भाजपा ने त्रिपुरा में 25 साल पुराने लाल किले को ढहा दिया है. साफ हो गया है कि वाम मोर्चे के इस गढ़ में अब भगवा लहराएगा. ताजा चुनावी रूझानों के मुताबिक भाजपा अपनी सहयोगी इंडिजनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ दो-तिहाई से अधिक सीटों पर आगे चल रही है. दूसरी ओर, वाम गठबंधन का आंकड़ा 16 के करीब सिमटता हुआ दिख रहा है. अब तक राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी रही और 60 में से 59 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने वाली कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई है.

करीब 40 लाख आबादी वाले त्रिपुरा में मतदाताओं की संख्या 25 लाख है. इनमें से करीब 74 फीसदी वोटरों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था. छोटे से इस राज्य में हो रहे इस चुनाव पर देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी पैनी नजर बनी हुई थी. बीते 25 वर्षों में पहली बार सत्ताधारी सीपीआई (एम) को कांग्रेस की जगह भाजपा से सीधी चुनौती मिल रही थी. भाजपा ने इस चुनाव में त्रिपुरा की साफ-सुथरी मानी जाने वाली वाम सरकार शासन को पानी, सड़क और रोजगार जैसे विकास के बुनियादी मुद्दों को लेकर लगातार घेरे रखा. सत्ताधारी पार्टी इसके जवाब में माणिक सरकार की ईमानदार मुख्यमंत्री वाली छवि पर ही दांव लगाती दिखी. चुनावी नतीजों ने साफ कर दिया है कि यह काफी नहीं था.

विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों का वोट शेयर |  साभार : चुनाव आयोग
विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों का वोट शेयर | साभार : चुनाव आयोग

अब स्थिति यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव में 50 में से 49 उम्मीदवारों की जमानत गंवाने वाली भाजपा इस बार त्रिपुरा में सरकार बनाने की तैयारी में है. इस जीत में उसकी रणनीतियों की बड़ी भूमिका तो है ही, कांग्रेस ने भी एक लिहाज से उसकी मदद की है. इससे पहले 2013 के चुनाव में कांग्रेस ने 10 सीटों पर जीत हासिल की थी. साथ ही, पार्टी को 36.53 फीसदी वोट हासिल हुए थे. इस चुनाव में पार्टी का वोट शेयर घटकर केवल 1.8 फीसदी रह गया है. दूसरी ओर, भाजपा के लिए यह आंकड़ा ड़ेढ़ फीसदी से बढ़कर 43 फीसदी तक पहुंच गया है. आंकड़े बता रहे हैं कि बीते पांच वर्षों में वाम सरकार को चुनौती देने की जगह कांग्रेस अपना ही आधार खोती चली गई. इसका फायदा भाजपा ने उठाया.

साल 2013 के चुनाव में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन | साभार : चुनाव आयोग
साल 2013 के चुनाव में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन | साभार : चुनाव आयोग

देखा जाए तो कांग्रेस ने अपने खेमे का ख्याल नहीं रखा. 2013 के चुनाव में जीत दर्ज करने वाले 10 कांग्रेसी विधायकों में से छह पहले तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे. इसके बाद बीते अगस्त में वे भाजपा में आ गए. इसके अलावा दिसंबर, 2017 में एक अन्य कांग्रेसी विधायक रतन लाल नाथ ने भी भाजपा में शामिल होने का फैसला किया. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक जहां भाजपा ने राज्य में स्थानीय नेताओं को पार्टी में अलग-अलग जिम्मेदारी दी वहीं स्थानीय कांग्रेसी नेता पार्टी नेतृत्व की उपेक्षाओं का सामना करते रहे.

कई खबरों की मानें तो त्रिपुरा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पूर्वोत्तर राज्यों के पार्टी प्रभारी सीपी जोशी की शिकायत की थी. उनका कहना था कि जोशी दो-तीन बार ही राज्य के दौरे पर आए और वह भी पर्यटक के तौर पर. इसके अलावा, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी त्रिपुरा के मतदाताओं के सामने आखिरी वक्त पर पहुंचे. दूसरी ओर, भाजपा के स्टार प्रचारक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बड़ी संख्या में केंद्रीय मंत्रियों ने भी त्रिपुरा जाकर मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश की.

इससे पहले भी त्रिपुरा को लेकर कांग्रेस नेतृत्व के रुख पर सवाल उठते रहे हैं और पार्टी को स्थानीय नेताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ा है. 1993 में नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली केंद्र की कांग्रेस सरकार ने केंद्र में वाम दलों का समर्थन हासिल करने के दबाव में वहां अपनी पार्टी की समीर रंजन बर्मन सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था. इसके बाद हुए चुनाव में सीपीएम राज्य में अकेले सरकार बनाने में कामयाब हुई थी. तब से अब तक त्रिपुरा में उसी का शासन रहा है. बताया जाता है कि पार्टी नेतृत्व के फैसले के बाद मुख्यमंत्री का पद गंवाने वाले समीर रंजन कांग्रेस के खिलाफ लगातार बगावती रुख अपनाए हुए हैं. पिछले चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल करने वाले उनके बेटे सुदीप राय बर्मन भी बीते साल पार्टी छोड़ने वाले विधायकों में शामिल थे.

उधर, करीब तीन वर्षों से भाजपा की कोशिश गैर-वाम दलों के असंतुष्ट नेताओं और समर्थकों को अपने साथ लाने की रही है. इसका नतीजा भाजपा के वोट शेयर में अप्रत्याशित बढ़ोतरी के रूप में दिख रहा है. चुनावी प्रचार अभियान के दौरान वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली ने कहा था कि वाम-विरोध में खाली हुई जगह को भाजपा ने पूरी तरह से भर दिया है. राज्य के ताजा चुनावी रूझान उनकी इस बात की पुष्टि करते हुए ही दिखाई देते हैं.