब हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है तो 26 फरवरी को उन्हें आरोप पत्र दिया गया. ये सरकार अवैध खनन रोकने में कितनी गम्भीर है इसका पता इस बात से चल जाता है.’

राज्य सरकार बालू-मोरंग आदि के दामों में पिछले डेढ़ वर्ष में हुई तीन गुने से ज्यादा वृद्धि को रोक भी नहीं पा रही है. न ही वह खनन माफिया पर नकेल कस सकी है. हालांकि सरकार अब भी दावा कर रही है कि वह हर हाल में अवैध खनन बन्द करके दम लेगी, मगर खनन माफिया को उम्मीद है कि उसके लिए अच्छे दिन आने वाले हैं. इसलिए कि उत्तर प्रदेश समिट के बाद राज्य में होने जा रहे सम्भावित निर्माण कार्यों के लिए निर्माण सामग्री का एक लाख करोड़ से ज्यादा का कारोबार होना है. खनन माफिया के अच्छे दिन आने के सपने पर कैसे पानी फेरा जाये यह योगी सरकार के लिए यह निश्चित ही एक बड़ी चुनौती है.