कर्नाटक में भाजपा की सरकार बन गई है. इसके साथ ही कांग्रेस देश के 31 राज्यों में से केवल तीन में सिमटकर रह गई है. ये तीन राज्य हैं पंजाब, पुडुचेरी और मिजोरम. हालांकि मिजोरम में भी इस साल के अंत तक चुनाव होने हैं जिसके बारे में ज्यादातर जानकारों की राय है कि वहां की सत्ता भी कांग्रेस के हाथों से फिसल सकती है. यदि वाकई ऐसा हुआ तो समूचा देश तो नहीं लेकिन पूर्वोत्तर भारत जरूर ‘कांग्रेस मुक्त’ बन जाएगा. यह राहुल गांधी और उनकी पार्टी दोनों के लिए परेशानी की बात हो सकती है.

मिजोरम में इस साल नवंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ विधानसभा चुनाव होने की संभावना है. पूर्वोत्तर के इस अंतिम राज्य में भी अपना परचम फहराने के इरादे से भाजपा वहां की सहयोगी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) और अन्य दलों के साथ गठबंधन बनाकर चुनावी समर में कूदने की तैयारी में जुटी है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दो कार्यकाल से राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ मौजूद सत्ता विरोधी लहर एनडीए की जीत की राह आसान बना सकती है. इनके मुताबिक पिछले दो साल में पूर्वोत्तर के जिन पांच राज्यों में भाजपा ने सफलता पाई है, उन सभी राज्यों में एक बात समान थी कि वहां दो या तीन कार्यकालों से एक ही पार्टी की सरकार थी. अपनी कुशल रणनीति और समझदारी का इस्तेमाल करते हुए भाजपा ने वहां जनता के गुस्से को हवा दी और वहां की सत्तारूढ़ पार्टियों को उखाड़ फेंकने में कामयाबी पाई.

तो क्या अब मिजोरम की बारी है?

जानकारों के मुताबिक पूर्वोत्तर में भाजपा की सफलता में सक्षम सहयोगी के चुनाव की सबसे बड़ी भूमिका रही है. यूं तो भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में मिजोरम में भी आठ दलों का एक मोर्चा बनाया था. लेकिन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) नामक यह मोर्चा तब कामयाब नहीं हो सका था. राज्य की एकमात्र लोकसभा सीट उसके खाते में जाते-जाते रह गई थी. हालांकि यूडीएफ को कांग्रेस से महज 11 हजार और 1.4 फीसदी मत कम मिले थे.

2014 लोकसभा चुनाव में यूडीएफ में भाजपा और मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के अलावा जोरम नेशनलिस्ट पार्टी (जेडएनपी), मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (एमपीसी), मारालैंड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एमडीएफ), हमर पीपुल्स कन्वेंशन (एचपीसी), पैते ट्राइब्स काउंसिल (पीटीसी) और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) जैसी पार्टियां शामिल थीं. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राज्य के अगले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा इस मोर्चे को और मजबूत करने की तैयारी में महीनों पहले से जुटी हुई है. पूर्वोत्तर के शेष राज्यों में अपना परचम फहराने के बाद उसके कार्यकर्ताओं के आत्मविश्वास को भी मानो पंख लग गए हैं.

मिजोरम जीतने की भाजपा की योजना क्या है?

राज्य में कुछ महीने पहले तीन पार्टियों ने मिलकर जोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) नाम का एक मोर्चा बनाया है. इसके दो मुख्य दलों में जोरम नेशनलिस्ट पार्टी (जेडएनपी) और मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (एमपीसी) शामिल हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा और मिजो नेशनल फ्रंट दोनों की कोशिश है कि इस विधानसभा चुनाव में इस मोर्चे को अपने साथ जोड़ा जाए. इसके दो कारण बताए जा रहे हैं. पहला यह 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडएनपी और एमपीसी दोनों यूडीपी का हिस्सा रह चुके हैं. यानी ये दोनों भाजपा और एमएनएफ की पूर्व सहयोगी हैं. दूसरा कारण यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव में इन दलों को क्रमश: 17.4 और 6.2 फीसदी वोट मिले थे. इसका मतलब हुआ कि जेडएनपी और एमपीसी के साथ आने से एनडीए के वोट में करीब 23 फीसदी का इजाफा हो सकता है. इससे पिछले विधानसभा चुनाव में करीब 29 फीसदी वोट पाकर विपक्ष में बैठने वाले ​मिजो नेशनल फ्रंट के लिए कांग्रेस को हराना मुमकिन हो सकता है.

