पूर्वोत्तर में वाम दलों का सबसे बड़ा गढ़ त्रिपुरा दरकता दिख रहा है. बीच के 11 साल (1972-77 और 1988-1993) को छोड़ दें तो इस राज्य मेंं 1978 से ही वाम दलों की सरकार है. इसमें भी 1993 से तो लगातार. और मौज़ूदा मुख्यमंत्री माणिक सरकार 1998 से इस पद पर हैं. लेकिन इस बार ‘सरकार’ बदलती दिख रही है. देश में पहली बार किसी राज्य में वाम दलों और भारतीय जनता पार्टी का सीधा चुनावी मुकाबला हुआ है. इसमें भाजपा ने बढ़त बनाई हुई है.

राज्य में इस वक़्त हालिया विधानसभा चुनाव के वोटों की गिनती चल रही है. ख़बरों के मुताबिक विधानसभा की 60 में 35 सीटों पर भाजपा और 24 पर वाम दलों ने बढ़त बनाई हुई है. यहां 59 सीटों पर ही 18 फरवरी को वोट डाले गए थे. एक सीट पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के उम्मीदवार का निधन हो जाने से चुनाव स्थगित हो गया था. त्रिपुरा के अलावा नगालैड और मेघालय में भी वोटों की गिनती चल रही है.

मेघालय में कांग्रेस 15 साल से सरकार चला रही है. लेकिन इस बार उसका सिंहासन भी डांवाडोल है. राज्य की 60 में 56 सीटों के रुझान अब तक सामने आ चुके हैं. इनमें कांग्रेस 22 पर आगे है. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष (दिवंगत) पीए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) 15 सीटों पर आगे चल रही है. भाजपा छह सीटों पर आगे है. एनपीपी और भाजपा दोनों सहयोगी पार्टियां हैं. बाकी सीटें अन्य को जाती दिख रही हैं.

नगालैंड में भी भाजपा और उसकी सहयोगी एनडीपीपी (नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी) अब तक सत्ताधारी एनपीएफ (नगालैंड पीपुल्स फ्रंट) को कड़ी टक्कर दे रही है. यहां भी विधानसभा की 60 सीटें हैं. इनमें से 59 के रुझान आ चुके हैं. अब तक एनपीएफ 28 और एनडीपीपी-भाजपा 29 सीटों पर आगे चल रही है. बाकी सीटों पर अन्य आगे हैं. नगालैंड में उग्रवादी संगठनों के बहिष्कार के आह्वान के बावज़ूद चुनाव हुए हैं.