उत्तर-पूर्व के राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत ने या यूं कहें कि त्रिपुरा में वामपंथ की हार ने देश का राजनैतिक माहौल ही बदल दिया है. इस बदले हुए माहौल की सबसे बड़ी बानगी है देशभर में महापुरुषों की मूर्तियों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं. इसकी शुरुआत त्रिपुरा में ही लेनिन की प्रतिमा गिराने से हुई और इसके कुछ ही घंटों बाद खबर आई कि सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु में वहां के महान समाज सुधारक पेरियार की मूर्ति के साथ तोड़फोड़ कर दी गई.

लेनिन की मूर्ति गिराए जाने के लिए सीधे-सीधे भाजपा कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार बताया जा रहा था, वहीं पेरियार के मामले में भी ऐसा ही है. दरअसल लेनिन की मूर्ति ढहाने की खबर आने के बाद तमिलनाडु से आने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय सचिव एच राजा ने फेसबुक पर लिखा था कि अब अगला नंबर पेरियार की मूर्ति का है. इसी के बाद वेल्लूर के तिरुपत्तूर तालुका में उनकी एक मूर्ति को निशाना बनाया गया और इसमें भाजपा का एक स्थानीय नेता शामिल था.

यहां इस बात का जिक्र करना भी जरूरी है कि भाजपा के एक प्रवक्ता नारायण त्रिपाठी ने ए राजा का बचाव किया था. घटनाओं के इस सिलसिले से यह मानने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि भाजपा के लिए पेरियार एक विरोधी प्रतीक हैं. अब सवाल उठता है कि ऐसा क्यों है.

इस सवाल के जवाब में आगे बढ़ने से पहले पेरियार से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें जानना जरूरी है.

ईरोड वेंकट रामासामी या ईवी रामासामी यानी पेरियार दक्षिण भारत के वह नेता थे जिन्होंने ब्राह्मणवाद और हिंदू धर्म की कुरीतियों पर छोटी उम्र से ही प्रहार करना शुरू कर दिया था. वे न मूर्ति पूजा को मानते थे, न ही वेदांत को और न ही बाकी हिंदू दर्शन में उनकी आस्था थी.

पेरियार महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हुए थे. इसी दौरान उन्होंने 1924 में केरल में हुए वाइकोम सत्याग्रह में अहम भूमिका निभाई. अब तक तमिलनाडु में उनका कद काफी ऊंचा हो चुका था. वाइकोम सत्याग्रह के बाद लोगों ने उन्हें ‘वाइकोम वीरन’ यानी ‘वाइकोम का नायक’ की उपाधि दी थी. यही वो दौर था जब कांग्रेस में ब्राह्मणों और कथित उच्च वर्ग से उनका टकराव बढ़ने लगा और उन्होंने पार्टी छोड़ दी.

बाद में पेरियार ने दलित-हरिजनों और महिलाओं के लिए ‘सेल्फ रिस्पेक्ट’ आंदोलन यानी आत्मसम्मान आंदोलन भी चलाया. माना जाता है कि इन आंदोलनों के चलते तमिल और दक्षिण भारत की एक बड़ी आबादी समाज सुधार की तरफ प्रेरित हुई थी. यही वजह है कि पेरियार को राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती और विनोबा भावे सरीखे समाज सुधारकों की पांत में रखा जाता है. लेकिन इनसे अलग वे एक मंझे हुए राजनेता भी थे.

पेरियार की राजनीति

केरल का वाइकोम सत्याग्रह दलितों को यहां स्थित एक प्रतिष्ठित मंदिर में प्रवेश दिलाने और मंदिर तक जाती सड़कों पर उनकी आवाजाही का अधिकार दिलाने का आंदोलन था. महात्मा गांधी के साथ और कई बड़े नेताओं ने इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया था. पेरियार ने भी इस आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी और उन्हें इसके लिए जेल भी भेजा गया. आखिरकार यह आंदोलन सफल हुआ था.

इसके बाद पेरियार तमिलनाडु में नायक बन गए थे. वाइकोम सत्याग्रह ब्राह्मणवाद के खिलाफ ही था और पेरियार खुद ब्राह्मणों के मुखर विरोधी थे. माना जाता है कि दक्षिण में उनकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता के चलते कांग्रेस में मौजूद ब्राह्मणों का एक बड़ा तबका खासा आहत था. उधर दूसरी तरफ पेरियार का मानना था कि वाइकोम सत्याग्रह में उनकी भूमिका दबाने की कोशिश की गई थी.

यहां पेरियार के कांग्रेस नेताओं से टकराव के लिए एक और घटना का जिक्र किया जा सकता है. उस समय तमिलनाडु के कुछ गुरुकुलों को कांग्रेस पार्टी वित्तीय मदद देती थी. यहां कई गुरुकुलों में ब्राह्मण और अन्य जाति के बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था अलग-अलग थी और खाने में भी गुणवत्ता का अंतर था. पेरियार इसके खिलाफ आवाज उठाना चाहते थे लेकिन पार्टी ने कभी इसको तवज्जो नहीं दी.

इसी क्रम में 1925 के दौरान पेरियार ने तमिलनाडु कांग्रेस के सामने पार्टी नेतृत्व में गैर-ब्राह्मणों को अधिक भागीदारी देने से जुड़ा एक प्रस्ताव रखा. लेकिन इसे पार्टी ने सिरे से खारिज कर दिया. इस घटना के बाद पेरियार ने खुलकर कांग्रेस में बगावत कर दी. उन्होंने उसी समय अपने समर्थकों के बीच ऐलान भी किया कि वे एक दिन राज्य से कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर देंगे.