वैसे जानकारों की मानें तो राज्य में 87 फीसदी आबादी ईसाइयों की होने के चलते भाजपा को अपनी सीमाएं मालूम हैं. इसलिए वह त्रिपुरा की तरह मिजोरम में अपने दम पर सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर नहीं चल रही है. इसके बजाय वह 88 फीसदी ईसाई आबादी वाले नगालैंड से सीखने की कोशिश कर रही है जहां व्यावहारिक गठबंधन करके वह 60 सदस्यीय विधानसभा में 12 सीटें जीतने में सफल रही थी. दूसरी सीख उसे एक और ईसाई बहुल राज्य मेघालय से मिली थी जहां उसे नाममात्र की सफलता केवल इसलिए मिल पाई थी कि उसने वहां अकेले चुनाव लड़ने का जुआ खेला था.

भाजपा के शीर्ष नेता ‘मिशन मिजोरम’ को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे छोटी-बड़ी तमाम पार्टियों को अपने से जोड़ने में जुटे हुए हैं. इसके तहत पार्टी ने पिछले साल अक्टूबर में मारालैंड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एमडीएफ) का अपने में विलय कर लिया. हालांकि 2013 के विधानसभा चुनाव में एमडीएफ को महज एक फीसदी वोट मिले थे. भाजपा ने राज्य के तीन स्वायत्तशासी जिलों में से एक मारा आॅटोनॉमस डेवलपमेंट काउंसिल (एमएडीसी) के कई प्रभावशाली नेताओं को भी अपनी पार्टी में शामिल किया है.

पूर्वोत्तर की राजनीति समझने वाले कई लोग कुछ दूसरी वजहों से भी राज्य में कांग्रेस की हार का अनुमान लगा रहे हैं. ऐसे लोगों के अनुसार पूर्वोत्तर में भाजपा और एनडीए की हालिया जीत का मिजोरम पर भी बड़ा असर पड़ने की संभावना है. इसके अलावा मुख्यमंत्री ललथनहवला की संपत्ति के पांच साल में 24 गुना हो जाने के विवाद के तूल पकड़ने को भी वे राज्य सरकार की छवि के लिए अच्छा नहीं मान रहे हैं.

वहीं कई जानकार कई दलों के साथ गठबंधन करने की भाजपा की रणनीति को ‘गेमचेंजर’ करार दे रहे हैं. इनके अनुसार एमएनएफ, जेडएनपी, एमपीसी और भाजपा के बीच की ‘केमिस्ट्री’ ने यदि जमीन पर काम किया तो उनके वोटों का ‘अंकगणित’ मिजोरम की सत्ता से भी कांग्रेस का सफाया कर सकता है. क्योंकि पिछले विधानसभा में इन दलों को अलग-अलग 53 फीसदी से भी ज्यादा वोट मिले थे. ये कांग्रेस को मिले 44 फीसदी वोट से नौ फीसदी ज्यादा थे. यदि ऐसा हुआ तब देश की सबसे पुरानी पार्टी वाकई उत्तर में पंजाब और दक्षिण में पुडुचेरी तक ही सिमटकर रह जाएगी.

मिजोरम : देश का दूसरा सबसे छोटा राज्य

आबादी के लिहाज से मिजोरम देश के सबसे छोटे राज्यों में से एक है. केंद्र शासित राज्यों को छोड़ दें तो बाकी राज्यों में उससे कम आबादी केवल सिक्किम की है. 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी केवल 11 लाख है. इसे 1987 में पूर्ण राज्य बनाया गया था. उसी साल यहां पहला चुनाव हुआ था. पहले चुनाव में हिंसक आंदोलन से मुख्यधारा में लौटे मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार बनी थी. ललडेंगा राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने थे, हालांकि केवल दो साल बाद ही उनकी सरकार गिर गई थी. उसके बाद मौजूदा मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता ललथनहवला ने कमान संभाली. 1998 से 2008 की अ​वधि छोड़ दें तो वे ही अब तक राज्य का नेतृृत्व कर रहे हैं. एक लोकसभा सीट वाले इस राज्य में विधानसभा की 40 सीटें हैं.