केंद्र द्वारा आंध्र प्रदेश की विशेष राज्य का दर्जा (एससीएस) देने की मांग ठुकराए जाने के बाद एनडीए की एकता पर खतरा मंडराने लगा है. बुधवार को तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के मुखिया और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने घोषणा कर दी थी कि उनकी पार्टी नरेंद्र मोदी सरकार से उनके दोनों मंत्रियों को वापस बुलाएगी. कल इन दोनों मंत्रियों ने इस्तीफा भी दे दिया है. नायडू के मुताबिक उन्हें आंध्र प्रदेश की मांग पर केंद्र सरकार का रवैया बेहद आहत करने वाला और अपमानजनक लगा इसलिए उन्होंने यह फैसला किया है.

विशेष राज्य का दर्जा राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील मसला है. 2014 में आंध्र प्रदेश सरकार ने यह मांग माने जाने के बाद ही राज्य का बंटवारा स्वीकार किया था कि राजस्व के नुकसान की भरपाई के लिए उसे विशेष राज्य का दर्जा दिया जाएगा. इसके पीछे राज्य सरकार की दलील थी कि राजस्व का प्रमुख केंद्र हैदराबाद तेलंगाना के हिस्से में जाने की वजह से उसकी यह मांग पूरी तरह जायज है. फिलहाल यह दर्जा जम्मू और कश्मीर, उत्तर-पूर्वी राज्यों, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को ही हासिल है. इसके तहत राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा दिए जाने वाले फंड का 90 फीसदी हिस्सा राष्ट्रीय विकास परिषद के मार्फत दिया जाता है.

इस समय नायडू सरकार की दो सबसे प्रमुख परियोजनाओं – नई राजधानी अमरावती और पोलावरम बहुउद्देशीय बांध का निर्माण केंद्रीय वित्तीय सहायता से पूरा किया जा रहा हैं. आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा न मिल पाने की सबसे बड़ी वजह 14वें वित्त आयोग की वह सिफारिश है जिसके तहत केंद्र सरकार ने 2015 में विशेष राज्य का दर्जा देने का प्रावधान खत्म कर दिया है. हालांकि केंद्र ने आंध्र प्रदेश सरकार से वादा किया है कि वह दूसरे जरियों से राज्य को वित्तीय मदद देगा. लेकिन नायडू विशेष दर्जा दिए जाने की मांग पर अड़े हैं और इसे राज्य की प्रतिष्ठा का मुद्दा बना चुके हैं.

इसीलिए अगर टीडीपी सरकार इस मसले पर कोई समझौता करती है तो विपक्ष उस पर केंद्र के सामने आत्मसमर्पण करने का आरोप लगाते हुए राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करेगा. इस पूरे मामले में ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने यह समझने में गलती कर दी कि नायडू इसे स्थानीय स्तर पर कितना बड़ा मुद्दा बना चुके हैं.

फिलहाल टीडीपी में दिख रहा असंतोष भाजपा के लिए एक चेतावनी की तरह काम करना चाहिए. इससे पहले शिवसेना, अकाली दल और बिहार की दूसरी छोटी पार्टियां आरोप लगा चुकी हैं कि भाजपा सहयोगी दलों की उपेक्षा करती है. नायडू ने यह आरोप भी लगाया है कि वे अपनी मांग पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री से मुलाकात करना चाहते थे लेकिन उन्हें समय नहीं दिया गया. यह आरोप एनडीए में गठबंधन प्रबंधन की नकारात्मक छवि पेश करता है. केंद्र सरकार का यह आखिरी साल है और इसमें उसके एक अहम सहयोगी की नाराजगी भाजपा के लिए चिंता की वजह होनी चाहिए.

और यह सब ऐसे मौके पर हो रहा है जब विपक्षी पार्टियां भाजपा के आक्रामक विस्तार से परेशान हैं और मतभेदों को भुलाकर एक-दूसरे के करीब आ रही हैं. ऐसे में टीडीपी का विद्रोह भाजपा के लिए यह दिखाने का मौका हो सकता था कि वह अपने सहयोगियों के लिए फिक्रमंद है और उनके साथ पूरे सम्मान के साथ पेश आती है. लेकिन ताजा घटनाक्रम से बिलकुल उल्टा संकेत गया है. (स्रोत)