रूस में 18 मार्च को राष्ट्रपति-पद के चुनाव का पहला दौर है. शायद इसी कारण से रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने देश की स्थिति के बारे में हर साल दिसंबर में होने वाले अपने पारंपरिक भाषण को इस बार पहली मार्च तक के लिए टाल दिया. मॉस्को में एक हज़ार से अधिक सांसदों और आमंत्रित अतिथियों को संबोधित करते हुए सबसे पहले उन्होंने एक नये और व्यापक समाज कल्याण कार्यक्रम की घोषणा की.

राष्ट्रपति पुतिन ने कहा कि देश में इस समय दो करोड़ लोग ग़रीबी में जी रहे हैं और छह वर्षों के उनके अगले कार्यकाल में यह संख्या आधी हो जायेगी. यह भी कि परिवारों की स्थिति सुधारने और बच्चों की देखभाल के लिए बजट की धनराशि 40 प्रतिशत बढ़ा दी जायेगी. उनका कहना था कि 2020 से हर साल 50 लाख नये घरों का निर्माण किया जायेगा. उन्होंने शहरी और ग्रामीण विकास के लिए अधिक धन ख़र्च करने और अगले दशक के मध्य तक रूस को विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना देने का भी वादा किया.

रूस सबसे बड़ी परमाणु महाशक्ति!

दो घंटों के अपने संबोधन में राष्ट्रपति पुतिन ने एक घंटा दुनिया को – मुख्य रूप से यूरोप और अमेरिका को – यह संदेश देने में लगाया कि रूस पहले भी एक परमाणु महाशक्ति था, लेकिन अब और भी बड़ी महाशक्ति बन गया है. उसने अमेरिका के प्रक्षेपास्त्र-भेदी रक्षाकवच की काट करने वाले ऐसे-ऐसे परमाणु हथियार बना लिये हैं, जिन्हें कोई रोक या भेद नहीं सकता. दो बड़े-बड़े पर्दों पर विडियो तथा एनिमेमेशन फि़ल्मों की मदद से उन्होंने पांच नये अस्त्रों का परिचय भी दिया. वे या तो अंतरमहाद्वीपीय परमाणु प्रक्षेपास्त्र (रॉकेट/ मिसाइल) और क्रूज़ मिसाइल हैं या परमाणु शक्ति से चलने वाले अतिदूरगामी दूसरे अस्त्र.

राष्ट्रपति पुतिन ने कहा, ‘उन सब से, जो पिछले 15 वर्षों से हथियारों की होड़ की आग में घी डालते रहे है, रूस पर एकतरफ़ा बढ़त चाहते हैं, अवैध प्रतिबंध लगा कर हमारे देश के विकास को रोक रहे हैं, मैं कहना चाहता हूं कि आप रूस को रोकने में विफल रहे हैं.’ अमेरिका पर उन्होंने आरोप लगाया कि 2002 से वह प्रक्षेपास्त्ररोधक भावी रक्षाप्रणाली पर रूस के साथ मिल कर काम करने के सारे प्रयासों की अनदेखी करता रहा. व्लादिमीर पुतिन ने कहा, ‘हमारी बात न तो कोई सुनना चाहता था और न हमसे कोई गंभीरतापूर्वक बात करना चाहता था. इसलिए अब हमें (ध्यान से) सुनें... बात ऐसी प्रक्षेपास्त्र प्रणालियों की है, जिन्हें हमने प्रक्षेपास्त्र-रक्षक संधि से अमेरिका के एकपक्षीय ढंग से अलग हो जाने और अमेरिका व अमेरिका से बाहर अपनी अलग प्रणालियां तैनात करने के उसके क़दमों के जवाब में बनाया है.’

