मेरे पास रोज एकाध फोन आ ही जाता है, या कोई न कोई भ्रमित और घबराया हुआ-सा आदमी मेरे ओपीडी में अपनी रिपोर्ट लेकर आता है और कहता है – डॉक्टर साब मेरी ब्लड रिपोर्ट में ईओसिनोफिल कुछ ज्यादा बताए गए हैं, क्या करूं? कहीं दिखाया भी था परन्तु डॉक्टर भी ठीक से मुझे कुछ बता नहीं रहे. दरअसल इस मसले पर हर डॉक्टर अलग-अलग बात करता है. ज्यादातर साफ-साफ नहीं बताते कि इस ईओसिनोफिलिया का आखिर हम क्या अर्थ मानें? क्या यह स्वयं कोई बड़ी बीमारी है, या किसी बड़ी बीमारी का संकेत है?

ऐसे मरीजों को मैं जो कुछ समझाता हूं, वही आपको यहां बता रहा हूं. उम्मीद है कि इन सवाल-जवाबों से आपके भी कुछ भ्रम दूर होंगे.

ईओसिनोफिल आखिर क्या होता है?

हमारे रक्त में मूलतः दो तरह के रक्त कण प्रवाहित हो रहे हैं. लाल रक्त कण (RBC) और श्वेत रक्त कण (WBC). ये दोनों ही तरह के रक्त कण (ब्लड सेल्स) हमारी हड्डियों की बोन-मैरो में लगातार बनते रहते हैं. यहां से ये हमारे रक्त में प्रवेश कर जाते हैं. रक्त में एक निश्चित समय तक अपना काम करके ये नष्ट भी हो जाते हैं.

इनमें से हर कण का जीवनकाल अलग-अलग है. लाल रक्त कण तीन माह, प्लेटलेट्स सात दिन तो कुछ श्वेत रक्त कण मात्र सात घंटे ही रक्त में रहकर नष्ट हो जाते हैं. ईयोसिनोफिल्स भी एक प्रकार का श्वेत रक्त कण है.

श्वेत रक्त कण क्या होते हैं?

रक्त में बह रहे हर तरह के रक्त कण का अपना-अपना अलग काम है. लाल रक्त कणों (RBC) में हीमोग्लोबिन होता है. ये लाल रक्त कण ही हमारे फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर पूरे शरीर में हर अंग-प्रत्यंग तक पहुंचाने का काम करते हैं. वहीं श्वेत रक्त कण हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक फौज है. बाहरी इन्फेक्शनों से लड़ने वाले सैनिक हैं ये कण.

बैक्टीरिया, वायरस आदि हमारे शरीर में प्रवेश करके हरदम रोग पैदा करने की कोशिश करते हैं परन्तु ये श्वेत रक्त कण उनसे लड़कर उन्हें नष्ट कर देते हैं. हमारे शरीर की इस रोग प्रतिरोधक क्षमता के सिस्टम में इन सेल्स का बड़ा महत्वपूर्ण हाथ है.

तब तो ईओसिनोफिल भी यही काम करते होंगे?

हां भी और न भी.

दरअसल ये भी बैक्टीरिया से लड़ने में कुछ मदद करते हैं पर ये मूलतः पैरासाइट्स से लड़ने का काम करते हैं. हमारे पेट या शरीर में कहीं भी इन कीड़ों को पनपने से रोकने का काम इनका है. इस तरह देखें तो ईओसिनोफिल्स इन पैरासाइट्स या कीटों के विरूद्ध शरीर में नियुक्त हमारे सैनिक हैं. मुझे विश्वास है कि आप अब तक ईओसिनोफिल्स को जान गए हैं.

फिर यह ईओसिनोफिलिया क्या बला है?

हमारे रक्त में ईओसिनोफिल्स की एक निश्चित मात्रा होती है. जब इनकी मात्रा शरीर में उस सीमा से अधिक हो जाती है तो उसे हम ईओसिनोफिलिया कहते हैं.

ईओसिनोफिल्स की नॉर्मल मात्रा क्या होती है?

रक्त कणों में जीरो से लेकर सात प्रतिशत तक ईओसिनोफिल्स नॉर्मल माने जाते हैं. इनका एक एब्सॉल्यूट काउंट भी किया जाता है जो पांच सौ तक नार्मल होता है. इसके ऊपर हम ईओसिनोफिलिया कहेंगे.

ईओसिनोफिल्स बढ़ने के क्या कारण होते हैं?

