राजस्थान में ऐसे हिंदुओं की एक बड़ी संख्या है जो पाकिस्तान के नारकीय जीवन से तंग आकर वर्षों पहले यहां चले आए थे. तब इन्हें उम्मीद थी कि पाकिस्तान के दिए ज़ख्मों के साथ जब ये सरहद पार करेंगे तो न सिर्फ इन्हें हिंदुस्तान की सहानुभूति मिलेगी बल्कि यहां की मुख्यधारा में इनका ससम्मान स्वागत भी किया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सालों से ये लोग (विधिवत) भारतीय नागरिकता पाने के लिए दफ़्तर-दर-दफ़्तर चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं. कोई कानूनी पहचान नहीं होने की वजह से अपराधियों की तरह छिप कर जीवन जीने को मजबूर हैं. इनमें कई अपनी समस्याओं के बारे में खुलकर बात करने से डरते हैं. उन्हेें लगता है कि इसके बाद उनकी जिंदगी बदतर हो जाएगी. प्रशासन उनका जीना मुहाल कर देगा.

पाकिस्तान के हाल

यह बात किसी से नहीं छिपी है कि बंटवारे के बाद पाकिस्तान धार्मिक कट्टरवाद की तरफ तेजी से बढ़ा है. पाक हिंदू विस्थापितों की मानें तो वहां बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यकों के दमन या जबरन धर्मांतरण की घटनाएं इतनी आम हो गई हैं कि खबरों में भी उनका जिक्र होना बंद हो गया है. वहां इसका सबसे ज्यादा शिकार महिलाओं, लड़कियों और बच्चों को होना पड़ता है. लंबे समय से भारत में पाक हिंदू विस्थापितों के लिए काम कर रहे ‘सीमान्त लोक संगठन’ की मानें तो वहां सिर्फ सिंध प्रांत से हर महीने औसतन 50 हिंदू लड़कियों को अगवा कर लिया जाता है. ये आंकड़े उसने पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग से जुटाए हैं.

मुसीबत यह भी है कि पाकिस्तान में धर्मांतरण का रास्ता एकतरफा है. न सिर्फ वहां का समाज बल्कि कानून भी एक बार इस्लाम अपनाने के बाद फिर से मज़हब बदलने की इजाजत नहीं देता. यदि पाकिस्तान में कोई व्यक्ति (जबरन या स्वेच्छा से) मुसलमान बन जाए तो वह फिर से अपने पिछले धर्म को स्वीकार नहीं कर सकता. उसके ऐसा करने की स्थिति में उसे इस्लामिक कानून के तहत मौत की सजा दिए जाने का प्रावधान है.

अलग-अलग रिपोर्टें बताती हैं कि इस तरह के मामलों में वहां अल्पसंख्यकों की सुनवाई होना तो दूर की बात है, उल्टे आरोपितों को स्थानीय नेताओं और प्रशासन की शह होने की वजह से पीड़ित परिवार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है. कुछ मौके ऐसे भी देखने को मिले हैं जब स्थानीय अदालतों ने भी कानून से अलग जाते हुए आरोपितों के पक्ष में फैसले सुनाए हैं. पाकिस्तान में आसान शिकार होने की वजह से वहां के अल्पसंख्यकों (खासतौर पर हिंदुओं) को धर्मांतरण के अलावा रोजमर्रा के जीवन में और भी कई तरह के अपराधों का सामना करना पड़ता है.

वहां के बदतर हालात को याद कर इन दिनों जोधपुर में रह रहे बाबूलाल (बदला हुआ नाम) कहते हैं, ‘जैसे एक किसान अपनी फसल को जानवरों से बचाने के लिए पूरी रात चौकन्ना रहता है वैसे ही पाकिस्तान में हमें भी अपने परिवार की हिफाजत करनी पड़ती थी’. वे आगे जोड़ते हैं, ‘वहां जरा से खटके से आंख खुल जाती, किसी मुसीबत की आशंका से पूरा परिवार सिहर उठता. सुकून की नींद क्या होती है वह हम जानते ही नहीं थे.’ पाकिस्तान के हैदराबाद से आई सीतादेवी (बदला हुआ नाम) भी वहां के कुछ ऐसे ही हाल बयां करती हैं. वे कहती हैं, ‘वहां हिंदू महिलाओं को हमेशा डर के साये में घर में कैद होकर रहना पड़ता है कि पता नहीं कब क्या अनहोनी हो जाए!’

