आमतौर पर हम यह दावा करते रहे हैं कि साहित्य राजनीति का सशक्त और टिकाऊ प्रतिपक्ष है. लेकिन कई बार लगता है कि हमारे समय की राजनीति साहित्य को प्रभावित भी करती रहती है - अक्सर अवांछित ढंग से. जैसे इन दिनों राजनीति में बहुत कुछ को भुलाने का एक सुनियोजित षड्यंत्र ही चल रहा है जिससे अनेक छद्म और झूठ जन्म ले रहे हैं. साहित्य में भी अपने को अभूतपूर्व मानने-जताने का अद्भुत युवा उत्साह उमड़ रहा है. कई युवा लेखक इस तरह बरताव कर रहे हैं मानो कि उनके पहले के लेखकों ने कुछ ख़ास हासिल किया ही नहीं है और कुछ अद्वितीय करने की ज़िम्मेदारी उन पर आन पड़ी है. भूलना, जो कि अक्सर जानबूझकर होता है, एक तरह की चालाकी है अपनी कमतरी को अपने से ही छुपाने के लिए की गई. बड़बोलना जैसे साहित्य का एक तरह से प्रदूषण है, वैसे ही भूलना उसे अनैतिक बनाना.

भूलना अक्सर चुन-चुनकर होता है. विचारधारी लोग मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल को याद रखते हैं, शमशेर को संकोच से याद करते हैं और अज्ञेय को बिलकुल भूल जाते हैं. इसी सिलसिले में रघुवीर सहाय तो याद रखे जाते हैं लेकिन श्रीकान्त वर्मा, विजयदेव नारायण साही और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना भुला दिए गए हैं. सच्चाई तो यह है कि इस समय कविता में जो स्वतंत्रता, कुछ भी कह सकने की छूट और क्षमता है वह हमारा अपना अर्जन नहीं है. हमने भाषा और शिल्प में संघर्ष कर उसे अर्जित नहीं किया है: वह हमें संयोगवश इन पूर्ववर्तियों का उपहार है. उन्हें भुलाकर हम अपनी अपात्रता ही सामने लाते हैं. साहित्य की सार्थकता बल्कि उसका अस्तित्व ही स्मृति और कल्पना पर निर्भर होता है सच्चाई के अलावा. ऐसे समय में जब राजनीति भुलाने की मुहिम चला रही हो तो साहित्य का काम है याद दिलाना और दिग्भ्रम से बचाना.

अभी कवि-आलोचक-कथाकार प्रभात त्रिपाठी का फ़ोन आया. वे कह रहे थे कि इन दिनों शब्द का मर्म पहचानने की वृत्ति कम हो गई है. जिस त्रयी (श्रीकान्त वर्मा, विजयदेव नारायण साही और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना) का हमने ऊपर उल्लेख किया है उन्होंने सच्चाई के सत्व के अलावा शब्द के मर्म को पहचाना था. बल्कि उनके यहां सत्व मर्म में ही निवसता है. बजाय इसके कि हम उम्मीद करें कि दूसरे इस दिशा में कुछ करेंगे, हम ही अगले एक वर्ष में साहित्य की अपनी आधुनिक परम्परा की स्मृति उद्बुद्ध करने का एक लम्बा सिलसिला शुरू करने जा रहे हैं. एक आपत्ति कुछ करने के पहले यह उठायी जाएगी कि यही तीन क्यों? और हैं!

निश्चय ही हैं तो उनकी याद दिलाने का बीड़ा दूसरे बन्धु उठाएं. हम अपनी सीमाभर अपनी रुचिवश इन तीनों पर ही कुछ करने का इरादा रखते हैं और इस पर इसरार नहीं करते कि यही तीन स्मरणीय हैं. और भी निश्चय हैं ही.

