क्या ऐसा आपके साथ भी हुआ है कि चिप्स, कुकीज़ या डोनट्स की तस्वीरें देखते ही आपका मन ललचाने लगा हो. या फिर कभी आपने इस बात पर गौर किया है कि घर पर जो भूख सिर्फ दो रोटी से मिट जाती है, कई बार वह दो-दो बर्गर खाने के बाद भी खत्म नहीं होती. हममें से ज्यादातर लोगों के साथ तो ये भी होता है कि वे बड़े से बड़ा पिज्जा खाने से सिर्फ तभी रुकते हैं, जब वह खत्म हो जाता है. यह सोचने वाली बात है कि आखिर पिज्जा-बर्गर या फास्टफूड कहे जाने वाले इस खाने में ऐसा क्या होता है कि हम इसे देखकर रुक नहीं पाते. और तो और अगर बस मन की संतुष्टि के लिए थोड़ा-सा खाने जाएं, तो कई बार जरूरत और भूख से कहीं ज्यादा खाकर आ जाते हैं. चलिए, सिर-पैर के सवाल में इस बार फास्टफूड के लिए लोगों की इस दीवानगी की वजह खोजते हैं.

सवाल के दूसरे हिस्से से शुरू करते हैं यानी पहले यह जानते हैं कि फास्टफूड हमेशा भूख से ज्यादा कैसे खा लिया जाता है. जब हम खाना खाते हैं तो कुछ एंजाइम्स और हॉर्मोन्स हमारे शरीर में सक्रिय हो जाते हैं. इनके सक्रिय होने से न सिर्फ शरीर में पाचन क्रिया की शुरूआत होती है बल्कि साइकोलॉजिकल पाथवेज भी बनते हैं. इन पाथवेज को न्यूरोट्रांसमीटर भी कहा जाता हैं. ये न्यूरोट्रांसमीटर्स मस्तिष्क तक यह सूचना पहुंचाते हैं कि शरीर को कितना भोजन मिल चुका है और, उसे और कितने भोजन की जरूरत है. हमारे दिमाग तक इन सिग्नलों के पहुंचने के चलते ही जरूरत भर का खाना खाने के बाद हमें अपना पेट भरा हुआ महसूस होता है और हम ओवरईटिंग से बच जाते हैं.

लेकिन जब भी हम चिप्स, कुकीज या बर्गर जैसी कोई चीज खाते हैं तो हमारे एंजाइम और हॉर्मोन पूरी तरह से सक्रिय नहीं हो पाते. इस कारण मस्तिष्क तक शरीर को मिले भोजन की सूचना नहीं पहुंच पाती और हम खाते ही जाते हैं. ऐसा होने की वजह इस तरह के खाने का बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड होना है.

दरअसल जब हम किसी खाद्य पदार्थ को उसके प्राकृतिक रूप में खाते हैं तो सक्रिय होने वाले एंजाइम और हॉर्मोन एकदम सही तरीके से सिग्नल भेजते हैं. यानी हमारे मस्तिष्क को खाने की न्यूट्रीशनल वैल्यू का पता चलता रहता है. इसके उलट जब प्रोसेस्ड फूड खाया जाता है तो यह हमारे न्यूरोट्रांसमीटर को भ्रमित कर देता है जिससे मस्तिष्क को सही सूचनाएं नहीं मिल पातीं. और न्यूट्रीशनल वैल्यू का पता नहीं चलने के कारण हम कई बार जरूरत से ज्यादा खा जाते हैं.

अब सवाल के पहले हिस्से पर आते हैं कि क्यों इस तरह के खाने को देखकर खुद पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाता है. इसका जवाब भी ऊपर कही गई बातों से ही निकलता है. असल में हमारे शरीर में प्राकृतिक खाने को पचाने का बहुत प्रभावशाली मैकेनिज्म होता है. खाने के मुंह में जाते ही जीभ में लार के साथ एंजाइम रिलीज होते हैं. इसी के कारण हमारा दिमाग तीन बेसिक स्वादों को पहचानने में सक्षम हो पाता है – वसा, मीठा और नमकीन. जब आप ऐसी कोई चीज खा रहे होते हैं तो हमारी मेमोरी में उस स्वाद की याद भी सुरक्षित हो जाती है. अगली बार जैसे ही आप उस चीज को दोबारा देखते हैं तो पाचन की जो प्रक्रिया खाने के बाद शुरू होनी थी वह पहले ही शुरू हो जाती है और आपके मुंह पानी आने लगता है.

ऐसा तब भी होता है जब हमें भूख लगी हो और सामने खाना रखा हो, लेकिन फास्टफूड के मामले में खाने की जरूरत के बजाय स्वाद की स्मृति के कारण ऐसा होता है. इस तरह हमारे लिए इन पदार्थों को खाने से खुद को रोक पाना मुश्किल हो जाता है, लेकिन इस तरह अपने ऊपर से नियंत्रण खो देना हमारे पाचन और हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता के लिए सही नहीं होता और यही आदत आगे चलकर मोटापे की वजह बनती है. इसलिए मन लगाकर खाना तो जरूरी है, लेकिन अगर थोड़ा दिमाग भी लगाया जाए तो कहीं ज्यादा बेहतर होगा.