सीमान्त लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोढ़ा सत्याग्रह से हुई बातचीत में बताते हैं, ‘पाकिस्तान में गैरहिंदू अल्पसंख्यक जिन समुदायों (ईसाई या बौद्ध) से ताल्लुक रखते हैं वे विश्व में बड़े स्तर पर फैले हैं. इसलिए उन पर अत्याचार की खबर अंतरराष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बनती है. इसके अलावा पश्चिमी देशों से लगातार मदद मिलते रहने के कारण भी पाकिस्तान का प्रशासन दूसरे धर्मों के लोगों के हितों के लिए कहीं ज्यादा सजग है. हिंदुओं के मामले में ऐसा नहीं दिखता.’ सोढ़ा आगे कहते हैं, ‘यदि पाकिस्तान के अन्य अल्पसंख्यक वहां से जाना चाहें तो उनके पास भारत समेत कई देशों के विकल्प होते हैं जबकि वहां के हिंदुओं के पास ले-दे कर सिर्फ भारत ही पहली और आखिरी उम्मीद के तौर पर बचता है. लेकिन यहां भी उनके साथ पूरा न्याय नहीं हो पाता.’

वीजा से नागरिकता तक की प्रक्रिया

पाकिस्तान से भारत आने के लिए वहां के हिंदू अल्पसंख्यक मुख्यत: दो तरह के वीज़ा को प्राथमिकता देते हैं. पहला पिलग्रिम (धार्मिक) और दूसरा विजिटर्स (रिश्तेदारों से मिलना या पर्यटक) वीज़ा. जानकारों के मुताबिक धार्मिक वीज़ा में आमतौर पर दोनों देशों में बैठे बिचौलियों के मार्फत भारतीय हिंदू धार्मिक स्थलों के पुजारी पाकिस्तानी श्रद्धालुओं के पूरे-पूरे समूहों की गारंटी लेते हैं. वहीं विजिटर्स वीज़ा के तहत पाकिस्तानी हिंदुओं के किसी भारतीय रिश्तेदार या जानकार को इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में गारंटी के तौर पर स्पॉन्सरशिप फॉर्म भेजना पड़ता है. इसके बाद सुरक्षा एजेसियां इन आवेदकों की पड़ताल करती हैं. सब-कुछ सही पाए जाने पर पाकिस्तानी हिंदुओं को भारत आने की इजाजत दे दी जाती है.

लेकिन इनमें कई लोग ऐसे होते हैं जो यहां आने के बाद वापिस पाकिस्तान नहीं जाना चाहते. इन्हें भारत आते ही नजदीकी ‘विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय’ (एफआरआरओ) में अपने वीज़ा की अवधि बढ़वाने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाना होता है. इस दरख़्वास्त के मंजूर होने पर संबधित राज्य आवेदक को भारत में अधिकतम दो साल और केंद्र (गृहमंत्रालय) अधिकतम पांच साल रुकने की अनुमति दे सकता है. इसे ही दीर्घकालिक या लॉन्ग टर्म वीज़ा (एलटीवी) कहा जाता है. जरूरत पड़ने पर एलटीवी का इतने ही समय के लिए नवीनीकरण भी करवाया जा सकता है.

1950 के बाद से अलग-अलग सरकारों ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यकों के लिए भारत में एक नियत अवधि गुजारने के बाद उन्हें यहां की नागरिकता दिए जाने के प्रावधान तय किए हैं. साथ ही इन विस्थापितों को (सुरक्षा मामलों को छोड़) यहां से जबरदस्ती वापिस नहीं भेजे जाने के भी निर्देश समय-समय पर दिए जाते रहे हैं. इस तरह का हालिया आदेश भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 2016 में जारी किया था. हालांकि 2014 लोकसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि केंद्र में उनकी सरकार के बनते ही विस्थापितों के हितों के लिए मौजूदा नागरिकता कानून में संशोधन किया जाएगा. लेकिन उनके सत्ता में आने के चार साल बाद भी यह बिल राजनैतिक कारणों के चलते सदन में नहीं रखा गया है.

