आज आठ मार्च है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस. आज जब आप अपनी महिला दोस्तों, परिचितों, रिश्तेदारों या भारत और विश्व की तमाम महिलाओं को बधाई दे रहे हैं, तब देश की राजधानी दिल्ली में विभिन्न राज्यों से आई कई महिलाएं देश के सांसदों से मिलने की कोशिश कर रही हैं. उन्हें महिला दिवस की बधाई देने के लिए नहीं. बल्कि एक विधेयक को जल्दी पारित करा देने की दरख्वास्त करने के लिए.

ह्यूमन ट्रैफिकिंग य़ा मानव तस्करी के जाल से बचकर निकली ये महिलाएं कोशिश कर रही हैं कि संसद के मौजूदा सत्र में मानव तस्करी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2018 को कानून का दर्ज़ा दिला दिया जाये, ताकि उन्हें और उन जैसे कई लोगों को न्याय मिलने का रास्ता कुछ आसान हो सके.

पिछले तीन दिनों में ये महिलाएं अब तक सुप्रिया सुले, ज्योतिरादित्य सिंधिया, रामदास आठवले, संजय राउत, जय पांडा और सत्यपाल सिंह आदि से मिल चुकी हैं. इनके अलावा ये मीनाक्षी लेखी, मेनका गांधी, वरुण गांधी, सुष्मिता देब एवं हर्षवर्धन से भी मिलने की कोशिश कर रही हैं.

जिस विधेयक का ऊपर जिक्र हुआ उसे मोदी कैबिनेट ने 28 फरवरी 2018 को स्वीकृति दे दी थी. अब इसे संसद में पेश किया जाना है. लेकिन एक विधेयक का ड्राफ्ट तैयार होने से लेकर उसे कैबिनेट की स्वीकृति मिलने, संसद में पेश किए जाने, उस पर बहस होने, उसे पारित किए जाने और फिर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद उसे कानून का दर्ज़ा मिलने में अक्सर सालों लग जाते हैं. और लोग न्याय का इंतज़ार करते रहते हैं जिसका रास्ते कानून बन जाने से कुछ आसान हो जाता है.

मानव तस्करी से बच कर निकली महिलाओं और पुरुषों के साथ दिल्ली में सांसदों से मिलने की कोशिश कर रहे राष्ट्रीय गरिमा अभियान की कार्यक्रम संयोजक क्रांति कहती हैं कि विधेयक के पारित होने में जितनी देर होगी, इन पीड़ितों को उतना ही ज्यादा नुकसान झेलना होगा. कहते भी हैं कि न्याय में देरी न्याय न मिलने जैसी ही होती है. अभियान से जुड़े लोगों को डर है कि इस सत्र में यदि विधेयक पारित नहीं हुआ तो अगले सत्र से सरकार चुनावों की तैयारी में लग जाएगी और फिर कोई नहीं जानता फिर इस विधेयक की बारी कब आएगी.

राष्ट्रीय गरिमा अभियान ऐसे लोगों का एक समूह है जो मैला प्रथा, मानव तस्करी, जबरन विवाह, जाति आधारित वेश्यावृत्ति और यौन हिंसा जैसी समाजिक बुराइयों से पीड़ित लोगों की एक बार फिर गरिमामय जीवन जीने में मदद कर रहे हैं. इस बिल की ज़रूरत के बारे में क्रांति बताती हैं, ‘मानव तस्करी के लिए अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 और आइपीसी की धारा 370 है. लेकिन इसमें पीड़ित के पुनर्वास के लिए समुचित व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण पीड़ितों के दोबारा तस्करों के चंगुल में आने का खतरा बढ़ जाता है. साथ ही ये कानून जबरन मजदूरी कराने, जबरन विवाह कराने, भीख मंगवाने, सरोगेसी, अंग प्रत्यारोपण आदि के लिए मानव तस्करी करने पर लागू नहीं होते. इसके अलावा मौजूदा कानूनों में पीड़ित और गवाह की सुरक्षा का सही बंदोबस्त न होने की वजह से अधिकतर मामलों में तस्कर अपनी पहुंच और ताकत का फायदा उठा कर बच निकलते हैं.’