इसके बहुत से कारण हो सकते हैं. यदि ये थोड़े बहुत ही बढ़े हों (जैसा कि अक्सर होता है) तो उसके कारण अलग होते हैं और प्रायः बहुत महत्वपूर्ण नहीं होते. हां, कभी ये हजारों की संख्या में हो सकते हैं. तब कारण एकदम अलग होता है.

पहले हम उस कॉमन स्थिति की बात कर लें जब ईओसिनोफिल्स थोड़े ही बढ़े हों (मान लें कि दस-पंद्रह प्रतिशत तक हो गये हों). ऐसा कई स्थितियों में हो सकता है. आइए जानते हैं :

(1) हमें कोई एलर्जी जैसी बीमारी हो तो उसके कारण ये बढ़ सकते हैं. मसलन अस्थमा, एक्जिमा, एलर्जिक रायनाइटिस आदि में ये बढ़ सकते हैं

(2) कभी-कभी इनका बढ़ना यह भी बताता है कि हमारे पेट या शरीर में कहीं कीट (कीड़े) हो गए हैं.

(3) हमें यदि गठिया या अन्य कोई कोलेजन (रयूमेटिक) बीमारी है तो भी ईयोसिनोफिल्स बढ़ सकते हैं.

(4) अगर हम कोई ऐसी दवाएं न ले रहे हों जो ईओसिनोफिल्स काउंट बढ़ा देती हैं. इनमें कई बेहद कॉमन, रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली दवाइयां भी शामिल हैं, जैसे सल्फोनामाइड्स, पेनिसिलीन्स, पेशाब के इंफेक्शन में बहुत इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोफ्यूरेंटिन, सिप्रोफ्लोक्सिलीन वाले ग्रुप की दवायें, एस्प्रिन आदि

इन चारों स्थितियों में ईओसिनोफिलिया के लिये अलग से किसी दवा की आवश्यकता नहीं होती. यहां ईओसिनोफिलिया किसी अन्य बुनियादी कारण से पैदा हुआ है. उस बुनियादी कारण को समझना होगा और उसके इलाज की जरूरत होगी. अस्थमा है तो उसका इलाज लें. कोई दवा ले रहे हैं तो उसे जब भी बंद करेंगे ईओसिनोफिलिया भी ठीक हो जाएगा. इन स्थितियां में फालतू ही ईयोसिनोफिल्स की रिपोर्ट को लेकर हाय-हाय न करते फिरें क्योंकि इन तीनों स्थितियों में ईओसिनोफिलिया अलग से कोई बीमारी नहीं है.

लेकिन कुछ स्थितियों में ईओसिनोफिलिया की मात्रा बहुत ही अधिक जाती है (एब्सोल्यूट काउंट में पचास हजार से लेकर एक लाख तक) तब यह स्वयं में एक गंभीर बीमारी भी हो सकती है.

यह बीमारी भी दो तरह की होती है. पहली - इडियोपैथिक ईओसिनोफिलिया और दूसरी - ईयोसिनोफिक मायेल्जिक सिनेमा. इन बीमारियों में, ये हजारों ईयोसिनोफिल्स जाकर विभिन्न अंगों में जमा हो जाते हैं. फिर ये वहां उन अंगों को धीरे-धीरे नष्ट करने लगते हैं. इस चक्कर में दिल, दिमाग, किडनी आदि काम करना बंद कर देते हैं. यदि यह बीमारी न पकड़ी गई और समय पर इलाज न हुआ तो मरीज मर भी सकता है.

याद रहे कि ऐसा खतरनाक और जानलेवा ईओसिनोफिलिया भी सही समय पर, सही इलाज से पूरा ठीक हो जाता है.

अब एक आखिरी बात.

यह बात आखिर में इसीलिए बता रहे हैं कि कहीं आप इसी को पकड़कर न बैठ जाएं. बताना ये है कि शरीर में पल रहे कुछ कैंसर जैसे हाचकिन्स लिम्फोमा, बच्चेदानी तथा ओवेरियन कैंसर, लंग कैंसर, ल्यूकेमिया आदि भी ईओसिनोफिलिया पैदा कर सकते हैं. पर तब तक प्रायः कैंसर के अन्य लक्षण भी सामने आ जाते हैं.

सो कृपया यह लेख पढ़ने के बाद अपनी ईओसिनोफिलिया की रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास कैंसर की जांच कराने न पहुंच जायें. वह मुझे गालियां देने बैठ जाएगा.