कांग्रेस के वरिष्ठ केंद्रीय नेता रणदीप सुरजेवाला बीते हफ्ते प्रदेश की राजधानी भोपाल में थे. सुरजेवाला पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं सो ज़ाहिर तौर पर उन्हें यहां मीडिया से मिलना ही था. शाम चार बजे प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के पत्रकार वार्ता कक्ष में वे मीडिया से मुखातिब हुए. शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था आदि से जुड़े राज्य के आंकड़ों के साथ वे पूरी तैयारी से आए थे. केंद्र सरकार के ये आंकड़े गिनाकर उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि मध्य प्रदेश इन सभी मामलों में कैसा बदहाल है, देश में इस राज्य की कैसे दुर्गति है.

प्रदेश के भाजपाई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चूंकि बच्चों के बीच ‘मामा’ के तौर पर लोकप्रिय हो चुके हैं इसलिए सुरजेवाला ने उन पर ख़ास कटाक्ष किया. महाभारत से संदर्भ लेते हुए बार-बार याद दिलाया कि एक मामा कंस था, दूसरा शकुनि और अब तीसरे शिवराज हुए हैं. सुरजेवाला पूरी रौ में थे. इसलिए कहते-कहते कह गए, ‘कांग्रेस इस बार मामा शिवराज के शासन का अंत कर देगी. अर्जुन की तरह लड़ते हुए उनको सिंहासन से बेदख़ल कर देगी. और इससे भी आगे जाकर अभिमन्यु की तरह उनका चक्रव्यूह तोड़ देगी.’

तभी किसी ने पूछ लिया कि क्या कांग्रेस इस बार मध्य प्रदेश में कोई चेहरा (मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी) घोषित कर चुनाव लड़ेगी? सुरेजवाला का ज़वाब था, ‘कांग्रेस के पास चेहरों की कमी नहीं है. प्रदेश में हमारे पास कम से कम आधा दर्ज़न ऐसे नेता हैं जो मुख्यमंत्री पद सहित हर ज़िम्मेदारी निभाने में सक्षम हैं. पार्टी उन सभी के संयुक्त नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी.’

इससे पहले 2013 में भी यही हाल और नतीज़ा बेहाल था

राज्य विधानसभा चुनाव के लिए चेहरे पर यह ना-नुकुर 2013 में भी थी. उस वक़्त भी कांग्रेस ने प्रदेश के तमाम दिग्गजों को साधते हुए चुनाव में उतरने की रणनीति बनाई थी. ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रचार अभियान समिति की कमान दी गई थी. तब के प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया को चुनाव समिति का मुखिया बनाया गया. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी को घोषणा पत्र समिति, अरुण यादव (वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष) को चुनाव प्रबंध समिति और एक अन्य नेता प्रेमचंद्र गुड्‌डू को प्रकाशन व मीडिया समिति की कमान सौंपी गई. राज्य विधानसभा में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को सरकार के ख़िलाफ़ आरोप पत्र तैयार करने वाली समिति की कमान दी गई थी.

इनके अलावा अन्य भी समितियां बनीं और इन सभी समितियों के समन्वय की ज़िम्मेदारी वरिष्ठ सांसद कमलनाथ के कंधों पर डाल दी गई. लेकिन इतने ‘सेनापतियों’ के साथ चुनावी समर में उतरने का नतीज़ा वही हुआ जिसकी आशंका थी. एक चेहरे को सामने रखकर उतरी भाजपा से कांग्रेस लगातार तीसरी बार चुनाव में मात खा गई.

जानकारों के एक वर्ग के मुताबिक कांग्रेस फिर वही गलती दोहरा रही है. रणदीप सुरजेवाला ने जो कहा उससे साफ था कि पार्टी अब तक शिवराज के सामने सक्षम चेहरा पेश करने के मामले में कुछ तय नहीं कर पाई है.

इसका एक और संकेत मध्य प्रदेश से ही पार्टी के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्रकार वार्ता के दौरान भी मिला. जिस रोज सुरजेवाला भोपाल आए थे उसी दिन सिंधिया ने भी सुबह-सुबह कांग्रेस कार्यालय में ही मीडिया से मुलाक़ात की थी. उनके साथ पार्टी के प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया भी थे. चुनाव का समय नज़दीक आ रहा है और सिंधिया कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी के दावेदारों में शुमार होते हैं. लिहाज़ा स्वाभाविक तौर पर उनसे पूछ लिया गया कि क्या अगले चुनाव में उन्हें कांग्रेस मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करेगी. इस पर सिंधिया का ज़वाब था, ‘हर प्रदेश की परिस्थितियां अलग होती हैं. मध्य प्रदेश की परिस्थितियों के हिसाब से जो सर्वश्रेष्ठ फ़ैसला होगा वह पार्टी लेगी और हम सब उसे मानेंगे.’

इससे पहले तक सिंधिया ख़ुद इसकी वकालत कर चुके हैं कि पार्टी को चेहरा सामने रखकर चुनाव में उतरना चाहिए. अभी हाल में ही प्रदेश की दो विधानसभा सीटों- मुंगावली और कोलारस में हुए उपचुनाव के दौरान भी उन्होंने यही बात दोहराई थी. उन्हें जब इस बाबत याद दिलाया गया तो वे कहने लगे, ‘मैंने चेहरा घोषित करने वाली बात राष्ट्रीय संदर्भ में कही थी.’

