आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलने से नाराज तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने केंद्र की एनडीए सरकार से बाहर होने की घोषणा कर दी है. हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक टीडीपी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू ने ऐलान किया है आज पार्टी के दो केंद्रीय मंत्री सरकार छोड़ देंगे. ये दोनों मंत्री पी अशोक गजपति राजू (विमानन मंत्री) और वाईएस चौधरी (विज्ञान व तकनीक राज्य मंत्री) हैं. इस घोषणा से पहले टीडीपी नेताओं ने कहा कि भाजपा ने उन्हें ऐसी स्थिति में ला दिया है जिसके चलते उन्हें यह सख्त रुख अपनाना पड़ा. केंद्र सरकार के बजट पेश करने के बाद से ही टीडीपी और मोदी सरकार पर दबाव बनाए हुए थी कि वह आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दे.

अपनी आगे की रणनीति बताते हुए चंद्रबाबू नायडू ने बुधवार देर रात पत्रकारों से कहा, ‘सबसे पहले हमारे दोनों केंद्रीय मंत्री (प्रधानमंत्री) गुरुवार को नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देंगे.’ नायडू ने यह भी बताया कि शिष्टाचार के तहत उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसकी जानकारी देने के लिए उनके कार्यालय से संपर्क किया था. उन्होंने कहा, ‘मेरी फोन पर प्रधानमंत्री से बात नहीं हो पाई. हमारे अधिकारियों ने पीएमओ को इसकी जानकारी दे दी है.’ नायडू ने कहा कि भाजपा के साथ गठबंधन में बने रहने का फैसला बाद में लिया जाएगा.

रिपोर्ट के मुताबिक टीडीपी के सांसदों और अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों से बातचीत के बाद चंद्रबाबू नायडू ने केंद्र सरकार से अलग होने का फैसला किया है. उनके मुताबिक अरुण जेटली के बयान से साफ संकेत मिलता है कि एनडीए सरकार आंध्र प्रदेश के संकट के समाधान में रुचि नहीं रखती. नायडू ने कहा, ‘जब सरकार में शामिल होने के मकसद पर ही काम नहीं किया जा रहा तो हमारे पास (सरकार से) निकलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.’ केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को कहा था कि 14वें वित्त आयोग ने विशेष राज्य के दर्जे को खत्म कर दिया है. हालांकि उन्होंने आंध्र प्रदेश को विशेष आर्थिक पैकेज देने की बात जरूर कही थी. उनका कहना था कि यह बस शब्द का फर्क होगा और इसके वित्तीय फायदे विशेष दर्जे जैसे ही होंगे.

टीडीपी के फैसले का असर

टीडीपी के दोनों केंद्रीय मंत्रियों के कैबिनेट छोड़ने के बाद भाजपा के मंत्रियों को भी चंद्रबाबू नायडू की कैबिनेट छोड़नी होगी. वैसे टीडीपी के सरकार से बाहर होने की घोषणा के बाद मोदी सरकार को कोई खतरा नहीं है. लेकिन 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है. जानकार बताते हैं कि आंध्र प्रदेश की मांगों की अवेहलना कर भाजपा बड़ा जोखिम उठा रही है. 2014 में आंध्र प्रदेश के विभाजन के चलते कांग्रेस की यहां एक भी लोकसभा सीट नहीं बची थी. उनका मानना है कि आगे भाजपा भी राज्य की राजनीति में और भी हाशिए पर जा सकती है. फिलहाल यहां से भाजपा और टीडीपी के कुल 17 लोकसभा सदस्य आते हैं.

भाजपा के एक धड़े ने टीडीपी की प्रतिद्वंद्वी वाईएसआर कांग्रेस में दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन टीडीपी ने उसके इस विकल्प को पहले ही खत्म कर दिया. सूत्रों का कहना है कि वाईएसआर कांग्रेस भाजपा के साथ नहीं आएगी क्योंकि सत्ताधारी टीडीपी उस पर आंध्र प्रदेश से वादाखिलाफी करने के आरोप लगा रही है. यानी पार्टी को भापा से जुड़ने पर राजनीतिक नुकसान हो सकता है. कहा जा रहा है कि अब कोई नया समझौता 2019 के बाद ही हो सकता है.

उधर, भाजपा नेताओं ने दावा किया है कि मौजूदा संकट को अभी भी दूर किया जा सकता है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘आम चुनाव में अभी करीब एक साल बाकी है. यह काफी लंबा समय है. हम देखेंगे कि राज्य में कैसे समीकरण बनते हैं. अगले एक साल में जो भी स्थितियां उभरेंगी पार्टी उसी हिसाब से कदम उठाएगी.’ वहीं, एक अन्य भाजपा नेता के मुताबिक यह भाजपा के लिए आंध्र प्रदेश में अपना विस्तार करने का मौका है.