लंबे समय से इन मामलों से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि चुनावी फायदों के लिए राजनैतिक दल हिंदू विस्थापितों को भारतीय नागरिकता समेत अन्य सहूलियतें देने के वायदे तो कर लेते हैं लेकिन, असल में वे नहीं चाहते कि पाकिस्तान या अफ़गानिस्तान से ज्यादा हिंदू भारत आ पाएं. उनके शब्दों में ‘ऐसा नहीं होता तो राजस्थान जैसे राज्यों से जहां हिंदुओं की हितैषी कही जाने वाली भाजपा का शासन है, कई विस्थापित परिवारों को बेहाल होकर वापस पाकिस्तान नहीं जाना पड़ता.’ हालांकि वे बांग्लादेश से असम आने वाले हिंदुओं को फिलहाल इसका अपवाद बताते हैं क्योंकि अगले कुछ वर्षों में ये लोग वहां भाजपा के लिए महत्वपूर्ण जनाधार साबित हो सकते हैं.

भारत की बेरुख़ी

राजस्थान के जोधपुर में ही पाक हिंदू विस्थापितों की करीब ग्यारह छोटी-बड़ी बस्तियां हैं जिनकी आबादी करीब 15 हजार है. पहले-पहल तो यहां के लोग हमसे बात करने से झिझक रहे थे. उन्हें लग रहा था कि कहीं हम जांच एजेंसियों से तो नहीं. लेकिन भरोसा दिलाने पर इनका दर्द छलक आया. इन लोगों का कहना है कि भारत आने के ख्याल से लेकर यहां बसने और समाज में घुलने तक इन्हें हर कदम पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. यहां आने से जुड़ी पहली परेशानी का ज़िक्र करते हुए ये लोग बताते हैं कि वीज़ा से जुड़ी अधिकतर अर्जियों को भारतीय उच्चायोग एक बार में स्वीकार ही नहीं करता. चूंकि पूरा मसला आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा होता है इसलिए दरख़्वास्त के ख़ारिज़ होने की वजह भी नहीं बताई जाती और फिर से आवेदन के लिए कहा जाता है. लेकिन इसके भी मंजूर होने की कोई गारंटी नहीं होती.

कभी-कभी आवेदन जमा कराने और इसके निरस्त होने का लंबा सिलसिला चलता है. बहुत से लोगों की शिकायत है कि एक बार की इस पूरी प्रक्रिया में कागजात तैयार करवाने से लेकर पुलिस सत्यापन तक हजारों रुपए ऐंठ लिए जाते हैं. चूंकि इनमें से अधिकतर लोग आर्थिक तौर पर पिछड़े होते हैं इसलिए आखिर में हारकर वे आवेदन करना ही बंद कर देते हैं. राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में आपको ऐसे सैकड़ों लोग मिल जाएंगे जो इस सब में फंस कर अपने पाकिस्तानी रिश्तेदारों से मिलने की आस छोड़ चुके हैं.

अपनी बहन और उसके परिवार को भारत बुलाने के लिए पांच बार स्पॉन्सरशिप फॉर्म भेज चुके वीरसिंह (बदला हुआ नाम) बताते हैं, ‘कागज हर बार वकील या विशेषज्ञों से ही तैयार करवाए जाते हैं. जब हमें खामी का पता ही नहीं चलेगा तो हम क्या सुधारेंगे?’ सरकारी कार्यवाही से हताश वीरसिंह का कहना है, ‘न तो कोई हमसे खुलकर मना ही करता है और न ही हमारे आवेदन स्वीकार किए जाते हैं. हम जैसे लोगों को सिर्फ अटका कर रख जाता है.’

