त्रिपुरा के बेलोनिया इलाक़े में व्लादिमीर लेनिन की मूर्ति गिराए जाने के बाद रूस के इस क्रांतिकारी नेता का नाम सुर्खियों में है. मीडिया और सोशल मीडिया पर लेनिन की कहानियां बताई जा रही हैं. उनके राजनीतिक जीवन और संघर्ष के साथ उनके शासनकाल में मारे गए लोगों के क़िस्से बताए जा रहे हैं. यह भी, कि भारत के संदर्भ में लेनिन का क्या महत्व है. कहीं बताया जा रहा है कि व्लादिमीर लेनिन भारत की आज़ादी के ज़बरदस्त समर्थक थे और इसके लिए उन्होंने एक बार लोकमान्य तिलक को भी खुला समर्थन दिया था.

लेनिन को लेकर ऐसे तमाम क़िस्से-कहानियों के बीच एक हिंदी न्यूज़ चैनल का वीडियो वायरल हो गया है. यह वीडियो चैनल के प्राइम टाइम शो का है जिसमें शहीद भगत सिंह के जीवन पर लेनिन के प्रभाव को लेकर हो रही चर्चाओं पर कटाक्ष किया जा रहा था. शो में कहा गया, ‘आज बहुत सारे बुद्धिजीवी अपने आदर्श पुरुषों के पापों को धोने के लिए भारत के महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के नाम का इस्तेमाल करते हैं. आज कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेता यह कहते हुए देखे गए कि भगत सिंह लेनिन के विचारों से बहुत प्रभावित थे इसलिए लेनिन हमारे लिए पूजनीय हैं. यह बात सत्य है कि भगत सिंह उस दौर के कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों के विचारों को समझने के लिए उनके लेख अक्सर पढ़ा करते थे. यह भी हो सकता है कि भगत सिंह कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों से प्रभावित भी हुए हों. लेकिन इसका आकलन करने से पहले यह याद रखना होगा कि वर्ष 1931 में भगत सिंह को अंग्रेज़ों ने फांसी दे दी थी. सिर्फ़ 23 वर्ष की उम्र में वे शहीद हो गए थे. और बाद में जब लेनिन की क्रूरता दुनिया के सामने आई तब भगत सिंह जीवित नहीं थे. लेनिन ने सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए अपने ही लोगों का ख़ून बहाया था. अगर भगत सिंह आज जीवित होते तो कभी भी इस बात को बर्दाश्त नहीं करते.’

देखा जाए तो वीडियो में लेनिन और भगत सिंह को लेकर भ्रामक बात कही गई है. इसमें यह साबित करने की कोशिश की गई है कि भगत सिंह को फांसी 1931 में ही दे दी गई थी जबकि लेनिन का अत्याचार उसके बाद दुनिया के सामने आया. इससे तो यही लगता है कि चैनल के मुताबिक़ लेनिन की मौत भगत सिंह के बाद हुई थी. हालांकि तथ्य कुछ और ही जानकारी देते हैं.

लेनिन की मौत भगत सिंह के शहीद होने से सात साल पहले 1924 में ही हो गई थी. वे दुनिया की सबसे असरदार शख़्सियतों में से एक थे, और यह सच है कि भगत सिंह लेनिन से ख़ासे प्रभावित थे. इसलिए कई जानकार सवाल करते हैं कि यह कैसे संभव है कि पढ़ने के बेहद शौक़ीन भगत सिंह, लेनिन के शासनकाल के दौरान हुई घटनाओं से परिचित न रहे हों.

भगत सिंह को लेकर जानकार दावा करते हैं कि वे केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे बल्कि गंभीर विचारक भी थे. उन्हें पढ़ने का बहुत शौक़ था और यह उनकी बातों और लेखों से पता चल जाता है. बताते हैं कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी से कुछ किताबें मंगवाई थीं. इनमें व्लादिमीर लेनिन की ‘लेफ़्ट विंग कम्युनिज़्म’ भी शामिल थी. इतना ही नहीं, जब भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे तो भगत सिंह ने उनका स्वागत करते हुए पूछा कि वे उनके लिए लेनिन की किताब ‘स्टेट एंड रिवॉल्यूशन’ लाए या नहीं?’ मेहता के किताब देते ही भगत सिंह उसे पढ़ने लगे. यह किताब 1927 में प्रकाशित हुई थी.

लेनिन के बारे में कहा जाता है कि उनके शासनकाल में विरोधियों को ‘लाल आतंक’ का सामना करना पड़ा था. यह हिंसक अभियान सरकारी सुरक्षा एजेंसियों की ओर से चलाया गया था. कहते हैं कि इसके तहत हज़ारों लोगों पर अत्याचार किए गए. वहीं, 1917 से 1922 के बीच लेनिन की सरकार ने गृह युद्ध में विरोधी सेनाओं को परास्त कर दिया था. लेकिन लड़ाई के चलते जो भुखमरी और निराशा फैली उसने लेनिन को नई आर्थिक नीतियां लाने पर मजबूर कर दिया. 24 जनवरी, 1924 को उनका निधन हो गया. उनके शव का अंतिम संस्कार नहीं किया गया और वह आज भी मॉस्को के रेड स्क्वेयर में सही सलामत रखा हुआ है. माना जाता है उनके विचारों ने दुनिया भर के क्रांतिकारियों को प्रभावित किया था. भगत सिंह भी उनमें से एक थे.