कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के लिए गिनती के दिन ही रह गए हैं. और इससे ठीक पहले राज्य की सिद्धारमैया सरकार ने राज्य का झंडा जारी कर बड़ी बहस को हवा दी है. साथ ही चुनाव में कन्नड़ अस्मिता को बड़ा मुद्दा बनाने का संकेत भी.

ख़बरों के मुताबिक सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने राज्य का झंडा जारी कर उसे अंतिम अनुमति के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा है. अगर केंद्र से अनुमति मिल जाती है तो इस झंडे को राज्य के ध्वज (नाद ध्वज) के रूप में मान्यता दे दी जाएगी. और ऐसा होने पर देश में जम्मू-कश्मीर के बाद कर्नाटक दूसरा ऐसा राज्य हो जाएगा जिसका अपना अलग झंडा होगा. हालांकि इसकी संभावना कम नजर आती है कि क्योंकि संविधान में सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर के लिए ही अलग झंडे का विशेष प्रावधान किया गया है. अन्य किसी राज्य के लिए नहीं.

ऐसे में अलग झंडे का मसला सियासी और चुनावी चहलक़दमी ज़्यादा लगता है. यह सिद्धारमैया सरकार द्वारा विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को उलझाने की कोशिश भी है. क्योंकि केंद्र में भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार कर्नाटक के अलग झंडे को अव्वल तो संविधान के तहत मान्यता दे नहीं सकती. ऐसे में उस पर आसानी से कन्नड़ अस्मिता को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया जा सकता है. और एक बार मान भी लें कि मोदी सरकार ने इसे मान्यता दे दी तो दूसरे राज्यों से भी ऐसी ही मांग उठने लगेगी. साथ ही जम्मू-कश्मीर में भाजपा का पक्ष कमजोर हो जाएगा.

यहां बताते चलें कि सिद्धारमैया सरकार ने कर्नाटक के अलग झंडे पर विचार करने के लिए एक नौ सदस्यों वाली समिति बनाई थी. इस समिति के अध्यक्ष कन्नड़ लेखक हंपा नागराजैया थे. इस समिति ने तमाम वैधानिक-संवैधानिक पहलुओं पर विचार के बाद झंडे का डिजाइन मंज़ूर किया है. यह झंडा लाल, सफेद और पीले रंग का है. इसके बीच में दो सिर वाले रहस्यमय पौराणिक पक्षी ‘गंडा भेरुंड’ का चित्र राज्य के प्रतीक के तौर पर स्थापित है.