मंगलवार को उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग-उन ने अपने बदले रुख से सभी को चौंका दिया. किम जोंग उन ने राजधानी प्योंगयांग में उनसे मिलने आए एक दक्षिण कोरियाई प्रतिनिधिमंडल से कहा कि अगर सुरक्षा की गारंटी मिले तो वे अमेरिका से बातचीत करने और अपने परमाणु हथियार छोड़ने के लिए तैयार हैं. इस दौरान उत्तर कोरियाई तानाशाह ने उम्मीद जताई कि जल्द ही दोनों कोरियाई देश एक बार फिर एकजुट होकर काम करेंगे. दोनों देशों के बीच अंतर कोरियाई सम्मलेन आयोजित करने को लेकर भी सहमति बन गई है. उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच बनी इस सहमति को भी एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि यह सम्मलेन 1950 के दशक में हुए कोरियाई युद्ध के बाद से अपनी तरह का सिर्फ तीसरा सम्मलेन है.

अभी कुछ महीने पहले ही अमेरिका को परमाणु हमले की धमकी देने वाले उत्तर कोरिया के रुख में अचानक आए इस बदलाव ने कई जानकरों को भी हैरान कर दिया है. दुनिया भर के विश्लेषक किम जोंग के रुख में आई नरमी के पीछे कई कारण मानते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद बदली अमेरिकी रणनीति

कूटनीति के ज्यादातर विश्लेषक उत्तर कोरिया के बदले रुख के पीछे डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति को मानते हैं. उनके मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति ने उत्तर कोरिया को लेकर जो रणनीति अपना रखी थी उसे देखते हुए जल्द ही ऐसा होने की संभावना थी. इन लोगों की मानें उत्तर कोरिया के रुख में नरमी की बड़ी वजह डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गये प्रतिबंध हैं जिन्होंने उत्तर कोरियाई अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है.

सोल स्थित कोरिया इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल इकनॉमिक पॉलिसीज के वरिष्ठ विश्लेषक लिम सू-हो एक साक्षात्कार में कहते हैं कि ट्रंप के दबाव के चलते पहले बीते सितंबर में चीन ने उत्तर कोरिया जाने वाले डीजल और गैस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया. उसके बाद नवंबर में यूएन ने उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध कड़े करते हुए उसे होने वाले पेट्रोलियम पदार्थों के निर्यात में करीब 90 फीसदी की कटौती का फैसला ले लिया. सू-हो के मुताबिक इसके बाद ही साफ़ हो गया था कि 2018 में उत्तर कोरिया की आर्थिक स्थिति अपने सबसे बुरे दौर में पहुंचने वाली है क्योंकि चीन हमेशा से उसके लिए एक आखिरी उम्मीद की तरह था.

बीते जनवरी में किम जोंग के राष्ट्र के नाम संबोधन में उत्तर कोरिया की कमजोर आर्थिक स्थिति का अंदाजा लग गया था. दक्षिण कोरियाई मीडिया की मानें तो किम अपने भाषण में ऐसी बातें कहीं जिनके लिए वे नहीं जाने जाते. उन्होंने अपने भाषण में कई बार देश की कमजोर आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए कृषि और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों को उठाने की जरूरत पर जोर दिया. किम जोंग उन ने युवाओं से अपने पूरे सामर्थ्य के साथ देश के लिए काम करने की अपील भी की. उद्योग चलाने वालों से बिजली बचाने और स्थानीय कच्चे माल के जरिये ही ज्यादा उत्पादन करने पर भी जोर दिया गया.

उत्तर कोरिया में रह चुके ब्रिटेन के पूर्व उच्चायुक्त जॉन एवरर्ड एक अमेरिकी न्यूज़ एजेंसी को बताते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप से पहले आए अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भी उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाए थे. लेकिन, इस मामले में उनमें और डोनाल्ड ट्रंप में बड़ा अंतर यह देखा गया कि ट्रंप ने प्रतिबंधों को कड़े करने और सख्ती से लागू कराने पर जोर दिया. डोनाल्ड ट्रंप लगभग हर दिन उत्तर कोरिया पर स्थिति का जायजा लेते हैं. उन्होंने न केवल सहयोगी देशों से प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करवाया है बल्कि चीन से उत्तर कोरिया को मिलने वाली राहत भी काफी हद तक बंद कराने में सफलता पाई है.

