कॉनराड संगमा ने बुधवार को मेघालय के नए मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाल लिया है. 60 सदस्यीय विधानसभा में उनकी नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) के 19 विधायक हैं, जो यहां की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस से दो कम हैं. एनपीपी ने जरूरी बहुमत जुटाने के लिए भाजपा और तीन क्षेत्रीय दलों के विधायकों का समर्थन हासिल किया है. इसके बाद कॉनराड के सामने मेघालय को एक स्थिर सरकार देना बड़ी चुनौती है.

मेघालय में आगे जब-जब सरकार संकट में फंसेगी, कांग्रेस इसका पूरा फायदा उठाने की कोशिश करेगी. यह ऐसी स्थिति है जहां छोटी-छोटी पार्टियों के पास अब सरकार चलाने-गिराने यानी मोलभाव की जबर्दस्त ताकत होगी. मुख्यमंत्री मुकुल संगमा की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की एक बड़ी उपलब्धि तो यही कही जा सकती है कि वे आठ साल तक यहां स्थिर सरकार दे पाए. मेघालय में उनके पहले की सरकारें आयाराम-गयाराम की तर्ज पर बनती-गिरती रही हैं.

एनपीपी की अगुवाई में बने सत्ताधारी गठबंधन – मेघालय डेमोक्रेटिक एलायंस (एमडीए) में पांच पार्टियां शामिल हैं. इसमें जब-जब मतभेद उभरेंगे, तब-तब कॉनराड संगमा को इस परीक्षा से गुजरना होगा कि वे कितनी कुशलता से इन्हें सुलझाते हैं. इनके बीच मतभेद उभरने की संभावना इसलिए है क्योंकि इन सभी पार्टियों ने अलग-अलग मुद्दों और विचारधारा के आधार पर चुनाव लड़ा था.

मेघालय की राजनीति हमेशा से कांग्रेस के आसपास ही घूमती रही है. एमडीए में शामिल सभी पार्टियां उसे अपना मुख्य विरोधी समझती हैं और इसी साझा विचार के चलते इनके बीच गठबंधन भी हुआ है. इसके साथ ही 59 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद सिर्फ दो पर जीत हासिल करने वाली भाजपा ने इन्हें मतभेद भुलाकर गठबंधन के लिए तैयार करने में काफी अहम भूमिका निभाई है.

मेघालय में नई सरकार के लिए अब पहली जरूरत है एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम तैयार करने की. वैसे मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि गठबंधन उन मुद्दों की पहचान करेगा जहां मतभेद हैं और कोशिश करेगा कि उन्हें जल्द से जल्द सुलझाया जाए. हालांकि यह इतना आसान नहीं है. यह संकट शुरुआत में ही तब उजागर होता हुआ दिखा जब हिल स्टेट पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (एचएसपीडीपी) के अध्यक्ष ने मंत्रिमंडल में भाजपा को शामिल करने पर आपत्ति जताई थी.

जहां तक भाजपा की बात है तो वह कई मसलों पर उत्तर-पूर्व की संवेदनशीलता को समझती है. यही वजह भी थी कि उसने यहां प्रचार अभियान के दौरान अपने हिंदुत्व के एजेंडे को पीछे रखा. चूंकि अब वो सरकार में शामिल है इसलिए देश के दूसरे हिस्सों की उसकी गतिविधियों पर यहां भी चर्चा होगी और बहुत संभावना है कि इससे गठबंधन भी प्रभावित हो.

मेघालय की नई सरकार की एक निराशाजनक बात यह है कि इसके 12 कैबिनेट मंत्रियों में एक भी महिला नहीं है. जबकि एनपीपी ने कॉनराड की बहन और पूर्व केंद्रीय मंत्री अगाथा को पहले पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था. हालांकि चुनाव के बाद उनकी जगह कॉनराड को वरीयता दी गई जो फिलहाल अपने पिता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा की सीट तुरा से लोकसभा सांसद हैं.

मेघालय मातृसत्तात्मक समाज है, लेकिन महिलाओं के प्रति रुढ़वादिता के चलते यहां की राजनीति में उनकी बहुत कम भागीदारी है. इस बार कुल 370 उम्मीदवारों में से सिर्फ 32 महिलाएं थीं और इनमें से भी सिर्फ चार विधानसभा तक पहुंची हैं. इस आधार पर कहा जा सकता है कि यह चुनाव भी इस रुढ़िवादिता को तोड़ नहीं पाया है. (स्रोत)