निर्देशक : अलेया सेन

कलाकार : तापसी पन्नू, साकिब सलीम, सुप्रिया शुक्ला, निधि सिंह, सृष्टि श्रीवास्तव और अभिलाष थपलियाल

रेटिंग : 1.5/5

‘दिल जंगली’ के टाइटल में जंगली शब्द देखकर आपको सबसे पहले शम्मी कपूर के वादियां गुंजा देने वाले ‘याहू’ की याद आती है. फिल्म के थीम सॉन्ग में उनके ‘याहू’ का इस्तेमाल भी किया गया है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस फिल्म का शम्मी कपूर वाली जंगली से कोई लेना-देना है. बिल्कुल नहीं! दूर-दूर तक नहीं! शम्मी कपूर की फिल्म तो क्या यह उनकी ‘याहू’ की गूंज के आस-पास भी नहीं फटकती. इसे देखते हुए आप एक बार भी खुश होकर ऐसा कोई शब्द बोलें, इसकी कोई गुंजाइश फिल्म आपको देती ही नहीं है. बजाय इसके ट्रेलर और प्रमोशन से एक प्रॉमिसिंग कॉमेडी फिल्म लगने वाली ‘दिल जंगली’ सिल्वर स्क्रीन पर सिर्फ एक घिसी-पिटी लव स्टोरी ही नजर आती है.

यह फिल्म एक एंग्लो-इंडियन लड़की और दिल्ली के लड़के की प्रेम कहानी दिखाती है. यहां नायिका कोरोली एक बिजनेस टाइकून की रईस-खूबसूरत बेटी है और किताब लिखने के साथ-साथ जिंदगी से केवल प्यार पाने की चाह रखती है. इसके उलट नायक सुमित उप्पल, टिपिकल दिल्ली मुंडा है जो जिम ट्रेनर की जॉब करते हुए एक दिन बॉलीवुड का सुपरस्टार बनने के सपने देखता है. कोरोली का किरदार वास्तविकता से कोसों की दूरी बनाकर रखता है, वहीं सुमित जरूरत से ज्यादा प्रैक्टिकल होकर हर चीज में फायदा खोजने की सोचता है. चुंबक के साउथ और नॉर्थ पोल सरीखी एकदम उलट जिंदगी जीने वाले दो लोगों के स्वाभाविक आकर्षण के आसपास ही दिल जंगली अपनी कहानी ‘खोजती’ नजर आती है. लेकिन यह कहानी उसे आखिर तक नहीं मिलती और वह जंगल से बेतरतीब सीक्वेंस दिखाकर अपना नाम सार्थक करने की नाकामयाब कोशिश करती रह जाती है.

पहला हिस्सा खत्म होते ही कुछ समय के लिए ही सही, आपको लगता है कि फिल्म अब शऊर से बात करने वाली है. लेकिन कुल चार दृश्यों के बाद वह फिर से अपने नादान अंदाज पर लौट आती है. क्लीशेपन को ओढ़कर दिल्ली से लंडन पहुंची कहानी जब ‘नाचे तू दिल्ली, हिले है लंडन’ वाली तर्ज पर चलती है तो आपको फिर से पता नहीं चलता कि कहां पर क्या शुरू हो रहा है और क्या खत्म हो रहा है. इसके बावजूद फिल्म की चुटकी भर तारीफ इसलिए की जा सकती है कि बेहद कमजोर पटकथा होने के बावजूद जिंदगी में प्यार तलाशने वाली लड़कियों के लिए यह एक जरूरी संदेश दे जाती है. संदेश यह कि जब तक आप खुद अपनी कीमत नहीं समझेंगे, दूसरों से यह उम्मीद करना बेमानी है. लेकिन बुरा यह है कि फिल्म ऐसा कहने वाली है, इसका अंदाजा भी आपको पहले से लग जाता है. यहां पर मजे-मजे में यह कहा जा सकता है कि फिल्म अपने मनोरंजन से न सही लेकिन बार-बार ‘आपको तो सब पता है’ कहकर आपको खुश करने की कोशिश करती रहती है.