कविता की हालत

कवियों की हालत इतनी ख़राब नहीं है जितनी कविता की. दिल्ली में संगीत, नृत्य, रंगमंच और ललित कला के रसिक पर्याप्त हैं पर कविता के नहीं. सिर्फ़ उर्दू कविता, ख़राब भावुक और हंसोड़ हिन्दी कविता के रसिक ज़रूर हैं. अंग्रेज़ी के भी रसिया बहुत हैं दिल्ली में. पर हिन्दी कविता को दिल्ली की रुचि होने का सौभाग्य नहीं मिल पाया है. यह तब जबकि पिछले पचास बरसों में हिन्दी के सबसे अधिक और ख़ासे बड़े लेखक दिल्ली में ही रहे हैं. इस अर्थ में दिल्ली किसी भी तरह से हिन्दी साहित्य की राजधानी नहीं है. शायद इस बिखरे-बिखरे साहित्य की कोई राजधानी नहीं है कहीं भी; शायद ही कभी रही हो. सिर्फ़ इलाहाबाद, बनारस, भोपाल, पटना, जयपुर, बीकानेर, उज्जैन आदि शहरों में अच्छी और महत्वपूर्ण, जटिल और सूक्ष्म कविता के रसिक हैं और कविता संबंधी आयोजनों में बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं.

दिल्ली एक सम्पन्न शहर है: उसमें चिकने-चुपड़े लोगों का वर्चस्व है. उसमें अपनी काव्य-विपन्नता का कोई एहसास नहीं है और न ही उसे ऐसी कोई कमी लगती है. दिल्ली में भाषागत दूरियां भी बहुत हैं. हिन्दी कविता के आयोजनों में शायद ही कोई अंग्रेज़ी या उर्दू कवि या इन भाषाओं का रसिक कविता सुनने वाला हो: उनके कवि भी अक्सर नहीं आते. यह कहना अतिशयोक्ति लग सकता है लेकिन सही है कि दिल्ली हिन्दी कविता के लिए अरण्य है. कुछ अचरज की बात यह है कि इसके बावजूद दिल्ली में हिन्दी की अनेक पीढ़ियों के कवि और आलोचक रहते हैं.

एक रुख़ यह भी हो सकता है कि हिन्दी कविता में ऐसा बहुत कम है जो रसिकों को आकर्षित कर सके. उसमें न रूमानियत बची है, न रूहानियत जो कि दो बड़े आकर्षण होते हैं. बहुत सारी कविताएं आजकल निरे वक्तव्य हो गई हैं जो जीवन-जगत् पर कवियों के अभिमत भर व्यक्त करती हैं. किसी ने हाल ही में एक दूसरे आयोजन में कहा था, रेमण्ड विलियम्स के हवाले से, कि कवि भावनाओं की संरचना से काम करता है और श्रोता-पाठक आदतों या रूढ़ियों की संरचना से. इसलिए हमेशा एक दूरी और तनाव रहते हैं.

हम कविता के पास जीवन के राग-स्पन्दन के लिए जाते हैं: हम महसूस करना चाहते हैं कि जीवन कवि को, कविता को कैसे अनुभव कर, समझ रहा है. हम सच्चाई से रूबरू होने जाते हैं. हम यह देखने-समझने भी जाते हैं कि भाषा कितनी-कैसी अनजानी-अनबूझी सच्चाइयां हमारे नज़दीक ला सकती है- हमें वहां ले जा सकती है जहां हम पहले कभी न गए हों. कविता हमें सावधान भी करती है: वह हमें तरह-तरह से जताती है कि भाषा में कितना जीवन उसकी अपार छबियों के साथ स्पन्दित होता है. यह सब होता है कि कविता की लयात्मक गति और रागात्मक गति के साथ. कविता अप्रत्याशित होती है पर वह हमारी आशा बढ़ा देती है.

