त्रिपुरा में 20 साल तक सत्ता में रहे माणिक सरकार की जगह अब विपक्ष में होगी. बीते शनिवार को घोषित चुनावी नतीजों ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि राज्य की जनता अब मुख्यमंत्री के पद पर नया चेहरा देखना चाहती है. ढाई दशक पुराने वाम दलों के इस लाल किले पर कब्जा करने वाली भाजपा ने ‘चलो पालटाई’ (चलो बदलें) का चुनावी नारा दिया था. चुनावी नतीजे बता रहे हैं कि जनता ने इसे समर्थन दिया.

2011 में पश्चिम बंगाल में करीब साढ़े तीन दशक पुराना लाल किला ढहा था. इसके बाद 2013 में ही चर्चाएं होने लगी थीं कि त्रिपुरा में पश्चिम बंगाल का उदाहरण एक बार और न दोहरा दिया जाए. हालांकि, राज्य में किसी मजबूत विकल्प के अभाव में मतदाताओं ने लगातार चौथी बार माणिक सरकार को ही चुना.

लेकिन, इसके एक साल बाद से ही राज्य की राजनीतिक रुख में बदलाव के संकेत उभरने लगे थे. 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की राजधानी अगरतला में एक रैली की थी. इसमें करीब सात हजार लोग ही जुटे थे. उस वक्त पूरे देश में मोदी लहर होने की बात की जा रही थी और आम तौर पर नरेंद्र मोदी की रैली में बड़ी संख्या में लोगों का जमघट देखा जाता था. इसलिए अगरतला की रैली ने भाजपा को चौंका दिया. बताया जाता है कि इसके बाद पार्टी ने राज्य में अपनी जमीन बढ़ाने के लिए पूरा जोर लगा दिया. इसके लिए पार्टी के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भी अपना पूरा सहयोग दिया. बताया जाता है कि बीते तीन वर्षों में ही संघ की शाखाओं की संख्या में करीब चार गुना तक बढ़ोतरी हो गई है.

त्रिपुरा चुनाव को राजनीति के अलावा विचारधारा का संघर्ष मानने वाली भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने महाराष्ट्र चुनाव (2014) के बाद सुनील देवधर को राज्य का प्रभारी बनाकर त्रिपुरा भेजा. इससे पहले वे पूर्वोत्तर के राज्यों में संघ प्रचारक के रूप में काम कर चुके थे. बताया जाता है कि मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले सुनील देवधर ने राज्य में पार्टी की पहुंच बढ़ाने के लिए वाम दलों वाले मॉडल पर काम करना शुरु किया. भाजपा ने इसके लिए मोहल्ला और ब्लॉक स्तर पर कमेटियां बनाई. इसके अलावा महिलाओं और युवाओं के साथ पिछड़े, अनुसूचित जाति (एससी) और जनजाति (एसटी) के लिए अलग-अलग मोर्चे का गठन किया गया.

इसके साथ ही भाजपा ने वाम दलों का गढ़ मानी जाने वाले आदिवासियों के क्षेत्र (कुल सीट-20) में भी अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिशें की. पार्टी ने इसके लिए इंडिजनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ साझेदारी की. बताया जाता है कि इस साझेदारी में त्रिपुरा के रंग में ढल चुके सुनील देवधर और हिमंता बिस्वा सरमा ने अहम भूमिका निभाई थी. त्रिपुरा में जनजातियों की आबादी करीब 30 फीसदी है. इतिहास बताता है कि इस चुनाव से पहले सीपीएम ने हमेशा आदिवासी क्षेत्रों में पड़ने वाली 20 में से कम से कम 18 सीटें हासिल की हैं. इस बार पार्टी इनमें से केवल दो सीटें बचा सकी. बाकी की सीटों पर भाजपा के साथ आईपीएफटी ने जीत दर्ज की.

भाजपा युवाओं, जिनमें से अधिकांश ने वाम दल शासन के अलावा राज्य में और किसी चेहरे को नहीं देखा है, को अपनी ओर खींचने में कामयाब रही. इसके लिए पार्टी ने सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया. दूसरी ओर, सत्ताधारी सीपीएम मतदाताओं के बीच इस माध्यम से पहुंचने में अब तक विफल रही है. बताया जाता है कि माणिक सरकार खुद भी मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करते. राज्य की 29 शहरी सीटों में से 25 पर भाजपा गठबंधन को सफलता हासिल हुई है. इससे साफ है कि गैर-जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश बंगाली मतदाताओं ने भाजपा पर विश्वास दिखाया है.

