उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के लिए राज्य में हो रही ताबड़तोड़ पुलिस मुठभेड़ों का मसला परेशानी का कारण भी बन सकता है. राज्य मानवाधिकार आयोग (एसएचआरसी) ने अब तक जिन मुठभेड़ों की जांच की है उनके शुरूआती निष्कर्षों से इस तरह के संकेत मिल रहे हैं.

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक राज्य में योगी सरकार के एक साल से भी कम के कार्यकाल में अब तक 43 कथित अपराधियों को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया जा चुका है. इनमें से 10 तो इसी साल मारे गए हैं. एक कथित अपराधी को बीती पांच मार्च को ही मुठभेड़ में मारा गया. बताते हैं कि इन तमाम मुठभेड़ों में से चार की एसएचआरसी जांच कर रहा है. यह जांच मरने वाले कथित अपराधियों के परिजनों की शिकायत पर शुरू की गई है. इन सभी शिकायतों में पुलिस मुठभेड़ों को फ़र्ज़ी बताया गया है.

एक शिकायत उस व्यक्ति ने भी की है जिसके पास मारा गया कथित अपराधी नौकरी करता था. इस शिकायत में कहा गया है कि उसके कर्मचारी को कानपुर से पकड़ा गया था. और अगले दिन उसे आजमगढ़ में हुई पुलिस मुठभेड़ में मारा गया बता दिया. सूत्रों के मुताबिक इस तरह के आरोपों को सिरे से ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता. क्योंकि एसएचआरसी जिन चार मुठभेड़ों की जांच कर रहा है उन सभी की दर्ज़ एफ़आईआर में पुलिस ने एक सी कहानी बताई है. घटनाओं का क्रम भी मिलता-जुलता है.

पुलिस एफ़आईआर में बताया गया, ‘संदिग्ध मोटरसाइकिल पर जा रहे थे. पुलिस को उनके बारे में सूचना मिली थी. उन्हें जांच के लिए रोका गया. इसके बाद संदिग्धों ने पुलिस पर गोली चला दी. ज़वाबी कार्रवाई में मुख्य संदिग्ध आरोपित मारा गया. उसके अन्य साथी वाहन और हथियार छोड़कर भाग निकले. दो-तरफ़ा गोलीबारी में कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं.’ जबकि अख़बार ने अपने स्तर पर जांच में पाया कि जिन पुलिसकर्मियों को घायल बताया गया उन्हें कुछ ही दिन में अस्पताल से छुट्‌टी मिल गई.