नाटो का रूस की सीमा तक विस्तार

अमेरिका ने अपने नेतृत्व वाले नाटो सैन्य संगठन का यूरोप में रूस की पश्चिमी सीमा तक विस्तार कर दिया है. विभाजित जर्मनी के एकीकरण के समय 1990 में अमेरिका ने वचन दिया था कि वह पूर्वी यूरोप की तरफ नाटो का विस्तार नहीं करेगा. लेकिन उसने न सिर्फ नाटो का विस्तार किया है, बल्कि रूसी सीमा पर ऐसे प्रक्षेपास्त्र-मारक रॉकेट तैनात कर दिये हैं, जो कहने के लिए ईरानी या उत्तर कोरियाई प्रक्षेपास्त्रों को मार-गिराने के लिए हैं, पर हैं वास्तव में रूस को घेरने के लिए. रूस की ठीक सीमा पर होने के कारण वे रूस द्वारा दागे गये हर प्रक्षेपास्त्र को तुरंत पहचान कर हवा में नष्ट कर सकते हैं.

ये अमेरिकी रॉकेट पूर्वी यूरोप के ऐसे देशों की जमीन पर तैनात किये गये हैं, जो 1990 वाले दशक में, भूतपूर्व सोवियत संघ के बिखरने तक उसके नेतृत्व वाले ‘वॉर्सा संधि संगठन’ के सदस्य हुआ करते थे, या सोवियत संघ के ही अपने गणराज्य थे. एस्तोनिया, लातविया और लिथुआनिया ऐसे ही तीन देश हैं, जो पहले सोवियत संघ का अंग हुआ करते थे. वहां इस समय नाटो के रॉकेट ही नहीं, सैनिक भी तैनात हैं.

रूस के साथ साझेदारी नहीं करने का बदला

रूस का यह भी मानना है कि 1962 में यदि अमेरिका अपने पड़ोसी देश क्यूबा में सोवियत संघ के प्रक्षेपास्त्रों के होने पर परमाणु युद्ध तक की धमकी दे सकता है, तो उसी सोवियत संघ का उत्तराधिकारी रूस अपने पड़ोसी देशों में अमेरिकी रॉकेट तैनात किये जाने का विरोध क्यों नहीं कर सकता. यह बात सच है कि शुरू में रूस अमेरिका के साथ मिल कर कोई साझी प्रक्षेपास्त्ररोधी रक्षाप्रणाली विकसित करना चाहता था, पर अमेरिका ही इसके लिए तैयार नहीं था, अमेरिका का समझना था, और आज भी है, कि रूस के साथ साझेदारी करना उसे अपने बराबर की महाशक्ति मान लेने के समान होगा, जो उसे बिल्कुल स्वीकार नहीं.

एक मार्च को मॉस्को में रूसी राष्ट्रपति ने अपने जिन नये परमाणु अस्त्रों का बखान किया, उन्हें बनाने के पीछे एक मुख्य उद्देश्य यह दिखाना भी था कि परमाणु अस्त्रों की दौड़ में रूस अमेरिका से अब आगे बढ़ गया है. उन्होंने कम से कम पांच ऐसी नयी अस्त्र-प्रणालियों का उल्लेख किया, जिनमें से प्रत्येक, उनके कहने के अनुसार, प्रक्षेपास्त्रों से बचाव के अमेरिकी रक्षाकवच को भेदने की क्षमता रखती है.

परमाणु शक्ति से चलने वाले अस्त्र

अब तक के परमाणु प्रक्षेपास्त्र किसी एक परमाणु-आयुधशीर्ष (वॉरहेड/ बम) के वाहक होते हैं, न कि वे खुद परमाणुशक्ति से चलते हैं. उन्हें अपनी गति और शक्ति किसी तरल या ठोस ईंधन को जलाने वाले इंजनों से मिलती हैं. राष्ट्रपति पुतिन ने जिन नये अस्त्रों के विकास का दावा किया है, उनकी नवीनता यह है कि उनमें संभवतः ऐसे परमाणु रिएक्टर लगे हुए हैं, जो उन्हें परमाणु ऊर्जा से ही चलते भी हैं.

पूतिन ने ‘सर्मात-38’ नाम के एक ऐसे अंतरमहाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्र (आईबीएम) का उल्लेख किया, जो 200 टन भारी है और अपने साथ कई परमाणु बम लेकर उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के ऊपर से उड़ता हुआ विश्व में कहीं भी पहुंच कर अपने लक्ष्यों पर प्रहार कर सकता है. 2020 से वही ‘वोएवोदा’ नाम के अंतरमहाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्र की जगह लेगा, जिसे नाटों ने ‘एसएस-18’ नाम दे रखा है. 11 हज़ार किलोमीटर दूर तक जा सकने वाले ‘सर्मात-38’ को नाटो ने ‘शैतान-2 ‘ नाम दिया है.