अतिरेक का बड़बोलापन

जैसे दिल्ली में प्रदूषण से सुरक्षित रह पाना लगभग असंभव है वैसे ही देश में, उसके सार्वजनिक क्षेत्रों में, अतिरेक से. अतिरेक हमारे समय और समाज का एक अनटाला जा सकने वाला प्रदूषण है. अतिरेक राजनीति, धर्म, मीडिया आदि जगहों पर पूरे आत्मविश्वास से चल रहा है. हमले, दंगे, हत्याएं, हिंसा, नागरिक असंवेदनशीलता आदि सब अतिरेक के ही दुखद संस्करण हैं. सार्वजनिक संवाद में तो अतिरेक का अब लगभग एकछत्र राज्य स्थापित हो गया है. झूठों, विकृतियों के अम्बार इसी अतिरेक से दूसरे उदाहरण हैं जो लगातार व्याप रहे हैं. इस क़दर शोर गुल बढ़ा हुआ है कि बिना बड़बोले हुए काम नहीं चलता, आपकी आवाज़ अनसुनी चली जाएगी जो कि अतिरेक की एक और अभिव्यक्ति है.

अगर साहित्य समाज का आईना है तो ऐसे समय में उसमें भी अतिरेक का बोलबाला होना चाहिए. दुर्भाग्य से ऐसा ही है. दुर्भाग्य इसलिए कि साहित्य का काम सिर्फ़ आईना होना भर नहीं है: उसे प्रतिरोध भी होना चाहिए. साहित्य को बोलना चाहिए. पर बड़बोलना नहीं क्योंकि वह मुख्यतः और मूलतः भाषिक और नैतिक कर्म है. भाषा और नीति उग्रता से दूर न भी हों उन्हें अतिरेक से बचना चाहिए. अच्छा साहित्य बड़बोला नहीं कमबोला होता है: इसीलिए उसे कई बार या ग़लत भी समझा जाता है. पर इस कारण उसे अपनी भाषिक नैतिकता से विरत नहीं होना चाहिए.

पर क्या होना चाहिए और क्या होता है इसमें खाई बनी रहती है और अतिरेक उसे और बढ़ा देता है. साहित्य चीख़ हो सकता है, कई बार होता है पर चीख़-पुकार नहीं जो कि बड़बोलेपन का ही एक संस्करण है. जब नृशंसता हर दिन हो रही हो तो साहित्य चुप नहीं रह सकता: जब ऊंचे आसनों से हर रोज़ झूठ बोला जा रहा हो, बिना किसी शर्म या लिहाज़ के, तो साहित्य सच बोलना स्थगित नहीं कर सकता. पर, मुहावरे में, ईंट का जवाब वह पत्थर से नहीं शब्दों से ही दे सकता है. बड़बोलापन इस सार्थक प्रतिरोध और समुचित जवाब को बाधित करता है.

हाल ही में आयोजित ‘कवि समवाय’ में हमारे एक वरिष्ठ कवि मित्र ने मुक्तिबोध की प्रासंगिकता पर बोलते हुए डांट और बड़बोलेपन की मुद्रा में कवियों को यह बिन मांगी सलाह दी कि उन्हें कविता के अलावा गद्य लिखना चाहिए और सबका लक्ष्य 2019 में मोदी सरकार को हराने का होना चाहिए. कोई सक्रिय राजनीति में जाना चाहे तो यह उसका निजी निर्णय हो सकता है. लेकिन इसे कवि-समाज का तात्कालिक लक्ष्य बताना सरासर ज़्यादती है. कवि अपने सभी संघर्ष भाषा और कविता के मोर्चे पर ही करते हैं और वहीं सफल-विफल, सार्थक-निर्रथक होते हैं. अपनी पक्षधरता का बार-बार उद्घोष अनावश्यक होता है. कविता और समाज में निष्पक्ष की भी जगह होती है. स्वयं मुक्तिबोध कविता में ही राजनैतिक और नैतिक थे, उससे बाहर नहीं. अक्सर बाहर गए कवि अपनी कविता को ही गंवा बैठे, राजनीति का कुछ नहीं बिगाड़ पाए.