पिछले साल जब लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में जेल की सजा सुनाई गई तो इसे दलित बनाम सवर्ण की लड़ाई के तौर पर पेश करने की कोशिश भी की गई. एक वर्ग का कहना था कि पिछड़ा वर्ग से होने के कारण लालू यादव को सजा हुई और अगड़ी जाति से आने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र इस मामले में बरी कर दिए गए. वहीं दूसरे वर्ग ने इसे राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी जीत बताया.

दोनों तरफ वालों के अपने-अपने तर्क हो सकते हैं. लेकिन आजाद भारत के इतिहास में झांकें तो कई मौके आए हैं जब पिछड़ों और दलितों को न्याय की दहलीज़ पर भी न्याय नहीं मिला. 1968 में भी एक ऐसी ही घटना हुई थी. उस साल 25 दिसंबर की रात तमिलनाडु के थंजावुर जिले के किल्वेंमनी गांव में 44 दलितों को जलाकर मार दिया गया था. मरने वालों में कई औरतें और बच्चे भी शामिल थे. हत्यारों में से किसी एक को भी सज़ा नहीं हुई.

दरअसल, यह सदियों से चली आ रही, ब्राह्मण बनाम दलित वर्चस्व की लड़ाई का एक और पड़ाव था. इसको समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना होगा.

दक्षिण का सामाजिक परिवेश

300 से लेकर 750 ईसवी तक दक्षिण भारत में ब्राह्मणवाद का उत्थान हुआ. कांची के पल्लव, बादामी के चालुक्य और मदुरै के पंड्या वंशजों ने ब्राहमणों और मंदिरों को ख़ुश रखने के चक्कर में अपना सब कुछ झोंक दिया. उन्हें सोने और सिक्कों के अलावा टैक्स फ्री ज़मीनें और मवेशियों का दान दिया जाता था. इसके चलते कई इलाक़े खेती के लिए विकसित किये गए.

नतीजा यह हुआ कि ज़मीन पर ब्राह्मणों का एकाधिकार हो गया. खेतिहर किसान नीची जाति के हिंदू रहे. इनमें से कुछ बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गए थे. ब्राहमणों और उनके बीच खाई काफी चौड़ी हो गई. विद्रोह के सुर तभी से फूटने लगे थे. मशहूर इतिहासकार आरएस शर्मा ‘इंडियास एनशेंट पास्ट’ में इसी दौरान हुए ‘कालभ्र’ विद्रोह का ज़िक्र करते हैं. कालभ्र जनजातीय लोग थे जिन्होंने चोल राज्य के तटीय इलाक़ों से ब्राह्मणों और राजा की शक्ति को उखाड़कर फ़ेंक दिया था. इन लोगों ने ब्राह्मणों और मंदिरों को मिलने वाले अनुदान बंद कर दिये. यह इतना ज़बरदस्त विद्रोह था कि इसको कुचलने के लिए पल्लव, पंड्या और चालुक्य राजाओं को एक साथ मिलकर लड़ना पड़ा.

आरएस शर्मा लिखते हैं कि दक्षिण के राजा खुद को ब्राह्मण कहलवाना अधिक पसंद करते थे. इसके लिए वे पुरोहितों को ख़ुश रखते. राजपूत राजा ब्राह्मण राजा से कमतर आंका जाता था.

चौथा आम चुनाव और दलितों का उदय

1967 के आम चुनाव के बाद स्थानीय राजनैतिक पार्टियों का मजबूती से उदय हुआ. तमिलनाडु में सामाजिक सुधार का बिगुल फूंकने वाले ईवी रामास्वामी उर्फ़ ‘पेरियार’ से प्रभावित द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने बहुमत लेकर अन्नादुरई के नेतृत्व में सरकार बनाई थी. यह देश का पहला राज्य बना था जहां बिना पंडितों की मौजूदगी वाली शादियों को सरकार ने मान्यता प्रदान की. यहां कम्युनिस्ट पार्टी का भी बोलबाला था. ऐसा लगने लगा था कि सामजिक एकरूपता अब हकीक़त बन जाएगी.