हिरोशिमा बम से दो हज़ार गुना अधिक विस्फोटक

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह रूसी प्रक्षेपास्त्र 40 मेगाटन तक विस्फोटक शक्ति वाले परमाणु-आयुधशीर्ष(वॉरहेड/ बम) अपने साथ ले जा सकता है. यह विस्फोटक क्षमता जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराये गये अमेरिकी परमाणु बमों की अपेक्षा दो हज़ार गुना अधिक है. ‘सर्मात-38’ की उड़ान-गति सात किलोमीटर प्रतिसेकंड होने के कारण वह इस समय की प्रक्षेपास्त्ररोधक रक्षाप्रणालियों की पहुंच के बाहर होगा. अनुमान है कि हर प्रक्षेपास्त्र में 10 बड़े या 16 छोटे आयुधशीर्षों तक के लिए जगह होगी, शत्रुपक्ष की बचाव प्रणाली को धोखा देने के लिए वह नकली बमों का विस्फोट कर सकता है.

रूसियों का मानना है कि अमेरिका अपने यहां ‘प्रॉम्प्ट ग्लोबल स्ट्राइक’ (पीजीएस/ त्वरित वैश्विक प्रहार) नाम की जिस बचाव-प्रणाली का निर्माण करने जा रहा है, वह ‘सर्मात-38’ का बाल बांका तक नहीं कर सकेगी. ‘पीजीएस’ किसी बाहरी हमले का ख़तरा भांपते ही, एक ही घंटे के भीतर, हाइपरसॉनिक गति वाले रॉकेट चला कर दुनिया के किसी भी कोने में प्रहार करते हुए ख़तरा खत्म करने की अमेरिकी रणनीति है.

हाइपरसॉनिक गति

ध्वनि की गति से कम से कम पांच गुना अधिक गति को हाइपरसॉनिक गति माना जाता है. ध्वनि की गति हवा की नमी और तापमान के अनुसार अलग-अलग होती है. सूखी हवा और शून्य डिग्री सेल्सियस तापमान होने पर यह गति, उदाहरण के लिए, 331.2 मीटर प्रतिसेकंड (1192 किलोमीटर प्रतिघंटा) और तापमान 20 डिग्री सेल्सियस होने पर 343 मीटर प्रतिसेकंड (1235 किलोमीटर प्रतिघंटा) हो जाती है.

राष्ट्रपति पुतिन ने जिस दूसरे सनसनीख़ेज़ अस्त्र का गुणगान किया, वह परमाणु इंजन से चलने और कम ऊंचाई पर रह कर उड़ने वाली एक ऐसी कूज़़ मिसाइल है, जो अपने साथ परमाणु आयुधशीर्ष (बम) लेकर अनिश्चित काल तक हवा में उड़ती रह सकती है और दुनिया में हर जगह पहुंच सकती है. साथ ही वह किसी पक्षी की तरह दायें-बायें, ऊपर-नीचे जाते और दिशाएं बदलते हुए अपने लक्ष्य पर प्रहार कर सकती है. उसके रास्ते का पूर्वानुमान लगा पाना या उसे राडार के द्वारा देख पाना इतना असाध्य बताया जा रहा है कि वह इस समय की या भावी रक्षाप्रणालियों की पकड़ में नहीं आ सकेगा. राष्ट्रपति पुतिन ने कहा कि 2017 के अंत में उसका सफल परीक्षण हुआ है.

हवा से हवा में मारक प्रक्षेपास्त्र

इसी प्रकार रूस ने किसी हाइपरसॉनिक विमान द्वारा हवा से हवा में चलाने योग्य एक ऐसा प्रक्षेपास्त्र बनाया है, जो हवाई सुरक्षा प्रणालियों को चकमा देता हुआ और ध्वनि की गति से कई गुना तेज़ चलता हुआ दो हजार किलोमीटर दूर तक जा कर प्रहार कर सकता है. उसे ‘किंशाल’ (खंजर) नाम दिया गया है. इसे परमाणु हथियारों से भी लैस किया जा सकता है. बताया जाता है कि उसके सभी परीक्षण पूरे हो चुके हैं और बीते दिसंबर में वह रूसी वायुसेना के अस्त्रागार में शामिल भी कर लिया गया है.

