आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने बीते बुधवार को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को बड़ा झटका दिया. उन्होंने ऐलान किया कि उनकी तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के दोनों मंत्री केंद्र सरकार से इस्तीफ़ा दे रहे हैं. और गुरुवार को उन्होंने ऐसा कर भी दिया. नायडू के मुताबिक यह फ़ैसला इसलिए किया गया कि आंध्र को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिए जाने की मांग केंद्र में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी ने नहीं मानी. हालांकि लोक सभा में 16 सदस्यों वाली टीडीपी ने अभी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) का साथ नहीं छोड़ा है. लेकिन इसकी संभावना से भी पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता. क्योंकि भाजपा ने भी ज़वाबी कार्रवाई करते हुए आंध्र सरकार से अपने दोनों मंत्री हटा लिए हैं.

वैसे नायडू के जाने से लोक सभा में मोदी सरकार या भाजपा को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला. और नायडू के ही क्या एनडीए के किसी भी घटक दल के साथ छोड़ देने से उसकी सेहत पर कोई असर नहीं होगा क्योंकि वह भाजपा के पास लोक सभा में अपने दम पर बहुमत है. यही वज़ह है कि नायडू की ओर से मोदी सरकार पर दबाव बनाने की हर कोशिश अब तक विफल साबित हुई है. यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) या उसकी पूर्ववर्ती मिली-जुली सरकारों में ऐसा नहीं होता था. वहां घटक दलों के दबाव और उनकी मांगाें के आगे अक्सर ही गठबंधन की मुख्य पार्टी को झुकना पड़ता था.

इसके बावज़ूद इसका मतलब यह नहीं है कि मोदी सरकार से टीडीपी के दूर होने का कोई सियासी नतीज़ा होगा ही नहीं. सवाल उठता है कि टीडीपी-भाजपा में बनी इस दूरी के क्या मायने हैं.

समस्या अलग तरह की

जैसा कि पहले जिक्र हुआ, टीडीपी आंध्र प्रदेश के लिए विशेष राज्य का दर्ज़ा मांग रही है. सो पहले तो यही समझने की कोशिश करते हैं कि विशेष राज्य के दर्ज़े का आख़िर चक्कर क्या है? यह अवधारणा सबसे पहले 1969 में सामने आई. उस वक़्त तत्कालीन वित्त आयोग ने कमजोर और ज़रूरतमंद राज्यों की अतिरिक्त वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्हें विशेष दर्ज़ा देने की सिफ़ारिश की. इसी सिफ़ारिश के आधार पर राष्ट्रीय विकास परिषद ने वे नियम-क़ायदे तय किए जिसके तहत किसी राज्य को विशेष दर्ज़ा दिया जा सकता था. इस तरह एक बार किसी राज्य को विशेष दर्ज़ा मिलते ही उसे केंद्र की ओर से अतिरिक्त वित्तीय मदद मिलनी शुरू हो जाती थी.

अब आती है बात आंध्र प्रदेश की. यह राज्य हालांकि विशेष दर्ज़ा दिए जाने के लिए पात्रता की तय शर्तें पूरी नहीं करता. ख़ास तौर पर विकास और वित्तीय स्थिति के पैमाने पर. इसके बाद भी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आंध्र के बंटवारे के वक़्त उसे पांच साल के लिए विशेष दर्ज़ा देने का वादा कर दिया. वह भी इस आधार पर कि आंध्र के लिए सबसे ज़्यादा राजस्व जुटाने वाला जिला- हैदराबाद नवगठित तेलंगाना का हिस्सा बन गया था. और फिर 2014 की चुनावी बेला में भाजपा मनमोहन सिंह भी एक क़दम आगे चली गई. उसने आंध्र को 10 साल के लिए विशेष दर्ज़ा देने का वादा कर दिया. यही वादा अब उसके लिए परेशानी बना हुआ है.

हालांकि सत्ता में आने के बाद भी भाजपा ने यह वादा पूरा नहीं किया. केंद्र की भाजपा सरकार इसमें 14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट की आड़ ले रही है. इस आयोग ने राज्यों को केंद्र से सीधे मिलने वाली वित्तीय मदद इतनी बढ़ा दी है कि विशेष दर्ज़ा प्राप्त और सामान्य राज्यों के बीच का फ़र्क़ अब लगभग बेमानी हो चुका है. साथ ही इसी आधार पर, जैसा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी बुधवार को मीडिया के सामने कहा था, वित्त आयोग ने विशेष राज्य के दर्ज़े की अवधारणा को ही ख़त्म करने की अनुशंसा की है.

लेकिन नायडू की दलील है कि उनके राज्य को अब तक उनमें से अधिकांश सुविधाएं नहीं मिलीं जिन्हें देने का वादा केंद्र सरकार ने प्रदेश विभाजन के समय किया था, मसलन आंध्र प्रदेश को अपनी नई राजधानी के निर्माण के लिए ही काफी अतिरिक्त पैसा चाहिए, उसके पास अपना अलग रेलवे ज़ाेन होना चाहिए आदि. इन तमाम मांगों पर जेटली ने नायडू को भरोसा दिया था कि केंद्र से उन्हें पूरी मदद दी जाएगी. उनका कहना था कि आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्ज़ा तो नहीं मिल सकता, लेकिन विशेष राज्यों को दी जाने वाली मदद और सुविधाएं मिल सकती हैं. लेकिन चंद्रबाबू नायूड का कहना था कि यह काफी नहीं है.