यहां कई विस्थापित परिवार ऐसे भी हैं जिन्होंने भारत आने के लिए एक साथ आवेदन किया था. लेकिन वीजा आधे सदस्यों को ही मिला. जोधपुर में रह रहीं लाजी बाई की कहानी कुछ ऐसी ही है. सालों पहले उन्हें तो भारत आने की मंजूरी मिल गई लेकिन उनके बेटे रामोजी का वीज़ा पास नहीं हुआ. लाजी बाई इस उम्मीद में हिंदुस्तान अपने दामाद मेघजी भील के पास चली आईं कि जल्द ही उनके बेटे को भी यहां आने की इजाजत मिल जाएगी. लेकिन सालों कोशिश करने के बाद भी ऐसा नहीं हुआ. जिस रोज हम इस परिवार से मिले उसके अगले ही दिन बीमार लाजी बाई के गुजर जाने की खबर आई. मेघ जी की पत्नी इस बात पर फफ़क पड़ती हैं कि उनकी मां अंतिम समय तक बेटे को देखने के लिए तरसती रहीं लेकिन वे नहीं आ पाए.

इसी तरह की परेशानी से गुजर रहे गोविंद (बदला हुआ नाम) कहते हैं, ‘हम पांच भाइयों में से मुझ एक को भारत आने की इजाजत मिल गई जबकि चार वहीं रह गए. उन्हें वहां छोड़कर मैं अकेला भारत में क्या करुंगा? अगर जल्द ही उन्हें यहां आने की मंजूरी नहीं मिली तो मुझे भी फिर वहीं जाना पड़ेगा.’

लेकिन यह परेशानी एकतरफा नहीं है. जितनी मुश्किलें वीज़ा लेकर हिंदुस्तान आने में है उससे कहीं ज्यादा टेढ़ा काम वीज़ा अवधि के दौरान या इसकी मियाद खत्म होने के बाद फिर से पाकिस्तान (वहां अपने बचे रिश्तेदारों के पास या यहां से निराश होकर) जाना होता है. जोधपुर के रामनगर निवासी सोनाराम (बदला हुआ नाम) पिछले सात साल से यही समझने की कोशिश कर रहे हैं कि किस आधार पर उन्हें तो भारत आने की इजाजत मिल गईं लेकिन उनकी 80 वर्षीय मां इसकी पात्र नहीं मानी गईं. तब सोनाराम अपनी मां और छोटे भाई के परिवार को यह सोचकर पीछे छोड़ आए थे कि भागदौड़ कर वे उन्हें भी यहां जल्द बुला लेंगे. पर हाल ही में उन्हें अपनी मां के निधन के सूचना मिली. उनकी मां की अंतिम इच्छा थी कि बड़ा बेटा होने के नाते उनकी आखिरी रस्मों को सोनाराम पूरा करें. लेकिन न तो वे यहां आ पाईं और न ही सोनाराम को वापिस पाकिस्तान जाने की इजाजत मिली. लंबी आह के साथ सोनाराम सिर्फ यही कह पाते हैं, ‘यदि हमें पता होता कि ऐसा होगा तो शायद हम भारत कभी नहीं आते.’

इस व्यवस्था में सुधार की अपील लेकर हिंदू सिंह सोढ़ा कई बड़े मंत्रियों और अधिकारियों से लेकर अदालतों के दरवाजे खटखटा चुके हैं. वे कहते हैं, ‘मैं भी भारत की सुरक्षा को लेकर जीरो टॉलरेंस रखने वाले लोगों में हूं. लेकिन पाक हिंदू विस्थापितों के मामले में आंतरिक सुरक्षा से बड़ा कोई मजाक नहीं हो सकता.’ सोढ़ा आगे जोड़ते हैं, ‘ये, वो दबे कुचले लोग हैं जिन्हें आंतरिक सुरक्षा के नाम पर मानवाधिकारों से महरूम रखा जाता है. जमीनी स्तर पर मौजूद व्यवस्था के साथ अधिकारियों पर भी लगाम कसने की जरूरत है ताकि वे अपनी हदें पार कर विस्थापितों के अधिकारों का हनन नहीं कर सकें.’

सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े कर्मचारियों की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते हुए सोढ़ा का कहना है, ‘इस पूरी व्यवस्था में जबरदस्त भ्रष्टाचार व्याप्त है. अगर माइग्रेशन के मामले पर किसी स्वतंत्र आयोग से जांच करवाई जाए तो देश की सुरक्षा के लिए वे ही लोग सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आएंगे जो इसकी सबसे ज्यादा दुहाई देते हैं.’ सोढ़ा आगे जोड़ते हैं, ‘जो लोग मोटी रिश्वत देने में सक्षम हैं जांच में उनकी रिपोर्ट तो बहुत बढ़िया तैयार होती है जबकि बाकियों की नहीं. बॉर्डर को असुरक्षित करने की साज़िश कोई और करता है और आरोप इन मजबूर लोगों के माथे मढ़ दिया जाता है.’ हाल ही में पाकिस्तान विस्थापितों से भारतीय नागरिकता देने के एवज़ में रिश्वत लेते हुए गृह मंत्रालय के सीनियर सेक्रेटेड असिस्टेंट (एएसएस) अधिकारी सहित पांच जनों का एसीबी द्वारा हिरासत में लिया जाना सोढ़ा के आरोपों को पुष्ट करता है. बताया जा रहा है कि इस पूरे प्रकरण में और भी कई बड़े अधिकारी शामिल हो सकते हैं.

बीते कुछ सालों में यहां ऐसे भी कई मामले सामने आए हैं जब आंतरिक सुरक्षा का हवाला देकर हिंदू विस्थापितों को नियम विरुद्ध वापिस पाकिस्तान भेज दिया गया. चंदू भील और उसके परिवार के नौ सदस्य ऐसे ही लोगों में शामिल थे. पिछले अगस्त में जोधपुर से बाहर अपने रिश्तेदार की शादी में जाने पर इन लोगों को पुलिस ने जबरन पाकिस्तान जाने वाली थार एक्सप्रेस में बिठा दिया. चश्मदीद बताते हैं कि इस परिवार के बच्चों से लेकर महिलाओं और बुजुर्गों तक की तमाम मिन्नतों के बावजूद किसी का मन नहीं पसीजा.

मामले की संवेदनशीलता देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने खुद ही इस मामले में संज्ञान लेकर राज्य सरकार को नोटिस थमाया है. इसमें पूछा गया है कि किस आधार पर सरकारी अधिसूचनाओं को दरकिनार करते हुए चंदू भील के परिवार को भारत से निर्वासित किया गया. साथ ही अदालत ने यह निर्देश भी दिए हैं कि आगे से ऐसे किसी भी विस्थापित को पाकिस्तान वापिस भेजने से पहले उसकी इजाजत लेनी होगी.

लेकिन यह इकलौता ऐसा मामला नहीं है जिसमें हिंदू विस्थापितों को जबरन भारत छोड़ने पर मजबूर किया गया हो. हाल ही में अदालत में पेश किए गए एफआरआरओ के हलफ़नामे के हवाले से सोढ़ा बताते हैं कि बीते दो साल में 968 लोगों को वापिस पाकिस्तान भेजा गया है. एक अनुमान के मुताबिक इस दौरान करीब इतने ही लोग पाकिस्तान से भारत आए थे. यानी एक तरह से देखा जाए तो पिछले दो सालों में जितने लोग भारत आ पाए उतने ही लोगों को यहां से वापिस लौटना पड़ा. इस बारे में सीमान्त लोक संगठन के एक अन्य सक्रिय कार्यकर्ता चिंतित होकर कहते हैं, ‘कभी किसी ने सोचा है कि वापिस पाकिस्तान जाने के बाद वहां का प्रशासन या जांच एजेंसियां इन लोगों के साथ कैसा सलूक करती होंगी?’