लगभग 124 मिनट लंबी यह फिल्म देखते हुए जो चीज आपको तिनके का सहारा देती है, वह है तापसी पन्नू और साकिब सलीम की बेहतरीन अदाकारी. ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ और ‘जाने तू या जाने ना’ वाले फ्लेवर की इस फिल्म में नायिका को पहले हिस्से में जहां खूबरसूरती के साथ-साथ ढेर सारे ‘क्यूटत्व’ की दरकार थी, वहीं दूसरे में स्टाइल और एटीट्यूड चाहिए था और तापसी ने अपने दोनों ही रूपों में क्या कमाल किया है. खासतौर पर पहले हिस्से में जब वे सपनों में जीने वाली लड़की बनती हैं तो बमुश्किल उन्नीस साल चार महीने की लगती हैं और अभिनय में हमेशा की तरह बीस साबित होती हैं.

साकिब सलीम को देखकर ऐसा लगता है कि दिल्ली की पैदाइश होने का सारा फायदा उन्होंने इसी फिल्म में उठा लिया है. उनका बेहद कॉन्फिडेंट और नैचुरल होना आपको उन्हें देखते रहने को मजबूर करता है. दिल जंगली की एक खामी यह भी है कि वह एक जैसे कई शॉट्स बार-बार दिखाती है, हालांकि यह चीज आपको साकिब की एक नई खूबी बता देती है कि वे एक ही चीज को कई तरह से दिखाने की क्षमता रखते हैं.

इनके अलावा फिल्म में सुप्रिया शुक्ला भी दसियों हजार से ज्यादा बार घिस चुके, परांठे खिलाने वाली मां के किरदार को ईमानदारी से निभाती हैं. यही शिकायत बाकी के किरदारों से भी आपको होती है कि वे यहां अपने ही कैरीकेचर लगने लगते हैं और जरूरत से ज्यादा लगते हैं. निधि सिंह, सृष्टि श्रीवास्तव और अभिलाष थपलियाल, इन तीनों के किरदार जरूरी होते हुए भी आपको बर्दाश्त नहीं होते, लेकिन इसमें इनकी कोई गलती नहीं है बल्कि ये किरदार लिखे ही इतने वाहियात तरीके से गए हैं.

आमतौर पर विज्ञापन की दुनिया से बॉलीवुड में आने वाले निर्देशकों से यह उम्मीद की जाती है कि वे एक बहुत प्रभावी न सही लेकिन क्रिस्प और आसानी से समझ आने वाली फिल्म आपके सामने रखेंगे. ऐसा माना जाता है कि वे किसी भी काम से ज्यादा अच्छे तरीके से एडिटिंग को समझते हैं. एक्स-एडफिल्म मेकर अलेया सेन की पहली फिल्म में यह बेसिक चीज ही मिसिंग है. फिल्म की एडिटिंग इतनी खराब है कि दर्शक किसी तरह कहानी का ओर-छोर पकड़ भी ले तो दो सीक्वेंस के बीच का कनेक्शन ढूंढ़ना उन्हें पहेलियां बूझने जैसा लग सकता है. इसके बावजूद फिल्म की छटांक भर तारीफ करने का मन इसलिए भी हो जाता है क्योंकि परीकथा का फील देने वाली सिनेमैटोग्राफी और पानी सा बहने वाला संगीत भी इसमें शामिल है. लेकिन आखिर में बुरी पटकथा, अपरिपक्व निर्देशन और संपादन फिल्म के अभिनय, फिल्मांकन और संगीत की अच्छाइयों पर भारी पड़ जाते हैं. इस तरह प्लस से ज्यादा माइनसेज़ होने के चलते इस दिल जंगली के इक्वेशन देखने वाले के साथ फिट नहीं बैठते और यह ऐसी फिल्म नहीं बन पाती जिसके बारे में हम सकें कि - जाइए और देखकर आइए!