1927 के दौरान तमिलनाडु में मदुरै के दो युवक श्रीनिवास वरदन और सोमयाजुलु मद्रास घूमने आए. इनमें से एक 30 वर्ष का हिंदू था और दूसरा 25 वर्ष का मुसलमान. मद्रास के दर्शनीय स्थलों में घूमते हुए उन्होंने यहां की माउंट रोड पर ब्रिटिश जनरल जेम्स जॉर्ज स्मिथ नील की तांबे की बड़ी सी मूर्ति देखी. जनरल नील 1857 के गदर के दौरान अपनी क्रूर कार्रवाइयों के लिए प्रसिद्ध हुए थे. इन दोनों युवकों से रहा नहीं गया. उन्होंने उस मूर्ति को तोड़ना शुरू कर दिया. तांबे की मूर्ति मजबूत थी. थोड़ा बहुत ही तोड़ पाए होंगे कि सार्जेन्ट आ पहुंचा और उन्हें पकड़कर थाने ले गया. उनपर मुकदमा चला. उन्होंने न्यायाधीश के सामने पूरे जोश में कहा- ‘सरकारी कानून के मुताबिक तो हम अपराधी हैं, लेकिन अपनी नज़र में नहीं.’

नील की मूर्ति तोड़े जाने के दौरान महात्मा गांधी मद्रास में ही थे. तब बहुत से नवयुवक उनसे मिलने आए और उन्होंने मूर्ति हटाने के आंदोलन में उनका सहयोग मांगा. छह और सात सितंबर, 1927 को लगातार दो दिनों तक इन युवा आंदोलनकारियों के साथ गांधी की एक लंबी बहस चली और इसके बाद गांधी ने उनको अपना नैतिक समर्थन दे दिया. इसके बाद कुछ लोगों ने महात्मा गांधी को चिट्ठी लिखकर उन्हें उनके अहिंसा-व्रत की याद दिलाई थी और कहा था कि इससे अंग्रेजों के प्रति व्यक्तिगत घृणा फैल सकती है.

गांधीजी ने इस तर्क को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार तो किया था, लेकिन कहा था कि इन ब्रिटिश जनरलों की मूर्ति के साथ इनके सम्मान में जो शब्द लिखे गए थे, उनमें भारतीयों के साथ की गई बर्बरता का महिमामंडन होता था. साथ ही गांधीजी ने आंदोलनकारी युवकों को भी चेताया था कि विरोध का तरीका केवल ‘सत्याग्रह’ ही होना चाहिए. इन युवकों के लिए गांधीजी के शब्द थे - ‘जिस प्रकार पौष्टिक-से-पौष्टिक दूध को जहर की छोटी सी बूंद ही पीने लायक नहीं रहने देती, उसी प्रकार थोड़ी सी अशुद्धता भी सत्याग्रह संघर्ष को आंदोलन के मूल उद्देश्य और आंदोलनकारियों के लिए खतरनाक अस्त्र बना देती है.’

लेकिन आज त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा के साथ जो व्यवहार हुआ है, वह भारतीय समाज और राजनीति की कथित लोकतांत्रिक परिपक्वता की कलई खोल देता है. यह हमें उन्हीं घटनाओं की याद दिलाता है जो कुछ समय पहले अफ्रीकी देशों में महात्मा गांधी की प्रतिमा के साथ हुआ था. प्रकारांतर से इसे बामियान में बुद्ध की प्रतिमा के साथ हुए व्यवहार से जोड़कर भी देखा जा सकता है. इन सभी घटनाओं के पीछे कई प्रवृत्तिगत समानताएं देखी जा सकती हैं. पहली समानता तो प्रतिक्रियावादी कट्टरता और असहिष्णुता है. और दूसरी समानता है, इतिहास और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बारे में अधकचरी जानकारी और समझ.

प्रसंगवश हम लेनिन का ही उदाहरण लें. लेनिन का नाम सामने आते ही एक क्रांतिकारी की छवि सामने आती है, जिसने गरीबों का शोषण करनेवाले रूसी सामंतवाद और जारशाही के खिलाफ संघर्ष किया. इस क्रांति के दौरान और संभवतः बाद में भी हिंसा हुई. लेकिन लेनिन का निजी व्यक्तित्व और उनकी विचारधारा इस हिंसा के अनिवार्य महिमामंडन से अछूती रही. बोल्शेविक क्रांति ने आगे भी पूंजीवादी शोषण के खिलाफ आंदोलनों को एक आदर्श के रूप में प्रेरित किया.

