इस संग्रह की कहानी ‘ब्लू फ़िल्म’ का एक अंश :

‘वह कैमरा और उसमें बनी फ़िल्म यादव के पास ही रह गई थी. उसने उसे एडिट करके फालतू के दृश्य काट दिए थे. अब वह सोलह मिनट सैंतीस सेकेंड की आदर्श ब्लू फ़िल्म बन गई थी. उसके परिष्कृत रूप में तैयार हो जाने के बाद उसने रागिनी से सम्पर्क किया और कीमत मांगी. कीमत एक लाख थी...

यादव ने पैंतालीस हज़ार रुपए मेरी मां और पिताजी को दे दिए. उस सीडी की उसने कई कॉपी बना रखी थीं, जिनमें से कुछ उसके पिता के ट्रांसपोर्ट के बिज़नेस के ज़रिए नेपाल में ले जाकर बेच दी गईं. वहां से वे भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी बिकीं. मेरा मृत्यु के बाद के जीवन में बहुत विश्वास नहीं था, फिर भी मैं चाहता था कि उस फ़िल्म के आखिर में क्रेडिट लिखे आते, जिनमें मेरे नाम के आगे ‘स्वर्गीय’ लिखा होता...

उस ब्लू फ़िल्म से होने वाली कमाई का आधा हिस्सा यादव रॉयल्टी की तरह पिताजी को देता रहा. उसने कहा कि इसको वे मेरी अमानत समझकर रख लें. वे रखते रहे. छह महीने बाद जब लता की शादी हुई तो उन्हें जीपीएफ़ से सिर्फ़ एक लाख निकलवाने पड़े. ज़िन्दगी भी एक ब्लू फ़िल्म थी जिसके सुखान्त के लिए हम सब नंगे हो गए थे.’


कहानी संग्रह : ग्यारहवीं A के लड़के

लेखक : गौरव सोलंकी

प्रकाशक : सार्थक (राजकमल प्रकाशन का एक उपक्रम)

कीमत : 125 रुपये


किशोर वर्ग हमारे समाज का ऐसा तबका है, जिसकी जाने-अनजाने सबसे ज्यादा उपेक्षा होती है. घरों में इनका होना भी नहीं होने जैसा ही होता है. समाज में भी इनके बारे में बातें सिर्फ तब होती हैं, जब इनका कोई सनसनीखेज कांड सामने आ जाता है. गौरव सोलंकी इसी उपेक्षित और उपस्थित होते हुए भी अदृश्य जैसे बना दिए गए तबके के बारे में साधी गई चुप्पी को तोड़ते हैं. उनके इस कथासंग्रह ‘ग्यारहवीं A के लड़के’ में, नैतिकता के सुनहरे आवरण के भीतर पसरे स्याहपन को बहुत ही निर्ममता से उघाड़ती, बेहद प्रभावी और चमकीली कहानियां हैं.

ये कहानियां भीतर बहुत गहरे तक खलबली मचाती हैं. जैसे जीवन कभी धोखा खाने की टीस तो कभी धोखा देने के रोमांच के साथ अपनी गति से अनवरत चलता रहता है, ये कहानियां भी आपको कई तरह के भावों से एक साथ भिगोते हुए चलती हैं. इस संग्रह की शीर्षक कहानी ‘ग्यारहवीं A के लड़के’ पाठकों को अश्लील भी लग सकती है. हममें से ज्यादातर लोग जीवन में घटी कई तरह की अनचाही अश्लीलता के गवाह हैं. फर्क बस इतना ही है कि हम सब उनके मौन गवाह हैं और गौरव ने चुप्पी तोड़ी है. छोटे शहर के किशोरों की मानसिक दशा का एक मनोचिकित्सक की तरह से वर्णन करते हुए गौरव लिखते हैं -

‘मैंने आपसे पहले ही कहा है कि हमें कुछ असम्भव नहीं लगता था. हमें दुनिया खिलौनों की दुकान लगती थी जिनके पुर्जों से हम बलजीत की तरह खेलते और प्रयोग करते रहते थे. मौत फ़िल्मों के दृश्यों की तरह थी जो कई बार रिहर्सल के बाद ठीक से आती थी और फ़िल्म पूरी होने के बाद लौट जाती थी. पाप और पुण्य, प्यार की तरह बेवकूफ़ लोगों के लिए ही थे. हमें न गधों की तरह पढ़ने, काम करने वाले लोगों का दर्शन समझ आता था और न दुखी होने की अवधारणा. मैं और शायना इन सतरह सालों में कभी उदास नहीं हुए थे. अपमान और गर्व हमें महसूस होता था, लेकिन स्नेह और वियोग हमें नौटंकी के लिए रची गई भावनाएं लगती थीं.’