नये उड़नशील अस्त्रों में से एक और को राष्ट्रपति पुतिन ने एक ऐसा प्रक्षेपास्त्र बताया जो ध्वनि की अपेक्षा 20 गुना तेज़ (हाइपरसॉनिक) गति के साथ किसी धूमकेतु (पुच्छल तारे) या ‘जलते हुए गोले’ की तरह उड़ता है और मनचाहे ढंग से संचालित किया जा सकता है. उसे ‘अवांतगार्द’ नाम दिया गया है. रूसी समाचार एजेंसी ‘तास’ के अनुसार उसके परीक्षण भी सफलतापूर्वक पूरे हो गये हैं.

चालकरहित ड्रोन पनडुब्बी

रूसी नौसेना के लिए एक ऐसी परमाणुशक्ति चालित ड्रोन पनडुब्बी बनायी गयी है, जो बहुत अघिक गहराई पर स्वचालित ढंग से, यानी बिना चालक के, बहुत ही तेज़ी के साथ चल सकती है. उसकी बनावट राडार के लिए अदृश्य रहने वाले विमानों की तरह ऐसी है कि शत्रुपक्ष को उसकी टोह न मिल सके. यह पनडुब्बी, जिसे एक प्रकार का स्वचालित टारपीडो भी कहा जा रहा है, परमाणु अस्त्र लेकर चलेगी. रूसी राष्ट्रपति का कहना था कि उसका दिसंबर 2016 में सफलतापूर्वक परीक्षण किया जा चुका है.

रूसी राष्ट्रपति का यह भी कहना था कि उनके वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने ट्रकों पर रख कर इस्तेमाल करने लायक लेज़र किरणों वाले हथियार भी बनाये हैं, जिनके बारे में और अधिक जानकारी वे नहीं देना चाहते. उन्होंने आश्वस्त किया कि इन हथियारों का तभी प्रयोग किया जायेगा जब सीधे रूस पर या उसके किसी मित्र देश पर कोई परमाणु हमला होगा. उन्होंने यह भी कहा कि रूस के शत्रु इस भ्रम में न रहेंं कि यह सब ‘ब्लफ़’ (झांसा) है. उनकी बातों को गंभीरता से लिया जाये.

पश्चिम को रूसी दावों पर संदेह है

लेकिन देखने में यही आ रहा है कि पश्चिमी देशों के मीडिया और अस्त्र-शस्त्र विशेषज्ञ राष्ट्रपति पुतिन की बातों को विशेष गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. उनका तर्क है कि रूसी राष्ट्रपति के बताए कुछ हथियारों की भनक पश्चिम को पहले ही मिल चुकी है और कुछ तकनीकी दृष्टि से इतने जटिल और आर्थिक दृष्टि से इतने महंगे हैं कि यह विश्वास हो नहीं पाता कि रूस ने उन्हें बना लिया होगा. अधिकतर का यही मानना है कि रूस में राष्ट्रपति-पद के चुनाव से दो ही सप्ताह पहले पुतिन का भाषण अपने मतदाओं को लुभाने के लायक तो हो सकता है, पर यह पश्चिम को डराने के लायक नहीं है.

संदेह करने वाले कह रहे हैं कि रूस में पिछले कुछ वर्षों में रॉकेटों और उपग्रहों के प्रक्षेपण में हुई गलतियों, दुर्घटनाओं और गड़बड़ियों को देखते हुए यह विश्वास करना सरल नहीं है कि अचानक वहां सब कुछ फर्राटे से चल रहा है. लंदन स्थित ‘अंतरराष्ट्रीय सामरिक अथ्ययन संस्थान’ (आईआईएसएस) के डगलस बैरी ने एक टिप्पणी में कहा, ‘सबसे चौंकाने वाला हथियार है परमाणु शक्ति से चलने वाली क्रूज़ मिसाइल, जोकि कोई पूरी तरह नयी अवधारणा नहीं है. 1960 वाले दशक में उसके बारे में बातें हुआ करती थीं, पर वह ढेर-सारी बाधाओं में फंस कर रह गई. दिलचस्प इतना ही है कि रूसी अब उसकी तरफ लौट रहे हैं.’ बैरी का कहना है कि यह प्रौद्योगिकी वर्तमान शक्तिसंतुलन को बदल देगी पर उस पर विश्वास करने के लिए वे कुछ और प्रमाण देखना चाहेंगे.

