दूरदर्शन एवं आकाशवाणी का काम देखने वाली संस्था प्रसार भारती और सूचना-प्रसारण मंत्रालय के बीच टकराव थम नहीं रहा है. बल्कि इसके और बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है.

द इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि मंत्रालय हर महीने प्रसार भारती के लिए 200 करोड़ रुपए का फंड जारी करता है. इसका अधिकांश पैसा प्रसार भारती के स्टाफ के वेतन पर खर्च होता है. लेकिन मंत्रालय ने बीते दिसंबर से यह पैसा जारी नहीं किया है. अब तक प्रसार भारती अपनी आपात निधि से कर्मचारियों को तनख़्वाह दे रहा था लेकिन अब उसका ख़जाना भी खाली हो चुका है. अप्रैल के अंत तक स्थिति गंभीर होने वाली है. प्रसार भारती के प्रमुख सूर्य प्रकाश अख़बार से बातचीत में इसकी पुष्टि करते हैं. उनके मुताबिक, ‘जहां तक कर्मचारियों के वेतन का ताल्लुक़ है तो मैं इस मामले को सरकार के उच्च स्तर पर तक ले जा चुका हूं.’

बताया जाता है कि प्रसार भारती और सूचना-प्रसारण मंत्रालय के बीच टकराव के दो-तीन कारण हैं. पहला- सरकार ने हाल में ही यह बंदोबस्त किया है कि सभी स्वायत्त संस्थान जिन्हें सरकार से सालाना पांच करोड़ रुपए से ज़्यादा की वित्तीय मदद मिलती है अपने-अपने प्रशासी मंत्रालयों के साथ सहमति पत्र (एमओयू) पर दस्तख़त करेंगे.’ बताते हैं कि इस प्रावधान के हिसाब से प्रसार भारती ने एमओयू का मसौदा तैयार किया. लेकिन इसमें सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने ऐसे संशोधन सुझा दिए जिन्हें करने के लिए प्रसार भारती तैयार नहीं है. इसलिए अब तक एमओयू पर दस्तख़त नहीं हो पाए. और इसी का बहाना लेकर मंत्रालय ने वित्तीय मदद रोक दी.

दूसरा मसला राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) से जुड़ा है. एनएफडीसी सीधे सूचना-प्रसारण मंत्रालय के तहत आता है. उसने 2017 में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफ़एफ़आई) आयोजित किया था. इसके उद्घाटन और समापन समारोह का ठेका एक निजी फर्म को दिया. फर्म को इस सेवा के एवज़ में 2.92 करोड़ रुपए का भुगतान होना है. मंत्रालय चाहता है कि यह पैसा दूरदर्शन अदा करे, जो कि प्रसार भारती के अधिकार क्षेत्र में आता है. बताते हैं कि दूरदर्शन ने यह पैसा देने से साफ़ मना कर दिया है. इसके अलावा प्रसार भारती के प्रमुख सूर्य प्रकाश के साथ भी सीधे तौर पर मंत्रालय का कई मसलों पर टकराव है जिससे ये हालात बने हैं.