हालांकि भविष्य में कुछ तो यह आंदोलन अपने स्वयं के अंतर्विरोधों का शिकार हुआ और दूसरे स्टालिन जैसे परवर्ती शासकों ने हिंसा का क्रूरतम इस्तेमाल कर लेनिन की विचारधारात्मक विरासत को बहुत नुकसान पहुंचाया. इस बीच स्वयं महात्मा गांधी तक लेनिन के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए थे. हालांकि बोल्शेविक क्रांति या साम्यवाद की विचारधारा के मानवीय पक्षों को स्वीकारते हुए भी, गांधी ने उसके अंतर्विरोधों को बहुत पहले देख लिया था.

लेनिन के व्यक्तित्व में जिस बात ने महात्मा गांधी को सबसे अधिक प्रभावित किया था, वह थी उनकी सादगी. फरवरी, 1925 में एक भारतीय क्रांतिकारी ने महात्मा गांधी को चिट्ठी लिखकर पूछा था कि सिक्खों के दसवें गुरु गोबिंद सिंहजी ने भी तो अच्छे उद्देश्य के लिए युद्ध लड़ा था. क्या वह हिंसा न्यायोचित नहीं थी? क्या वाशिंगटन, गैरीबाल्डी, लेनिन और कमाल पाशा देशभक्त नहीं थे. इसके जवाब में नौ अप्रैल, 1925 के ‘यंग इंडिया’ में गांधीजी ने लिखा था- ‘पहली बात तो यह कि गुरु गोबिंद सिंह तथा दूसरे उल्लिखित व्यक्ति गुप्त हत्या के कायल नहीं थे. ...इन देशभक्तों के पास अपने आदमी थे और एक वातावरण था. इसलिए उनकी (भारत के तत्कालीन क्रांतिकारियों की) कार्रवाइयों की तुलना गुरु गोबिंदसिंह, गैरीबाल्डी, वाशिंगटन या लेनिन से करना बहुत भ्रामक और भयावह होगा.’

अक्टूबर, 1928 में किसी ने गांधी को पत्र लिखकर बोल्शेविज्म पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए कहा. इसके जवाब में 21 अक्टूबर, 1928 को ‘नवजीवन’ में गांधी ने लिखा - ‘बोल्शेविज्म को जो कुछ थोड़ा-बहुत मैं समझ सका हूं वह यही कि निजी मिल्कियत किसी के पास नहीं हो— प्राचीन भाषा में कहें तो व्यक्तिगत परिग्रह न हो. यह बात यदि सभी लोग अपनी इच्छा से कर लें, तब तो इसके जैसा कल्याणकारी काम दूसरा नहीं हो सकता. परंतु बोल्शेविज्म में जबरदस्ती से काम लिया जाता है. ...मेरा दृढ़ विश्वास है कि जबरदस्ती से साधा गया यह व्यक्तिगत अपरिग्रह दीर्घकाल तक नहीं टिक सकता. ...फिर भी बोल्शेविज्म की साधना में असंख्य मनुष्यों ने आत्मबलिदान किया है. लेनिन जैसे प्रौढ़ व्यक्ति ने अपना सर्वस्व उसपर निछावर कर दिया था; ऐसा महात्याग व्यर्थ नहीं जा सकता और उस त्याग की स्तुति हमेशा की जाएगी.’

13 जनवरी, 1929 के ‘नवजीवन’ में विद्यार्थियों को संबोधित एक लेख में गांधी कहते हैं- ‘आत्मबल और पशुबल दोनों प्रकार के युद्धों का रास्ता एक खास हद तक एक ही है. इस्लाम में खलीफाओं ने, ईसाई धर्म में क्रूसेडरों ने, राजनीति में क्रामवेल और उसके योद्धाओं ने भोग-विलास का अपूर्व त्याग किया था. आधुनिक उदाहरण लें तो लेनिन, सन यात-सेन आदि ने सादगी, दुःखादि की सहनशक्ति, भोग-त्याग, एकनिष्ठा और सतत जागृति का योगियों को भी शरमाने वाला नमूना दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है.’

मई, 1929 में किसी ने गांधीजी से पत्र लिखकर पूछा कि क्या देश सेवा के लिए वकालत की पढ़ाई करना जरूरी है? इसके जवाब में 19 मई, 1929 के ‘नवजीवन’ में गांधी लिखते हैं- ‘प्रताप, शिवाजी, नेलसन, वेलिंग्टन, क्रूगर वगैरह वकील नहीं थे. अमानुल्ला वकील नहीं हैं, न लेनिन ही वकील था. इन सबमें वीरता, स्वार्थ-त्याग, साहस आदि गुण थे, यही वजह थी कि वे इतनी सेवा कर सके.’