तो क्या कांग्रेस पिछली बार वाली गलती दोहरा रही है? यह सवाल भी सुरजेवाला से सीधे पूछा गया था. इस पर उन्होंने माना कि पिछली तीन बार कांग्रेस से कुछ ग़लतियां हुईं थीं और पार्टी ने इनका ख़मियाज़ा भी भुगता है. उनका कहना था, ‘कांग्रेस 15 साल से राज्य की सत्ता से बाहर है. लेकिन इस बार पहले जैसी ग़लतियां नहीं होने देंगे.’

हालांकि उनके इस दावे और पार्टी में हो रही हलचल के बीच विरोधाभास भरपूर नज़र आता है. कुछेक उदाहरण एक़दम ताज़ा हैं. जैसे कि मुंगावली-कोलारस उपचुनाव के प्रचार के दौरान कांग्रेस की तरफ़ से पूरे इलाके में ‘अबकी बार सिंधिया सरकार’ के पोस्टर चर्चा में रहे. यही नहीं अभी शनिवार को ही भोपाल के स्थानीय अख़बारों में ख़बर आई कि हिंदी भवन में ‘अबकी बार भूरिया सरकार’ के पोस्टर लगे देखे गए हैं. भूरिया यहां आदिवासी विकास परिषद की बैठक में हिस्सा लेने आए थे. वे इस परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. हालांकि उनकी ओर से इन पोस्टरों को भाजपा की साज़िश बताया गया है.

उधर, प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह इन दिनों सियासी तौर पर सक्रिय न होकर भी ‘सक्रिय’ हैं. वे नर्मदा परिक्रमा यात्रा कर रहे हैं, इस यात्रा में मध्य प्रदेश के 100-125 विधानसभा क्षेत्रों को छू रहे हैं, लोगों से तमाम मसलों पर राय ले रहे हैं और उन्हें जनसमर्थन भी भरपूर मिल रहा है. यात्रा पूरी होने पर वे क्या करेंगे कोई नहीं जानता.

फिर अरुण यादव भी हैं जो प्रदेश इकाई की कमान आसानी से छोड़ने को तैयार नहीं हैं. विधानसभा में मौज़ूदा नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह भी अलग आवाज़ बुलंद कर रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि उन्होंने हाल में ही पार्टी की उस नीति का खुला विरोध किया है जिसके तहत विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारी की उम्मीद रखने वालों से 50,000 रुपए मांगे जा रहे हैं. टिकट पाने की इच्छा रखने वालों को यह पैसा पार्टी फंड में जमा कराने के लिए कहा जा रहा है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ भी इन दिनों सोशल मीडिया पर पहले से कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हैं. वे भी चाहते हैं कि पार्टी इस बार संभावित मुख्यमंत्री के चेहरे के साथ चुनाव मैदान में उतरे. बीती मई में तो ये ख़बरें भी आई थीं कि उन्होंने नेतृत्व को यह धमकी तक दे दी है कि उन्हें अगर मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाया गया तो वे पार्टी छोड़ देंगे. हालांकि वे कई मौकाें पर सिंधिया का चेहरा सामने रखने की भी वक़ालत कर चुके हैं.

क्या पार्टी किसी को चुनेगी?

हालांकि बात फ़िर वहीं अटक जाती है कि आक्रामक भाजपा से निपटने के लिए क्या कांग्रेस इतने दावेदारों में से किसी एक को चुनने का जोख़िम उठाएगी? या फ़िर सुरक्षित गलियारा तलाशने को ही तरज़ीह देगी? अब तक कि स्थितियां तो दूसरे विकल्प की तरफ़ झुकी ज़्यादा नज़र आती हैं. सत्याग्रह से बातचीत करते हुए प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा साफ़ कहते हैं, ‘मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करके चुनाव लड़ना पार्टी की रीति-नीति नहीं है. फिर भी राष्ट्रीय नेतृत्व अगर इस बाबत कोई फ़ैसला करता है तो सभी उसे मानेंगे.’

यही बात प्रदेश कांग्रेस के एक अन्य प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी भी कहते हैं. बल्कि वे तो उम्मीद भी जताते हैं कि 16 से 18 मार्च तक दिल्ली में होने वाले पार्टी के पूर्ण अधिवेशन में इस बाबत कोई न कोई फ़ैसला शायद हो जाएगा.

हालांकि डेक्कन क्रॉनिकल की एक ताज़ा ख़बर उनकी इस उम्मीद पर पानी फेरती दिखती है. इस ख़बर के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चाहते हैं कि राष्ट्रीय कार्यसमिति के 12 पदाधिकारियों का चयन चुनाव के जरिए हो. लेकिन कुछ पुराने वरिष्ठ नेताओं ने उनकी यह चाहत पूरी होने के रास्ते में अड़ंगा डाल रखा है.ऐसे में मध्य प्रदेश कांग्रेस अपने मौज़ूदा राष्ट्रीय नेतृत्व से क्या और कितनी अपेक्षा रख सकती है यह सोचने की बात है.

सवाल है कि अभिमन्यु की तरह प्रदेश का चुनावी समर लड़ने की बात भले सुरजेवाला के मुंह से अनायास निकल गई हो पर क्या कांग्रेस फिर से अभिमन्यु की ही गति’ को प्राप्त तो नहीं होने वाली है. जानकारों के मुताबिक इस बार जो भाजपा उसके सामने है वह पहले से कहीं ज़्यादा आक्रामक है जो किसी भी तरह सत्ता हासिल करने का स्पष्ट लक्ष्य लेकर अपना सियासी और चुनावी अभियान चला रही है. उसकी ताक़त और उत्साह पहले से कई-कई गुना ज़्यादा है. ऐसे में वह कब-किसे-कैसे घेरकर ‘अभिमन्यु की गति’ में पहुंचा दे कुछ कहा नहीं जा सकता.