गौरव की कहानियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कभी तो ये आपके भीतर के अपराधी को रंगे हाथों पकड़ लेने जैसा अहसास कराती हैं तो कभी आपके भीतर पीड़ित होने जैसी टीस पैदा करती हैं. इनमें लेखक ऐसी तंग और अंधेरी गलियों की खबर पाठकों को देता है जहां आप अपनी मर्जी से कभी जाना नहीं चाहेंगे और जिनके किस्से सुननेभर से आपके चेहरे के रंग उड़ जाएंगे. ‘तुम्हारी बांहों में मछलियां क्यों नहीं हैं’ शीर्षक वाली कहानी में वे एक बच्ची शिप्पी के बचपन में यौन शोषण से गुजरने के खौफनाक अनुभव के बारे में एक जगह लिखते हैं -

‘शिप्पी की उम्र आठ साल है. वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त है. उसने चौड़े घेरे का ऊंचा गुलाबी फ़्रॉक पहन रखा है. उसका हाथ मैंने कसकर पकड़ रखा है. अतुल हमसे पांच-छह साल बड़ा है. वह मेरे सिर पर हाथ फेरता है. मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता. फिर वह मेरे हाथ से शिप्पी का हाथ छुड़ा देता है. उसकी आखों में आंसू आ गए हैं. वह बुरी तरह कांपने लगी है. मैं देख रहा हूं कि वह उसे खींचकर टूटे हुए दरवाजे के कमरे के अन्दर ले गया है. मैं डरकर भाग लेता हूं...

मेरे बड़े होने के बाद टीवी पर एक विज्ञापन आता है - डर के आगे जीत है...

नहीं, डर के आगे जीत नहीं है. डर के आगे सरकारी स्कूल का एक कमरा है, जिसमें घुसते हुए अतुल का हाथ शिप्पी के ऊंचे फ्रॉक को और भी ऊंचा उठाता हुआ ऊपर तक चला जा रहा है. डर के आगे मेरा उस कमरे के बाहर अंधेरा होने तक खड़ा रहना और फिर मेरे सिर पर अपना हाथ फेरकर जाते अतुल के बाद रोती-बिलखती शिप्पी को देखते रहना है...डर के चार घंटे आगे शिप्पी का बिना किसी से कुछ कहे अपने बिस्तर पर सो जाना है.’ पाठक जानते हैं कि लगभग हर घर में ऐसी कोई न कोई शिप्पी चुपचाप सोई है!

ये कहानियां बड़े ही चुटीले और बेहद दिलचस्प अंदाज में समाज की घोर विसंगतियों पर उंगली रखती हुई चलती हैं. यहीं एक कहानी में गौरव हमारे यहां के बोर्ड परीक्षा की कॉपियों की जांच की दिलचस्प बानगी देते हैं -

‘पिताजी बोर्ड की परीक्षा की ख़ूब सारी कॉपियां मंगवाते थे. हर उत्तर पुस्तिका को जांचने के दो रुपए मिलते थे. मई और जून में मैं, मां और लता उनके साथ मिलकर पूरी दोपहर कॉपियां जांचते थे. किसी-किसी कॉपी में सिर्फ एक पत्र मिलता था जो जांचने वाले अज्ञात गुरुजी के नाम होता था. अक्सर वह गांव की किसी तथाकथित लड़की द्वारा लिखा गया होता था जो घरेलू कामों में फंसी रहने के कारण ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाई होती थी और जिसकी सगाई का सारा दारोमदार उसके दसवीं पास कर लेने पर होता था. आख़िर में आदरणीय गुरुजी के पैर पकड़कर निवेदन किया गया होता था और कभी-कभी दक्षिणास्वरूप पचास या सौ का नोट भी आलपिन से जोड़कर रखा होता था. मां उन रुपयों को मंदिर में चढ़ा आती थी. मैं और लता ऐसी कॉपियों पर बहुत हंसते थे. पिताजी ऐसी पूरी खा़ली उत्तर पुस्तिकाओं में किसी पन्ने पर गोला मारकर अन्दर चौंतीस लिख देते थे.’

गौरव सोलंकी की बिल्कुल नए तेवर की ये कहानियां कहीं चमत्कृत करती हैं तो कहीं थोड़ा उलझाती भी हैं. इस कहानी संग्रह को पढ़ते हुए पाठक कभी-कभी खुद को ‘न निगला जाए न उगला जाए’ की सी स्थिति में भी पा सकते हैं. प्यार की तलाश में भटकते कहानियों के पात्रों में अक्सर ही पाठकों को अपना खुद का अक्स भी दिख सकता है. इन कहानियों में प्यार की अनवरत खोज है, तो उसकी निरर्थकता भी है. सेक्स का भटकाता हुआ तिलिस्म है, तो किस्म-किस्म की हिंसा करने को ललचाता मन भी है. गौरव ने बेहद सधे हाथों से अपने समय की हू-ब-हू तस्वीर इन कहानियों के कैनवास पर उतार दी है. उदय प्रकाश के शब्दों में कहें तो ‘ये बे-मिसाल या अद्वितीय कहानियां हमारे समय का मार्मिक एक ऐसे संगीत की तरह संयोजित करती हैं कि उसकी अनुगूंजें पाठक की स्मृति का लम्बे समय तक पीछा करना नहीं छोड़तीं.’