एवरर्ड के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि उत्तर कोरिया जाने वाली हर मदद पूरी तरह रोक दी जाए. यही कारण है कि उनके आने बाद से अमेरिकी एजेंसियां समुद्री क्षेत्र में काफी तेजी से सक्रिय हुई हैं. कोरियाई प्रायद्वीप में आने जाने वाले लगभग हर जहाज की जांच की जाती है. उन शिपिंग कंपनियों की भी लिस्ट तैयार की गई है जो प्रतिबंधों के बाद भी चोरी-छुपे उत्तर कोरिया माल लाती ले जाती हैं. पिछले हफ्ते अमेरिका ने जो प्रतिबंध उत्तर कोरिया पर लगाए उसमें शिपिंग कंपनियों पर की कार्रवाई सबसे ज्यादा चर्चा में रही थी.

इन नए प्रतिबंधों में उत्तर कोरिया, चीन और पांच अन्य देशों की 27 शिपिंग कंपनियों और 28 जहाजों को अमेरिका ने प्रतिबंधित किया है. इन सभी पर आरोप है कि इन्होंने प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरिया को तेल का आयत और कोयले का निर्यात किया. प्रतिबंधों के तहत अब ये कंपनियां अमेरिका में व्यापार नहीं कर सकेंगी, साथ ही अमेरिका में स्थित इनके कार्यालयों को भी सील कर दिया गया है. इसके अलावा अमेरिका ने सैकड़ों शिपिंग कंपनियों को उत्तर कोरिया के लिए माल न ढोने की चेतावनी भी जारी की है.

कड़े प्रतिबंधों के साथ-साथ बातचीत को भी हरी झंडी

मंगलवार को किम जोंग के परमाणु हथियार छोड़ने की खबर का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वागत किया है. हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने यह भी साफ़ कर दिया है कि उत्तर कोरिया को बातचीत की मेज पर लाने के प्रयास जारी रहेंगे, लेकिन अमेरिका प्रतिबंधों में कोई ढील नहीं देगा और न ही उत्तर कोरिया की सीमा के आसपास स्थित अपनी फ़ौज को ही वापस बुलाएगा. अधिकारियों का यह भी कहना है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा उत्तर कोरिया पर प्रतिबंधों को और कड़ा करने की कोशिशें भी जारी रहेंगी.

दक्षिण कोरियाई जानकारों का कहना है कि उत्तर कोरिया को लेकर अमेरिका की नीति साफ़ है कि जब तक उत्तर कोरिया को लेकर बातचीत किसी निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंचेगी तब तक वह किसी तरह की ढील नहीं देगा. दरअसल, अमेरिका अच्छे से जानता है कि दबाव की उसकी इसी नीति के चलते आज उत्तर कोरिया झुकने को तैयार हुआ है.

डोनाल्ड ट्रंप का डर भी एक कारण

जॉन एवरर्ड एक और बात भी बताते हैं. वे कहते हैं कि भले ही उत्तर कोरिया ऊपर से यह दिखाता हो कि उसे किसी से भी डर नहीं लगता, लेकिन अंदर स्थिति इससे एकदम उलट है. उत्तर कोरिया में बीते दिसंबर में ऐसा देखने को भी मिला जब संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारी जेफरी फेल्टमैन ने प्योंगयांग का दौरा किया. फेल्टमैन की मानें तो लगभग सभी उत्तर कोरियाई अधिकारियों में ट्रंप का डर साफ़ देखा जा सकता था. वे सभी अमेरिकी राष्ट्रपति के मिजाज को लेकर बेहद चिंतित थे.

फेल्टमैन बताते हैं कि ये अधिकारी उत्तर कोरिया को लेकर ट्रंप की गंभीरता और फैसला लेने के तौर तरीकों को जानना चाहते थे. अधिकारियों ने उनसे कई बार यह बात पूछी कि क्या ट्रंप वाकई उनके देश पर सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं. एवरर्ड उत्तर कोरियाई अधिकारियों के ऐसे व्यवहार का कारण डोनाल्ड ट्रंप के उस मिजाज को मानते हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि वे कब क्या फैसला ले लें कोई नहीं जानता.