यहां हम प्रतिमा (बदला हुआ नाम) की बात सुन सकते हैं. तस्करी के बाद कराई गई जबरन शादी से बच निकलीं प्रतिमा मध्य प्रदेश में देवास ज़िले के एक गांव से हैं. पिछले कुछ सालों से वे अपने पति के साथ उज्जैन में रह रही थीं. पति अक्सर उनके साथ हिंसक हो जाता था जिसके चलते उन्होंने उसके खिलाफ शारीरिक हिंसा का मुकदमा दर्ज किया था. उन दिनों वे शादियों में खाना बनाने का काम करती थीं. एक बार उन्हें दूसरे शहर में जाकर खाना बनाने का काम मिला तो वे चली गईं. लेकिन वहां काम का झांसा देकर उन्हें बंधक बना लिया गया. उनके मुताबिक वहां न सिर्फ कई लोगों ने उनके साथ बलात्कार किया बल्कि उन्हें दो लाख रुपए में बेचकर उनकी जबरन शादी भी करा दी गई. जिन्होंने उन्हें खरीदा वे ऊंची जाति के दबंग लोग थे. उनके घर पर भी प्रतिमा के साथ बाहरी लोग बलात्कार करते रहे.

प्रतिमा बताती हैं, ‘वहां आने वाला एक आदमी मुझे थोड़ा भरोसे लायक लगा तो मैंने उससे मदद मांगी. उसने कुछ वक्त इंतज़ार करने को कहा. चार-पांच महीने इंतज़ार करने के बाद एक दिन वो मुझे इंदौर तक लाकर छोड़ गया. फिर मैं पुलिस के पास गई. मेरी रिपोर्ट नहीं लिखी गई. तब मैंने उन्हीं वकील का सहारा लिया जो मेरा पिछला (शारीरिक हिंसा वाला) केस देख रहे थे. इसके बाद मेरी रिपोर्ट लिखी गई.’

इन दिनों प्रतिमा बीमार हैं और अकेले रह रही हैं. उनके माता-पिता और पति के परिवार ने उन्हें अपनाने से इनकार कर दिया है. वे पिछले चार सालों से अपने बच्चों से नहीं मिल सकी हैं क्योंकि उनके पति और ससुराल वाले उन्हें बच्चों से मिलने नहीं दे रहे हैं. उनके मुताबिक जब भी वे ऐसा करने की कोशिश करती हैं तो उन्हें मारा, पीटा और बेइज़्ज़त किया जाता है. उनके दोनों परिवारों ने उनके बारे में सभी को बताया है कि वे अपनी मर्ज़ी से किसी के साथ ‘भाग गई’ थीं.

प्रतिमा अपने बच्चों और उनके भविष्य के बारे में चिंतित हैं. वे कहती हैं, ‘मेरी बेटी बस 12 साल की है और उससे घर का सारा काम कराया जाता है, फसल कटवाई जाती है और स्कूल भी नहीं भेजा जाता. मेरी बहन ने मुझे बताया कि वो बहुत रोती है और कहती है कि मेरी मां यहां होती तो मेरे साथ ऐसा नहीं होता.’ यह सब बताते हुए प्रतिमा रो पड़ती हैं.

‘नया विधेयक पीड़ित-केंद्रित है. जब यह कानून बन जाएगा तो प्रतिमा या उसके जैसे बाकी लोगों को इस तरह बेसहारा ज़िंदगी नहीं बितानी पड़ेगी. एक पूरा सिस्टम होगा जो उन्हें न सिर्फ न्याय बल्कि पुनर्वास भी मुहैया कराएगा. न्याय का मतलब सिर्फ अपराधी को सज़ा दिलाना नहीं है, पीड़ित को एक बार फिर बेहतर ज़िंदगी जीने का मौका उपलब्ध कराना भी है’ क्रांति कहती हैं. वे आगे जोड़ती हैं, ‘प्रतिमा के अपराधी रसूख वाले हैं. उन्हें पता है कि उसका परिवार भी उसके साथ नहीं है और वो कुछ नहीं कर पाएगी. उन्होंने उल्टा प्रतिमा के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज़ करा दिया है. अकेले अपने दम पर एक बीमार औरत क्या-क्या कर लेगी? बिना उचित कानून और एक समर्पित सरकारी मशीनरी के उसे दोबारा इज़्ज़त और सुकून से जीने का मौका मिलना बेहद मुश्किल है.’

प्रतिमा जैसी ही कहानी उर्मिला (बदला हुआ नाम) की भी है. सोनगीर, महाराष्ट्र की रहने वाली उर्मिला को मंगला नाम की एक महिला उनके गांव से राजस्थान दिखाने के बहाने जैसलमेर ले गई. उर्मिला शादीशुदा थीं लेकिन शराब पीकर मारपीट करने की पति की आदत के कारण उन्होंने ससुराल की जाति पंचायत की मदद ली. उसके हस्तक्षेप से वे अपने पति से अलग अपने माता-पिता के पास रह रही थीं. उनके दो बच्चों में से एक उनके पास था, दूसरा उनके पति के पास.