अपमान की राजनीति

मोदी सरकार से टीडीपी के मंत्रियों के इस्तीफ़े की घोषणा करते हुए नायडू ने इस बात पर ख़ास जोर दिया कि केंद्र सरकार उनके साथ कैसा व्यवहार कर रही है. उन्होंने दावा किया कि वे 29 बार दिल्ली गए. अपने मंत्रियों, सांसदों, अधिकारियों को भी दिल्ली भेजा. हर बार सभी ने केंद्र को उसके वादों की याद दिलाई, लेकिन केंद्र सरकार के कान में जूं नहीं रेंगी. उन्होंने यह भी बताया कि टीडीपी के मंत्रियों के इस्तीफ़े पर फ़ैसला लेने से पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करने की कोशिश की. लेकिन वे बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं हुए. हालांकि बाद में आई ख़बरों की मानें तो प्रधानमंत्री ने ख़ुद 20 मिनट तक नायडू से फोन पर बात की और उन्हें उनके फ़ैसले पर पुनर्विचार करने के लिए समझाया. लेकिन न तो चंद्रबाबू नायडू अपनी मांग से पीछे हटे और न नरेंद्र मोदी उनकी विशेष राज्य के दर्ज़े वाली मांग मानने को तैयार हुए.

वैसे देखा जाए तो नायड़ू जो कर रहे हैं वह ख़ास आंध्र मार्का राजनीति है जो उनके ससुर एनटी रामाराव से शुरू होती है. यह 80-90 के दशक की बात है. उस वक़्त फिल्मी करियर छोड़कर रामाराव राजनीति में उतरे थे. उन्होंने अपनी अलग पार्टी (टीडीपी) बनाई और शानदार तरीके से आंध्र की सत्ता पर काबिज़ हुए. राज्य की यह पहली ग़ैर-कांग्रेस सरकार जिस आधार पर बनी थी वह वही था जिस पर आज नायडू खड़े होने की कोशिश कर रहे है. यानी केंद्र द्वारा प्रदेश के लोगों के अपमान का मामला. यह एक भावनात्मक अपील है जिसे लेकर रामाराव की तरह नायडू भी लोगों तक पहुंच रहे हैं. इसके जरिए लोगों को वे समझा रहे हैं कि आंध्र को चार साल से विशेष राज्य का दर्ज़ा क्यों हासिल नहीं हुआ. उन्हें बता रहे हैं कि वे चार साल से लगातार इसकी कोशिश कर रहे हैं. लेकिन भाजपा उनकी सुन नहीं रही है.

एक चुनौती जगन की भी

चंद्रबाबू नायडू के इस आक्रामक रुख़ की एक वज़ह राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी वाइएसआर कांग्रेस के नेता जगनमोहन रेड्‌डी भी बताए जाते हैं. आंध्र में एक आम धारणा बन रही है कि प्रदेश में नायडू सरकार के ख़िलाफ़ सत्ताविरोधी रुझान तेजी से बढ़ रहा है. जगन इसका फ़ायदा उठाने की हर कोशिश कर रहे हैं और आंध्र को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिए जाने की मांग को भी उन्होंने ही सबसे ज़्यादा हवा दी है. इस तरह उन्होंने चंद्रबाबू नायडू को मुश्किल हालात में उलझा दिया है क्योंकि वह राज्य में तो सरकार चला ही रही है, केंद्र की सरकार में भी चार साल से शामिल रही है.

जगन की ओर से लोगों को यही समझाया जाता है कि वास्तव में टीडीपी ही नहीं चाहती कि आंध्र को विशेष राज्य का दर्ज़ा मिले, वरना केंद्र और राज्य की सरकार में रहते हुए वह चार साल में इतना तो कर ही सकती थी. सिर्फ़ इतना ही नहीं जगन बीते तीन महीने से राज्य का सघन दौरा कर रहे हैं और अपनी पार्टी का जनाधार लगातार बढ़ा रहे हैं. उन्होंने प्रशांत किशोर जैसे चुनाव रणनीतिकार की सेवाएं भी ले रखी हैं. साल 2014 का चुनाव भी नायडू को अच्छी तरह याद होगा ही. उस वक़्त जगन की पार्टी महज़ कुछेक प्रतिशत से ही टीडीपी से पीछे रह गई थी.

इस सबसे चंद्रबाबू नायडू की चिंताएं बढ़ना लाज़िमी है. राज्य विधानसभा चुनाव में अब एक-सवा साल का समय ही बचा है और नायडू इस वक़्त जगन मोहन को कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहते जिससे वे सियासी-चुनावी गुणा-गणित में उन पर भारी पड़ जाएं. इसी वज़ह से उन्हें भाजपा के साथ गठबंधन के मामले में सख़्त फ़ैसला लेना पड़ा. अब वे ‘आंध्र गौरव के रक्षक’ के तौर पर ख़ुद को लोगों के सामने पेश करने की स्थिति में हैं. इसकी उन्होंने कोशिश भी शुरू कर दी है. उनकी यह कोशिश आगे क्या रंग दिखाती है यह आने वाले वक़्त में सामने आता ही जाएगा. शुरूआत हो चुकी है.