अपनी राजनीतिक आवाज को धार देने के लिए पेरियार ने 1938 में जस्टिस पार्टी का गठन किया था. फिर 1944 में इसे भंग करके उन्होंने द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) बनाई और 1968 में इस पार्टी ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर पहली बार राज्य में गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई.

इन बातों के जिक्र के साथ यह मूल सवाल कुछ और बड़ा हो जाता है कि भाजपा को पेरियार से क्या दिक्कत है, क्योंकि वे तो हमेशा कांग्रेस विरोध की ही राजनीति करते रहे थे. वहीं आज भाजपा भी बड़े जोर-शोर से कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान चलाने का दावा करती है.

क्या पेरियार की अस्मितावादी राजनीतिक विचारधारा से भाजपा को खतरा लगता है?

पेरियार ब्राह्मणवाद के खिलाफ थे और उन्होंने आजीवन हिंदू संस्कारों का विरोध किया. भाजपा को इससे ज्यादा दिक्कत नहीं हो सकती क्योंकि वह लोकप्रिय राजनीति के तहत आजकल सामाजिक समरसता के नाम पर ब्राह्मणवाद को हाशिए पर करने में लगी है.

लेकिन पेरियार की विचारधारा का एक और महत्वपूर्ण पहलू था - द्रविड़नाडु या द्रविड़स्तान के नाम से द्रविड़ों के लिए एक अलग देश की मांग करना. इसके लिए उन्होंने बाकायदा राजनीतिक मुहिम भी छेड़ी थी. वहीं जब 1965 में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला तो उन्होंने इसका जबर्दस्त विरोध किया था. पेरियार की राजनीति का यह हिस्सा भाजपा की विचारधारा के बिलकुल खिलाफ जाता है. चूंकि भाजपा के कथित राष्ट्रवाद की धुरी एक धर्म और एक भाषा पर टिकी है इसलिए इसका पेरियार के राष्ट्रवाद से सीधा टकराव होता है.

हालांकि भाजपा का यह राष्ट्रवाद अपने आप में बड़ा विरोधाभासी है और यह इसलिए है कि क्योंकि यह जनसंघ से उसे मिला है. भारत विभाजन के समय जनसंघ के राष्ट्रवाद का यह विरोधाभास खुलकर सामने आया था. इसको हम राममनोहर लोहिया की किताब ‘भारत विभाजन के गुनहगार’ की कुछ पंक्तियों से समझ सकते हैं. इनमें लोहिया बताते हैं, ‘विभाजन के लिए कट्टर हिंदूवादियों का विरोध असल में अर्थहीन था, क्योंकि देश को विभाजित करने वाली प्रमुख शक्तियों में निश्चित रूप से कट्टर हिंदूवाद भी एक शक्ति थी... अखंड भारत के लिए अधिक व उच्च स्वर में नारा लगाने वाले वर्तमान जनसंघ और उसके पूर्व पक्षपाती हिंदूवाद की भावना के अहिंदू तत्व थे... एक राष्ट्र के अंतर्गत मुसलमानों को हिंदुओं के नजदीक लाने के संबंध में उन्होंने कुछ नहीं किया. एक दूसरे से पृथक रखने के लिए सबकुछ किया. पृथकता की नीति को अंगीकार करना, साथ ही अखंड भारत की कल्पना करना अपने आप में घोर आत्मवंचना (खुद को धोखा देना) है.’

अब आज की राजनीति की बात करें तो जबसे भाजपा ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का अपना अभियान चलाया है, इसके तहत कई राज्यों में उसे क्षेत्रीय दलों से गठजोड़ और समझौते करने पड़े हैं. अगर बिहार या बंगाल का उदाहरण देखें तो समझ आता है कि क्षेत्रीय दलों के सामने भाजपा को खासी मुश्किल पेश आती है. ऐसे में राष्ट्रवाद की आड़ में इन दलों को कुचलना उसकी प्राथमिकता बन जाती है.

तमिलनाडु में जयललिता की मौत और शशिकला के जेल जाने के बाद हालात बदल रहे हैं. राज्य में एआईएडीएमके की सरकार है लेकिन मुख्यमंत्री पलानीसामी और उनके डिप्टी पनीरसेल्वम अब भाजपा की भाषा बोलते हुए नज़र आ रहे हैं. दूसरी तरफ विपक्षी डीएमके पार्टी पेरियार की विरासत की कथित वारिस है. हाल ही में अपनी पार्टी बनाने वाले कमल हासन का झुकाव भी इसी तरफ है. बहुत मुमकिन है कि इन हालात में भाजपा को लगता हो कि अगर उसे यहां खुद को और मजबूत करना है तो उसे अपने कथित अखिल भारतीय राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाते हुए क्षेत्रीय लेकिन विरोधी विचारधारा के खिलाफ आक्रामक होना होगा. तमिलनाडु में इस विचारधारा की जड़ें निकलती हैं ईवी रामासामी यानी पेरियार की राजनीति से और इसीलिए उनकी मूर्ति को निशाना बनाया गया.

लेकिन यहां भाजपा गलत नीति पर है. दरअसल क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं हर लोकतंत्र में पाई जाती हैं. यूरोप के छोटे-छोटे और कमोबेश एक भाषाई और जातीयता वाले देशों तक में यह हो रहा है. उनके मुकाबले भारत की विविधता बहुत विशाल है. यहां राजनीति लोकतांत्रिक समझौतों के रास्ते से ही आगे बढ़ सकती है. भाजपा को अगर पूरे भारत में स्वीकार्यता चाहिए तो वह इसके बिना नहीं होगा, लेकिन अगर वह अपनी पुरानी सोच पर अड़ी रही तो तमिलनाडु में पेरियार से और बाकी राज्यों में स्थानीय अस्मितावादी विचारधारा से उसका टकराव होता रहेगा.