उर्मिला बताती हैं कि मंगला उनके पिता के गांव से थी. उसने उर्मिला को बताया कि उसकी ससुराल राजस्थान में है, और वह अपनी गाड़ी से जा रही है. उसने उर्मिला को भी चलने का न्योता दिया. जब उर्मिला साथ आ गईं तो उसने उन्हें जैसलमेर ले जाकर हीरा माली नाम के एक व्यक्ति को बेच दिया. जब उर्मिला ने विरोध करने की कोशिश की तो उन्हें मारा-पीटा गया, उनका मोबाइल फोन तोड़ दिया गया.

वे बताती हैं, ‘किला दिखाने के बहाने मुझे बेच दिया गया. मेरी जबरन शादी करा दी. मैं शोर मचाती थी तो मुझे गांव से बाहर रेत के बीच बनी झोपड़ी में रखा. एक दिन मैं भाग गई और सोनगीर पुलिस स्टेशन पहुंची. वहां रिपोर्ट लिखवाई. लेकिन इन आदमियों ने जैसलमेर में मेरे खिलाफ झूठी रिपोर्ट लिखवा दी. दो दिन में जैसलमेर से एक लेडी पुलिस कॉन्सटेबल आई और मुझे वापस राजस्थान ले गई. मुझे जोधपुर की जेल में डाल दिया गया. बाद में वापस फिर हीरा माली के साथ भेज दिया. मेरे पापा को पता चल गया था पर उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो कुछ कर पाते. फिर ‘जन साहस’ वालों को मेरा केस पता चला तो उनकी मदद से मैं वहां से निकली.’ उस वक्त उर्मिला के गर्भ में सात महीने का बच्चा था. आज वह बच्चा चार महीने का है. उसके पास पिता का नाम नहीं है. उर्मिला अनपढ़ हैं. इस समय उनके माता-पिता ही उनकी देखभाल कर रहे हैं.

प्रतिमा और उर्मिला के अलावा यहां ऐसी और भी ऐसी महिलाएं आई हुई हैं जिन्हें जबरन शादी या मजदूरी के लिए बेच दिया गया. श्रम के लिए बेचे गए पुरुष भी इनके साथ हैं. इनमें से किसी की भी कहानी कम दिल दहला देने वाली नहीं है. समाज के बेहद गरीब और लगभग बिना पढ़े-लिखे तबके से आने वाले इन लोगों को उम्मीद है कि जब वे देश के कानून बनाने वालों से मिल कर अपनी बात कह रहे हैं तो ज़रूर उनकी बात सुनी जाएगी.

मानव तस्करी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2018 के मुख्य बिंदु:

  • यह तस्करी के विभिन्न उद्देश्यों जैसे जबरन मजदूरी, सरोगेसी, भिक्षावृत्ति, अंग निकालने आदि को संज्ञान में लेता है
  • इसमें पुनर्वास पर पूरा ज़ोर दिया गया है. यह आश्रय स्थलों से आगे बढ़कर पीड़ित का संपूर्ण पुनर्वास सुनिश्चित करने की व्यवस्था की बात करता है.
  • यह पीड़ित-आधारित बिल है क्योंकि इसमें पीड़ित को सुरक्षा, आश्रय, भोजन, कपड़े, काउंसलिंग, स्वास्थ्य सेवा और राहत राशि देने का भी प्रावधान है. यह राशि किसी भी प्रकार के मुआवज़े से अलग होगी.
  • यह विधेयक तस्करी से बचकर निकले हुए लोगों को ऐसे पीड़ित मानने की बात करता है, जिन्हें सहायता की ज़रूरत है. विधेयक के मुताबिक पुनर्वास पीड़ित का अधिकार होगा.
  • इसमें इस तरह के मामलों की सुनवाई के लिए हर ज़िले में विशेष न्यायालयों का प्रावधान है ताकि सुनवाई तेज़ी से हो सके.
  • ऐसी घटनाओं की रोकथाम, पीड़ितों के संरक्षण और पुनर्वास के लिए इसमें ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर समर्पित संस्थागत ढांचे की बात कही गई है. गृह मंत्रालय की देखरेख में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) एंटी ट्रैफिकिंग ब्यूरो का काम करेगी.
  • इस कानून में ऐसे अपराधों से जुड़े अन्य कानूनों जैसे बाल श्रम कानून, बाल विवाह रोकथाम कानून और अनैतिक व्यापार रोकथाम कानून आदि के प्रस्तावित कानून से समन्वय का भी ध्यान रखा गया है.
  • यह कानून महिला, पुरुष और किन्नर सभी के लिए होगा.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल में इस विधेयक को मंज़ूरी देते हुए अपनी पीठ थपथपाते हुए दावा तो किया है कि इसके ज़रिए भारत दक्षिण एशिया में मानव तस्करी से लड़ाई का अगुआ होने जा रहा है. पर ज़मीनी स्तर पर यह दावा कितना सच होता है, यह जल्दी ही साफ हो जाएगा.