हम भले इन दिनों नितांत समसामयिकता की चपेट में हैं लेकिन हम अपने आधुनिकों को भूल नहीं पाते हैं. भले कई बार इसे स्वीकार करने में हिचक हो लेकिन हम जानते हैं कि समकालीनता आधुनिकता का ही विस्तार और, कई अर्थों में, उपज है. आधुनिकता और समकालीनता दोनों ही कहीं से उपहार की तरह नहीं आयी हैं. उन्हें गढ़ा गया है और उनके लिए लंबे प्रयत्न और संघर्ष की कठिन परंपरा है.

हमने आज से लगभग साठ वर्ष पहले जब लिखना शुरू किया था तो आधुनिक रचनाशीलता गहरे संघर्ष से, अनेक प्रहार, अस्वीकृतियां और विकृतियां झेलते हुए अपनी राह बना रही थी. यह संघर्ष हिंदी अंचल में यहां से वहां तक फैला था और कई हाशिये की जगहों पर भी सक्रिय था. दुर्भाग्य से, हिंदी अंचल और साहित्य में अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता भाव का अभाव है. हमें यह पहचान होनी चाहिये कि हमारी आज की सारी उग्रता, संघर्षशीलता, प्रश्नवाचकता पूरी तरह से हमारी अपनी उपलब्धि या अर्जन नहीं है - उसमें आधुनिक पुरखों का बड़ा हाथ रहा है. कविता में हिंदी आधुनिकता के तीन पुरखों को अब, धीरे-धीरे सही, मान्यता मिल रही है - अज्ञेय, मुक्तिबोध और शमशेर.

इनमें से अज्ञेय को सबसे अधिक कुपाठ, विकृति और प्रहार सहने पड़े. इधर इस स्थिति में, सौभाग्य से, बदलाव आया है. उसका एक सशक्त सूचक है प्रगतिशील आलोचक नंदकिशोर नवल की, कुछ समय पहले राजकमल द्वारा प्रकाशित पुस्तक: ‘कवि अज्ञेय’. वे लिखते हैं, ‘अज्ञेय के बारे में यह आम धारणा है कि वे अभिजातवर्गीय कवि थे, लेकिन यह सुखद आश्चर्य की बात है कि उनकी कविता का नायक भी साधारण जन ही है, भले वे उसके जीवन के निम्नतम स्तर तक न पहुंचे हों. पर साधारण जन के प्रति उनकी अपार व्यथा का उनकी कविताएं प्रत्यक्षीकरण कराती हैं. उन्हें इस साधारण जन में छिपी शक्ति का भी पता था, जो जब-जब करवट बदलती है, इतिहास बदल जाता है.’

अज्ञेय की प्रेम, प्रकृति, विचार, यात्रा, रहस्य आदि से संबंधित कविताओं का नवल जी ने विश्लेषण किया है. वे बार-बार प्रगतिशीलों यहां तक कि मुक्तिबोध तक द्वारा किये गये अज्ञेय के कुपाठ को हिसाब में लेते हैं. वे कहते हैं, ‘सोचने की बात यह है कि जो कवि मनुष्य के अकेलेपन का कवि था, उसे अपने अकेलेपन का कवि घोषित करने के लिए प्रगतिशील आलोचकों ने कुछ भी उठा न रखा.’

मुक्तिबोध के हवाले से उनका विश्लेषण है, ‘.... अपनी कविता को ध्यान में रखकर मुक्तिबोध ने ‘जड़ीभूत सौंदर्यानुभूति’ जैसे पद की रचना की और अज्ञेय को उसका शिकार बतलाकर उन पर पूरी पीढ़ी को गुमराह करने का आरोप लगाया है. क्या कविता में जो ‘सौंदर्यानुभूति’ होती है, वह एक तरह की होती है और दूसरे प्रकार की ‘सौंदर्यानुभूति’ जड़ीभूत होती है? पूछा जा सकता है कि अज्ञेय की सौंदर्यानुभूति कैसे जड़ीभूत थी? क्या वह छायावादी कवियों की सौंदर्यानुभूति थी, जिसे इतना निचोड़ा गया था कि सीठी-मात्र शेष रह गयी थी? मुक्तिबोध का ध्यान शमशेर की ओर क्यों नहीं गया, जो एक साथ उनकी, नागार्जुन, त्रिलोचन और स्वयं अज्ञेय की सौंदर्यानुभूति के कायल थे? ऐसी व्यापक दृष्टि का परिचय उन जैसे महान कवि ने क्यों नहीं दिया? क्या अपने को स्थापित करने के लिए दूसरे का मूलोच्छेदन आवश्यक है?’

नवल जी ने कविताओं का गहन विश्लेषण करने के बाद कहा है, ‘इसमें सन्देह नहीं कि अज्ञेय महान् कवि थे, जो उनकी प्रेम कविताओं से भी प्रमाणित है. उन्होंने कविता में न कभी पहेली बुझाई ओर न कभी उसे इतना अमूर्त होने दिया कि वह हमारी पकड़ से ही छूट जाये. उन्होंने संवेदना और अभिव्यक्ति दोनों को उदात्त धरातल पर प्रतिष्ठित किया. उनमें एक स्पृहणीय सरलता है जो किसी महान कवि की अनिवार्य विशेषता होती है. अज्ञेय और मुक्तिबोध छायावादेत्तर हिंदी कविता के दो ध्रुवांत हैं.... इन दोनों को मिलाकर ही उक्त कविता उस दृश्य का निर्माण करती है जो अत्यंत भव्य हैं. एक संयोग यह है कि दोनों ही में आत्मपरकता है, लेकिन आत्मग्रस्तता नहीं, क्योंकि दोनों में अपने आत्म का अतिक्रमण करने की क्षमता है. ये महान कवि आत्मग्रस्त होते, तो अपने माध्यम से नये युग के यथार्थ और उसकी प्रकट-अप्रकट कशमकश को चित्रित और अभिव्यंजित न कर पाते.’