इस क्षेत्र में ऐसे न जाने कितने हिंदू विस्थापित परिवार हैं जो प्रशासन द्वारा और भी कई दूसरे तरीकों से सताए जा चुके हैं. 2007 में अपनी नातिन की शादी के लिए जोधपुर से बाहर जाने वाले अर्जनराम भील ऐसे ही एक शख्स हैं. हालांकि किसी तरह अर्जनराम भारत से निकाले जाने से बच गए लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़कर दो साल के लिए जेल में बंद कर दिया. इस दौरान परिवार की आजीविका तो रुक ही गई बल्कि जो कुछ-जमा पूंजी ये लोग किसी तरह पाकिस्तान से बचाकर लाए थे वह भी मुकदमे में खर्च हो गई.

जिंदगी मुहाल

यदि किसी तरह ये हिंदू विस्थापित भारत में टिके भी रह जाते हैं तो रोजमर्रा की जरूरत के वे तमाम साधन जो आपके-हमारे लिए बेहद आसानी से उपलब्ध हैं, उन्हें भी जुटाना इनके लिए बड़ी चुनौती हो जाता है. गैस कनेक्शन, ड्राइविंग लाइसेंस और उच्च शिक्षण संस्थानों में बच्चों के दाखिले जैसी बुनियादी आवश्यकताओं तक से इन्हें महरूम रहना पड़ता है. 17 साल पहले तमाम सपने लिए भारत रहने आए जोगादास (बदला हुआ नाम) कहते हैं कि यहां नागरिकता मिलना तो दूर राशन कार्ड नहीं होने से महीनेभर का राशन जुटाना भी एक जंग जीतने जैसा लगता है.

चूंकि बिना किसी पहचान पत्र के बैंक भी इनके खाते नहीं खोलता तो इन्हें अपनी कुल जमा रकम हमेशा अपने ही पास रखनी पड़ती है. इसके चलते डेढ़ साल पहले तुरत-फुरत की गई नोटबंदी के समय पुराने नोट नहीं बदलवा पाने के कारण कई विस्थापित परिवारों के हजारों रुपए बेकार हो गए. इसके अलावा नकदी रखने के बाकी जोखिम तो हमेशा बने ही रहते हैं. यदि इनमें से कोई परिवार आर्थिक तौर पर थोड़ा सक्षम हो जाए तो पहचान पत्र न होने की वजह से उसे रहने के लिए जमीन खरीदने की भी इजाजत नहीं मिलती. लिहाजा इन्हें अपने स्थानीय जानकारों के नाम पर जमीन लेनी पड़ती है. उसके भी अपने खतरे हैं. उदाहरण के लिए यहां आपको ऐसे कई विस्थापित परिवार मिल जाएंगे जिनकी जमीनों को उन्हीं के करीबियों ने हड़प लिया और कागजों में नाम नहीं होने की वजह से ये इसकी शिकायत तक नहीं कर पाए.

इन विस्थापितों की गुहार पर गृहमंत्रालय ने 2016 में भारतीय विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण को एलटीवी धारी अल्पसंख्यकों के आधार कार्ड बनवाने की बात कही थी. लेकिन जानकार बताते हैं कि इस आदेश से जुड़ी फाइलें आज तक दफ़्तरों में धूल फांक रही हैं. इसी तरह विस्थापितों के बैंक अकाउंट खोलने के लिए गृहमंत्रालय ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को भी निर्देश दिए थे, लेकिन यह प्रक्रिया भी अभी तक ठंडे बस्ते में ही पड़ी है. विश्लेषक बताते हैं कि गृहमंत्रालय के आदेशों को कोई भी विभाग इतनी आसानी से लंबे समय के लिए नहीं टाल सकता. ऐसे में यदि मंत्रालय के निर्देश अमल में नहीं लाए जा रहे तो संबंधित विभाग के साथ सरकार की भी नीयत पर संदेह होना लाजमी है.

भारत में इन पाक हिंदू विस्थापितों की चुनौतियां सिर्फ प्रशासनिक स्तर तक ही सीमित नहीं हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में इन्हें कई सामाजिक द्वंदों से भी गुजरना पड़ता है. इन्हें इस बात से बड़ी तकलीफ है कि भारत की सरकार और प्रशासन के साथ यहां का समाज भी इन्हें अपनाने को तैयार नहीं दिखता. इन लोगों का कहना है, ‘पाकिस्तान में हमें काफ़िर बुलाकर बेइज्जत किया जाता था और यहां पाकिस्तानी. कभी-कभी तो लगता है कि जब गाली ही खानी थी तो घर-बार छोड़कर यहां क्यों आए!’