वज़न और दूरी का अंतर्विरोध

रॉकेट तकनीक के जानकार मानते हैं कि यदि किसी प्रक्षेपास्त्र को बहुत दूर तक जाना है, तो उसे उतने ही अधिक ईंजन की भी आवश्यकता पड़ेगी. दूसरी ओर, ईंधन जितना अधिक होगा, प्रक्षेपास्त्र उतना ही भारी भी हो जायेगा. ईंधन के तौर पर यदि परमाणु ऊर्जा का उपयोग किया जा सके, तो वज़न भी घटेगा और मारक दूरी भी बढ़ेगी.

लेकिन, जर्मनी में प्रक्षेपास्त्र प्रौऔद्योगिकी के प्रोफ़ेसर रोबेर्ट श्मूकर का मत है कि यह हो नहीं सकता कि रूसियों ने परमाणु ऊर्जा से चलने वाला ऐसा कोई रॉकेट बना लिया है, जिसे वे तैनात भी कर सकें. उनका कहना है कि इसके लिए वर्षों तक इतने सारे परीक्षण आदि करने पड़ेंगे कि उनके कारण पैदा होने वाले रेडियोधर्मी विकिरण को छिपाया नहीं जा सकता. इस विकिरण से सबके कान खड़े हो जायेंगे कि रूसी ज़रूर कोई ख़तरनाक काम कर रहे हैं.

सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती

प्रोफेसर श्मूकर के अनुसार सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती यह है कि हर परमाणु रिएक्टर बहुत गर्मी पैदा करेगा और उसे प्रक्षेपास्त्र की पूरी उड़ान के दौरान लगातार ठंडा रखना पड़ेगा. दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि जब प्रक्षेपास्त्र बहुत तेज़ी से उड़ रहा होगा, तब आस-पास की हवा के साथ उसके अत्यधिक घर्षण के कारण उसके बाहरी आवरण का तापमान बेहद बढ़ जायेगा. वे कहते हैं, ‘यानी सबसे पहले तो ऐसी सही सामग्री चाहिये, जो प्रचंड तेज़ गति और उतने ही प्रचंड तापमान को सह सके.’ बताया जाता है कि 1950 और 60 वाले दशक में अमेरिका में परमाणु ऊर्जा चालित प्रक्षेपास्त्र बनाने का प्रयास हो चुका है, पर इन्हीं असाध्य चुनौतियों के कारण वह विफल रहा.

इसी संदर्भ में कुछ दूसरे लोगों का मानना है कि अनिवार्य नहीं है कि जो सफलता 60-70 साल पहले नहीं मिली, वह कभी नहीं मिल सकती! या जो चुनौती अमेरिकी इंजीनियर हल नहीं कर पाये, उसे रूसी इंजीनियर भी कभी हल नहीं कर सकते! जहां तक प्रचंड तापमान सहने लायक सही और हल्की सामग्री का प्रश्न है, तो यह चुनौती सुपरसॉनिक (पारध्वनिक) युद्धक विमानों और इस बीच रिटायर कर दिये गये अमेरिकी अंतरिक्ष शटल यानों के निर्माण के समय भी हल करनी पड़ी थी और अंततः हल कर ली गयी. सवाल ध्वनि की गति से दो या तीन गुनी अधिक गति वाले सुपरसॉनिक विमानों नहीं, पांच से 20 गुना अधिक गति वाले हाइपरसॉनिक प्रक्षेपास्त्रों और क्रूज़ मिसाइलों का ज़रूर है, पर अतीत का अनुभव यही है कि हर प्रश्न का हल कभी न कभी, किसी न किसी को मिल ही जाता है.