तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) मोदी सरकार से बाहर हो गई है. केंद्र में उसके दोनों मंत्रियों ने गुरुवार को इस्तीफा दे दिया. हालांकि फिलहाल वह एनडीए में बनी हुई है.

इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के बीच करीब 20 मिनट बातचीत हुई थी. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि नायडू अपनी मांग प्रधानमंत्री के सामने रखना चाहते थे, लेकिन ठीक से रख भी नहीं पाए और 20 मिनट पूरे हो गए.

जब तक चंद्रबाबू नायडू की प्रधानमंत्री से बात नहीं हुई थी तब तक आंध्र प्रदेश में वे लगातार कह रहे थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री को फोन किया था, लेकिन पलटकर दिल्ली से फोन नहीं आया. कांग्रेस भी नायडू के सुर में सुर मिलाने लगी थी. अहमद पटेल जैसे नेता इसे आंध्र प्रदेश की बेइज्जती तक बताने लगे थे. लेकिन नरेंद्र मोदी ने देर से ही सही बाज़ी पलट दी.

भाजपा के कुछ बड़े नेताओं की मानें तो प्रधानमंत्री ने चंद्रबाबू नायडू से दो टूक कहा कि इस मुद्दे पर ज्यादा मोलभाव की गुंजाइश नहीं है. नरेंद्र मोदी ने कहा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली केंद्र सरकार का पक्ष रख चुके हैं और अब किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जाएगा. इसके अलावा जो भी मदद होगी वह आंध्र प्रदेश को मिलेगी. सुनी-सुनाई है कि प्रधानमंत्री ने सीधी बात की. उन्होंने कहा कि तेलुगू देशम के सांसद मोदी सरकार में रहें तो अच्छा, न रहें तो भी कोई शिकायत नहीं है. इसी बातचीत के बाद टीडीपी सांसदों ने मंत्री की कुर्सी छोड़ दी, लेकिन पार्टी ने एनडीए नहीं छोड़ा.

ये वही चंद्रबाबू नायडू हैं जिनके सहारे 20 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकार बनाई थी. उस वक्त नायडू देश के प्रधानमंत्री वाजपेयी और उपप्रधानमंत्री आडवाणी से सीधे बात करते थे. वे हैदराबाद में रहते थे लेकिन दिल्ली की सत्ता में उन्हें तीसरा सबसे ताकतवर नेता माना जाता था. उस वक्त भाजपा की खबर रखने वाले पत्रकार बताते हैं कि किसी भी कैबिनेट मंत्री की हिम्मत नहीं होती थी कि वह चंद्रबाबू नायडू को किसी बात के लिए मना कर सके.

फिर 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गई और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू भी चुनाव हार गए. इसके बाद आंध्र की सियासत में वाईएसआर यानी वाईएस राजशेखर रेड्डी कुर्सी पर बैठे और तब तक मुख्यमंत्री रहे जब तक वे ज़िंदा रहे. अब चंद्रबाबू नायडू की टक्कर वाईएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी से है. तेलुगू देशम पार्टी की खबर रखने वाले लोग बताते हैं कि चंद्रबाबू नायडू ने सोचा था कि वे अगर थोड़ी जिद करेंगे तो मोदी उनकी शर्तें मान लेंगे. लेकिन 20 मिनट की बातचीत में ऐसा हो न सका. आखिरकार नायडू ने बीच का रास्ता निकाला. पार्टी को एनडीए में रखा और मंत्रियों को सरकार से बाहर.

बात यहीं खत्म नहीं होती. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि आगे जो होने वाला है वह चंद्रबाबू नायडू की नींद उड़ा उड़ा सकता है. चूंकि वेंकैया नायडू देश के उपराष्ट्रपति हैं इसलिए आंध्र की सियासत में उनका कोई प्रत्यक्ष दखल नहीं हो सकता. जानकारों के मुताबिक इसलिए भाजपा धीरे-धीरे आंध्र प्रदेश में नए नेताओं की फौज खड़ा करना चाहती है. महासचिव मुरलीधर राव हों या प्रवक्ता जीवीएल नरसिंहा राव, सबको अभी से कह दिया गया है कि अगला चुनाव अकेले दम पर या बिना चंद्रबाबू नायडू के लड़ने की तैयारी शुरू कर दी जाए.

‘यही फर्क है 2004 और 2018 के एनडीए में. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा में चंद्र बाबू नायडू हों या उद्धव ठाकरे, इनकी धमकी का असर नहीं पड़ता. आंध्र प्रदेश हो या महाराष्ट्र दोनों ही जगह भाजपा अब अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है’ वाजपेयी और मोदी, दोनों का दौर देखने वाले पार्टी एक नेता कहते हैं, ‘पहले भाजपा को सहयोगियों की जरूरत थी, अब भाजपा को लगता है कि उनके सहयोगियों को मोदी के नाम की जरूरत है.’

अमित शाह के करीबी नेता तो यहां तक कहते हैं कि अगर पंजाब में भी भाजपा अपने दम पर चुनाव लड़ती तो नतीजे कुछ अलग होते. लेकिन पंजाब में जो हो गया सो हो गया, आगे से भाजपा हर राज्य का चुनाव अपने दम पर या अपनी शर्तों पर ही लड़ना चाहती है.

त्रिपुरा का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद संघ के पदाधिकारियों ने भाजपा के नेताओं से मुलाकात की थी. नागपुर में मोहन भागवत की खुद अमित शाह से बातचीत हुई थी. सुनी-सुनाई है कि पूर्वोत्तर के आठ में से सात राज्यों में एनडीए की सरकार बनाने के बाद भाजपा अब दक्षिण की तरफ पैर बढ़ाना चाहती है. कर्नाटक के बाद अगली बारी आंध्र प्रदेश की हो सकती है.