1932 में प्रकाशित जेम्स मैक्सटन की पुस्तक ‘लेनिन’ भी महात्मा गांधी ने पढ़ी थी. इसका पता हमें 28 सितंबर, 1935 को उनके द्वारा लिखे एक पत्र से चलता है. 17 जुलाई, 1941 को एक पत्र में गांधी लिखते हैं - ‘स्टालिन और लेनिन में मैं बड़ा फरक पाता हूं. लेनिन का रूस आज नहीं रहा.’ 16 जुलाई, 1945 को साम्यवादी शांता पटेल को एक पत्र में गांधी लिखते हैं- ‘कम्युनिज़्म और कम्युनिस्ट के बीच भेद करना. फिर कम्युनिज़्म भी मार्क्स का एक है, लेनिन का दूसरा और स्टालिन का तीसरा. फिर तीसरे के भी दो भेद हैं. गांधी एक, गांधीवाद दूसरा और गांधीवादी तीसरे. ऐसे भेद रहते ही हैं और रहा ही करेंगे. कच्ची बुद्धि वाले ही इनमें से किसी एक के साथ हो जाते हैं.’

1940 के दशक में भारतीय साम्यवादियों द्वारा की जानेवाली तोड़-फोड़ की कार्रवाइयों की गांधीजी ने लगातार आलोचना की थी. इस पर 11 जून, 1947 को मनु गांधी ने शिकायती लहजे में महात्मा गांधी से पूछा कि आप साम्यवादियों की इतनी आलोचना क्यों करते हैं? इसके जवाब में गांधीजी ने कहा था- ‘छिपकर सरकारी इमारतों को आग लगाना, तार और डाक की तारें काट डालना, इन बातों से क्या समानता आनेवाली है? और इनसे जो नुकसान होता है वह जनता के ही पैसे का न? इसी से मैं इस वाद को नहीं मानता. मेरा साम्यवाद तो सौम्यता और बहादुरी से भरा है. छिपकर दूसरों को नुकसान पहुंचाना, नामर्दगी, जंगलीपन और कायरता का सूचक है.’

‘...और हमारे तो खून में ही साम्यवाद अथवा समाजवाद भरा है. यदि हम अपनी प्रार्थना, अपने वेद अथवा शास्त्रों को टटोलें तो हमें ऐसे अनेक दृष्टांत मिलेंगे. हम रोज सवेरे की प्रार्थना में क्या कहते हैं?न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्.कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्..’ यानी ‘मुझे न तो राज्य की इच्छा है और न स्वर्ग की. मुझे तो मोक्ष की भी इच्छा नहीं है. मेरी तो केवल यही कामना है कि दुःख से पीड़ित जनों की पीड़ा हर सकूं.’ साम्यवाद के नेता लेनिन लोगों को इससे ज्यादा और क्या दे सकते हैं कि हम उन पर ज्यादा मोहित हो जाएं.’

आज पूरी दुनिया में बेरोजगार युवाओं का एक बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक कट्टरता और विचारधारात्मक प्रतिक्रियावाद के चंगुल में फंसता जा रहा है. अपने दुराग्रहों की तात्कालिक संतुष्टि के लिए मूर्तियों और ऐतिहासिक धरोहरों को ध्वस्त करना इनके लिए सबसे आसान कार्य होता है. वैसे देखा जाए तो प्रतिक्रियावादी महिमामंडन के जोर में किसी एक शख्सियत की बेशुमार मूर्तियां लगाना भी ऐसे ही किसी दूसरे शख्सियत की मूर्तियां लगाने और हटाने जैसी प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है.

मूर्तियों से कभी भी विचार जिंदा नहीं रहते, बल्कि मूर्तियां अक्सर जड़तावाद, व्यक्तिपूजा और सामाजिक टकरावों को बढ़ावा देती हैं. सड़कों, भवनों, मैदानों, हवाई अड्डों से लेकर योजनाओं तक में हम इस नाम और मूर्ति की प्रतिक्रियावादी राजनीति को घटित होते देख सकते हैं. इस प्रतिक्रियावाद के नशे में जिस गति से और जिस संख्या में हम मूर्तियां लगाते जा रहे हैं, इससे आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक पर्यावरणीय समस्या भी खड़ी हो सकती है.

क्या हम आशा करें कि हमारी नई नस्लें ‘मूर्तिभंजन’ का सही अर्थ लेते हुए, मनुष्यता-विरोधी सामाजिक रुढ़ियों को तोड़ते हुए आगे बढ़ेंगी और स्वयं को असली ‘मूर्तिभंजक’ साबित करेंगी. उनको बस इतना ध्यान रखना होगा कि ऐसे मूर्तिभंजन के लिए हथौड़े या बुल्डोजर की जरूरत नहीं होती, उसके लिए जरूरत होती है—विनययुक्त मेधा की, वैज्ञानिक चेतना की, ऐतिहासिक व्यक्तित्वों में यथासंभव गुणदर्शन की, केवल विचार और प्रेम की शक्ति में विश्वास करने की.