राज्य में ओबीसी तबके का एक बड़ा हिस्सा नाथ संप्रदाय के अनुयायियों का भी है. इन्हें अपने पाले में करने के लिए भाजपा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ द्वारा सात सीटों पर चुनावी रैलियां आयोजित करवाई थीं. इनमें से भाजपा ने छह और आईपीएफटी ने एक पर जीत दर्ज की है.

उधर, इन चुनावी रणनीतियों का जवाब देने के लिए सीपीएम माणिक सरकार के ईमानदार चेहरे वाली छवि पर ही निर्भर होती दिखी. रोजगार, स्वास्थ्य, सड़क और पानी जैसे विकास के कई बुनियादी मुद्दों के साथ भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा के हमलों का जवाब देने में वह विफल रही. 25 साल के शासन के दौरान राज्य में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (अफ्स्पा) हटाने और शांति स्थापित करने के साथ सामाजिक विकास के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों को मतदाताओं तक पहुंचा पाने में भी सीपीएम बुरी तरह नाकामयाब रही. वह समाज में दरार पैदा करने और आईपीएफटी पर आतंकवादियों से गुप्त संपर्क रखने के आरोप लगाकर भाजपा को घेरने की कोशिश करती दिखी जो आखिर में नाकाफी साबित हुई.

उधर, देश में सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले और सबसे गरीब मुख्यमंत्री का तमगा हासिल करने वाले माणिक सरकार अपने कर्मचारियों के लिए अब तक चौथे वेतन आयोग की सिफारिशों से आगे नहीं बढ़ पाए. इसके पीछे राज्य सरकार का कहना था कि उसके पास सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए पैसे नहीं हैं. हालांकि, बीते साल सीपीएम सरकार ने इनके वेतन में करीब 20 फीसदी का ऐलान किया था. दूसरी ओर, विपक्ष का कहना था कि इस बढ़ोतरी के बाद भी राज्य सरकार के कर्मचारियों का वेतन केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन की तुलना में आधा ही है. भाजपा ने राज्य के मतदाताओं से सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का वादा किया. बताया जाता है कि इसके चलते राज्य के करीब चार लाख सरकारी कर्मचारियों में से अधिकांश ने कमल के निशान पर ईवीएम का बटन दबाया है. इसकी पुष्टि शहरी क्षेत्रों में भाजपा का प्रदर्शन भी करता दिखाई देता है.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक त्रिपुरा में औसत प्रति व्यक्ति आय (2017-18) 71,666 रुपये ही है. इस मामले में त्रिपुरा 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशो में 24वें पायदान पर है. इसके अलावा राज्य में बेरोजगारी की दर भी सबसे अधिक 19.7 फीसदी है. राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 4.9 फीसदी है. साथ ही, राज्य की आधी से अधिक अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है. यही वजह है कि भाजपा ने माणिक सरकार पर राज्य की जनता को गरीब बनाए रखने और उसे विकास से दूर रखने के आरोप लगाए और लोगों पर इनका असर भी पड़ा.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि माणिक सरकार की ईमानदार छवि विकास के मुद्दे मतदाताओं के सामने फीकी पड़ गई. राज्य की जनता को एक मजबूत विकल्प का इंतजार था और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा उनका विश्वास हासिल करने सफल रही. चुनावी नतीजे भी देखें तो सीपीएम के वोट शेयर में करीब पांच फीसदी की कमी दर्ज की गई है. लेकिन, उसकी सीटों की संख्या में भारी कमी (49 से 16) आई है. संकेत साफ है कि भाजपा एकमुश्त वाम विरोधी मत हासिल करने में सफल रही है. कांग्रेस का वोट शेयर 36.5 फीसदी से घटकर 1.8 फीसदी रह जाना भी इसकी पुष्टि करता है.

दिसंबर, 2013 में एक साक्षात्कार के दौरान माणिक सरकार ने कहा था कि वे देश के सबसे गरीब मुख्यमंत्री होने के तमगे से परेशान होने की जगह इसका आनंद लेते हैं. इसके करीब चार साल बाद भाजपा के शानदार प्रदर्शन ने सत्ता के साथ-साथ उनसे यह तमगा और आनंद भी छीन लिया है.