हिंदू विस्थापितों की सबसे पुरानी बस्ती कालीबेरी के मीरखन भील (बदला हुआ नाम) अपनी झोपड़ी में रखी श्रीमदभागवत और हिंदू देवताओं की तस्वीरों को दिखाते हुए कहते हैं, ‘हम समाज को यकीन दिला-दिला कर थक गए कि हम भी हिंदू ही हैं. लेकिन वे हमारी भाषा और नामों को देखकर यह मानने को तैयार ही नहीं.’ वे आगे कहते हैं, ‘सालों पाकिस्तान में रहने की वजह से हमारी ज़ुबान पर उर्दू का वैसा ही असर दिखता है जैसा हिंदुस्तान में रहने वाले मुसलमानों पर हिंदी या दूसरी भाषाओं और बोलियों का. लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हमारा मज़हब बदल गया.’

समाज में अपनी अस्वीकार्यता का जिक्र करते हुए कालीबेरी के लोग बताते हैं कि कुछ दिन पहले बस्ती में एक मौत होने पर उन्हें स्थानीय श्मशान घाट में शव का अंतिम संस्कार करने की इज़ाजत नहीं दी गई. नतीजन उन्हें कई किलोमीटर दूर ले जाकर शव की अंत्येष्टि करनी पड़ी.’

स्थानीय लोगों की यह बेरूखी पाकिस्तान से आए बड़ों को ही नहीं बल्कि कई बार बच्चों को भी झेलनी पड़ती है. जोधपुर के बनाड़ इलाके में रहने वाले राजा के मुताबिक जब उसने स्कूल जाना शुरु किया तो उसके साथी पाकिस्तानी कहकर उसका मज़ाक बनाते थे. राजा ने बताया, ‘रोज-रोज के तानों से तंग आकर मैंने स्कूल जाना ही बंद कर दिया. पढ़-लिख न पाने की वजह से अब एक ऑफिस में चपरासी की नौकरी करता हूं.’

राजस्थान में हिंदू विस्थापित बस्तियों में जाकर पता चलता है कि राजा जैसी कहानी वहां के सैकड़ों बच्चों और किशोरों के साथ हर रोज खुद को दोहरा रही है. अव्वल तो इनके या इनके माता पिता के पास कोई पहचान पत्र नहीं होने की वजह से इन्हें स्कूल में दाखिला ही नहीं मिलता. यदि किसी तरह ये बच्चे थोड़ा-बहुत पढ़-लिख जाते हैं तो बड़े होने पर पाकिस्तान का नाम सुनकर कोई भी इन्हें रोजगार देने को तैयार नहीं होता.

अकेले जोधपुर में करीब 30 ऐसे विस्थापित युवा डॉक्टर हैं जिन्हें अपनी पूरी पढ़ाई भारत में करने के बावजूद प्रैक्टिस में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. सत्याग्रह से हुई बातचीत में ये लोग बताते हैं कि पाकिस्तान में चाहे जो होता हो लेकिन जब भारत में किसी अल्पसंख्यक पर हमले की खबर आती है तो इनका मन बहुत दुखी होता है. इनके मुताबिक इन्हें अहसास है कि कमजोर होने का दर्द क्या होता है. वे कहते हैं कि उन्हें संविधान और कानून व्यवस्था पर पूरा विश्वास है.

शायद इसी भरोसे का ही सहारा है जो ये लोग तमाम परेशानियों के बाद भी भारत को अपने पुरखों की सरजमीं और अपना देश मानने की हिम्मत जुटा पाते हैं. इन्हें लगता है कि देर-सवेर ही सही लेकिन किसी रोज़ हिंदुस्तान इन्हें और इनके बच्चों को वह स्नेह जरूर देगा जिसकी उम्मीद लेकर ये वहां से चले आए थे.