दक्षिण में अनाज क्रांति और किसानों का विद्रोह

यही वह दौर भी था जब हरित क्रांति का असर धीरे-धीरे पूरे देश में पड़ने लगा था. तमिलनाडु जो कावेरी नदी से सिंचित राज्य है, वहां अनाज की पैदावार काफ़ी बढ़ गई थी जिससे ज़मीन मालिकों की आमदनी में कई गुना इज़ाफ़ा हो गया था. पर खेतिहर मजदूर की आर्थिक हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. तमिलनाडु में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की और किसान मजदूरों को अपने झंडे के नीचे एकजुट कर लिया. इनकी मांग थी कि मजदूरों की दिहाड़ी बढ़ाई जाए और उन्हें अन्य लाभ भी दिए जाएं. दिनों-दिन यह मांग तेज़ होती जा रही थी. बड़ी संख्या में मज़दूरों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया था.

उधर, ज़मींदारों ने दूसरे प्रांतों से मजदूर लाना शुरू कर दिया. मजदूरों ने जब यह देखा तो फसलों को अपने कब्ज़े में लेकर खेत मालिकों से मोल भाव शुरू कर दिया. बस, यहीं से ये आंदोलन ख़ूनी रंग लेने लगा. किल्वेंमनी गांव के एक दुकानदार, जिस पर मजदूरों का साथ देने का शक था, को ज़मींदारों के गुर्गे उठा ले गए. जब आंदोलनकारियों को मालूम हुआ तो दोनों पक्षों के बीच टकराव हुआ. मजदूर उस दुकानदार को तो छुड़ा लाये पर इस दौरान हिंसा में ज़मींदारों के एक गुर्गे की मौत हो गयी.

25 दिसंबर, 1968 की रात

घटना के प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से कई रिपोर्टों में जो बताया गया है वह सिहराने वाला है. रात तकरीबन 10 बजे का वक्त रहा होगा. हथियारों से लैस ज़मींदारों के गुंडे पुलिस की गाड़ियों में दलित बहुल किल्वेंमनी पहुंचे और उसे घेरकर फायरिंग शुरू कर दी. बचाव में दलितों ने पत्थरबाज़ी की. इस फ़साद में दो दलित मारे गए. कइयों ने भागकर एक छोटे से झोपड़े में शरण ली. फ़सादियों ने उसे घेरकर आग लगा दी. जो झोपड़े से बाहर निकले उन्हें मारकर इसी में फ़ेंक दिया गया. जलते झोपड़े में से कुछ औरतों ने अपने बच्चे खिड़की से बाहर फ़ेंक दिए ताकि वे बच जाएं. ज़मीदारों के आदमियों ने उन्हें फिर भीतर फ़ेंक दिया. आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि कुल मिलाकर 44 लोग जलकर मर गए. इनमें 23 बच्चे थे और 16 महिलाएं.

बताया जाता है कि इसके बाद हत्यारे पुलिस की गाड़ियों में ही बैठकर नज़दीक के थाने पहुंचे और खुद को जवाबी हिंसा से बचाने की पुलिस से गुहार लगाई. यह ऊंची जातियों के लोगों का रसूख था कि पुलिस ने उन्हें सुरक्षा भी प्रदान की.

बाद में क्या हुआ?

तत्कालीन मुख्यमंत्री सी अन्नादुरई ने अपने दो मंत्री अगले दिन घटनास्थल पर भेजे. उनमें से एक थे एम करुणानिधि. घटना की जांच हुई. ज़मींदार दोषी पाए गए और सभी को 10 साल की सजा हो गयी. दोषियों ने हाई कोर्ट में अपील की जिसने सभी को सुबूतों के अभाव के चलते बरी घोषित कर दिया. यानी, एक को भी सज़ा नहीं हुई. हालांकि इस घटना के बाद राज्य सरकार पर इस बात का दबाव आ गया कि वह दलितों के मुद्दों पर नए तरीके से सोचे. सरकार ने मंदिरों के पास जो ज़मीनें थीं, उन्हें दलितों में बांटना शुरू किया. एक लिहाज से देखा जाए यह उस वायकोम आंदोलन की परिणति भी थी जो दलितों के साथ भेदभाव के खिलाफ 1924 में शुरू हुआ था. कहते हैं कि इस घटना ने भारत की राजनीति में भी एक बड़े बदलाव की जमीन तैयार की. दलितों के मुद्दे राजनीति की मुख्य धारा में आने लगे.