निर्देशक : अर्जुन मुखर्जी

लेखक : ऐल्थिया डेलमस कौशल, अन्विता दत्त

कलाकार : रेणुका शहाणे, पुलकित सम्राट, मासूमी, शरमन जोशी, ऋचा चड्ढा, अंकित राठी, आयशा अहमद

रेटिंग : 3/5

सब आपसे कहेंगे कि ‘3 स्टोरीज’ की हर कहानी में कुछ ट्विस्ट हैं जिनके भरोसे ही यह फिल्म टिकी हुई है. गलत. निर्माताओं ने इसे कैसे बेचा है और लोगों ने क्या समझकर खरीदा है इसपर तो किसी का जोर नहीं है, लेकिन ‘3 स्टोरीज’ असलियत में एहतियात से रचा गया मानवीय ड्रामा है. इसमें इन ट्विस्ट के होने से इतना होता है कि रोचकता की कमी नहीं रहती. दिलचस्पी रुसवा नहीं होती. बाकी सुघड़ निर्देशन की वजह से ही आपको किरदारों की जिंदगी में खोने का मौका बहुत सारा मिलता है, और अगर धीमी गति की ड्रामा फिल्में आपको पसंद आती हैं – जिनमें हर क्षण कुछ कमाल घटे ये जरूरी नहीं – तो इस छोटी-सी फिल्म को एक अवसर देकर देखिए.

आपको लगेगा कि तीन माले वाली एक चॉल में रहने वाले कुछ लोगों की जिंदगी को आप पास वाली अट्टालिका से दूरबीन लगाकर एकदम नजदीक से देख पा रहे हैं.

फिल्म अपने परिवेश को भी इतनी सुघड़ता से रचती है कि किताबी कहानियों सी लगने के बावजूद इन कहानियों की सच्चाई पर आपको विश्वास हो ही जाता है. तीन मुख्तलिफ कहानियों को आपस में थोड़ा-थोड़ा गूंथकर यह फिल्म बनी है. इसमें एक कहानी ईसाई महिला रेणुका शहाणे की है, जो कि अपनी ग्राउंड फ्लोर वाली ‘खोली’ बेचना चाहती है और माचिस की डिब्बियों में भरे हीरों से भी उसका एक कनेक्शन है. दूसरी कहानी उस महिला (मौसमी) की है जो अपने वर्तमान वैवाहिक जीवन से परेशान है और दारू का एक घूंट भर जिसे तपाक से अपने खूबसूरत भूतकाल के पास (शरमन जोशी) पहुंचा देता है. तीसरी एक हिंदू लड़की और मुसलमान लड़के के प्यार की कहानी है (अंकित व आयशा) और इन तीनों में से सबसे जोरदार जो कहानी है, वो आप खुद फिल्म देखकर जानें. हम क्यों आपका मजा खराब करें!

एक इमारत में पली-बढ़ी इन तीनों कहानियों की सूत्रधार ऋचा चड्ढा हैं और बिंदास महिला के बेहद छोटे-से उनके रोल को फिल्म एक वक्त पर आकर पूरी तरह जस्टीफाई भी करती है. जिंदगी कुछ नहीं कहानियों की गठरी है, इस बात को बहुत गाढ़ापन देकर रेखांकित करती है और इससे एक नए तरह का अंत पैदा होता है जो बहुत मुमकिन है कि कईयों को नापसंद होगा, लेकिन कुछ को उसकी प्रयोगधर्मिता में ही मजा आएगा.

अलग-अलग लघु कहानियों को समेटकर फीचर फिल्म बनाने की कला काफी समय से विश्वभर में प्रसिद्ध रही है. इन्हें अंग्रेजी में एन्थोलॉजी फिल्म कहा जाता है. ‘दस कहानियां’ जैसी फिल्मों के अलावा प्रयोग होने की संभावनाओं से भरे इस जॉनर को मणिरत्नम ने ‘युवा’ में बखूबी उपयोग किया था और अगर आप इस जॉनर की चर्चित विदेशी फिल्मों से इतर एक बेहद कल्पनाशील व विचित्र व बेहतरीन एन्थोलॉजी फिल्म देखना चाहें तो अर्जेंटीना मूल की ‘वाइल्ड टेल्स’ (2014) देखिएगा. बाद में धन्यवाद भी मत दीजिएगा! क्योंकि यह तो हमारा फर्ज है, अच्छे सिनेमा और आपको एक-दूसरे से रूबरू करवाना.

खैर, इस जॉनर की अनेक फिल्मों की ही तरह ‘3 स्टोरीज’ की कहानियों का भी आपस में कम ही लेना-देना है, लेकिन काफी सारे किरदार तीनों कहानियों में विचरण करते रहते हैं. बिना किसी घटनाक्रम को प्रभावित किए रेणुका शहाणे अपनी कहानी शुरुआत में ही पूरी करने के बावजूद दूसरी कहानियों से जुड़ी रहती हैं और कुछ सह-कलाकार शुरू से फिल्म के साथ होते हैं लेकिन आखिर में ही उनके असली चेहरे नजर आ पाते हैं.

फिल्म में ऋचा चड्ढा के प्यार में गिरफ्तार पुलिसवाले के रोल में हिमांशु मलिक भी हैं, जो आपको शायद याद न हो कि एक वक्त में ‘तुम बिन’ (2001) के हीरो हुआ करते थे और चुंबनों के लिए प्रसिद्ध हुई मल्लिका शेरावत की फिल्म ‘ख्वाहिश’ (2003) में भी उनके अपोजिट थे. अब उनका वजन काफी बढ़ चुका है, पहचानना तकरीबन नामुमकिन है, लेकिन इस संजीदा फिल्म को उनका यह नया रूप कायदे का ह्यूमर देता है.

दूसरी कहानी में भूतपूर्व प्रेमी बने शरमन जोशी छोटी लेकिन प्रभावी भूमिका में हैं, और एक बार फिर एक ऐसी फिल्म में हैं जिसमें उन्हें सराहकर सभी कहेंगे –‘यार बॉलीवुड न, इस बंदे के टैलेंट से अभी भी न्याय नहीं कर पा रहा.’ 13-14 साल पहले ‘मकबूल’ में आकर याद रहीं मासूमी मखीजा, शरमन की प्रेमिका बनी हैं और इतने लंबे अरसे बाद उन्हें परदे पर देखकर अच्छा लगता है. बस कि संवाद अदायगी सीखने में थोड़ी और मेहनत इतने सालों में कर ली होती तो उनकी तारीफ सिर्फ स्क्रीन पर साड़ी में खूबसूरत दिखने और सीन के हिसाब सटीक एक्सप्रेशन देने भर के लिए नहीं होती.

इन सबसे इतर, दशकों बाद किसी हिंदी फिल्म में नजर आईं रेणुका शहाणे ने फिल्म में सबसे ज्यादा दिलचस्प अभिनय किया है. उनकी कहानी भी इतनी रोचक है कि उनका अजीब किरदार उसमें सटीक बैठता है और दिखता है कि मेकअप, प्रोस्थेटिक व नकली पेट की सहायता लेकर उसे सबसे अलग बनाना सिर्फ दर्शकों की वाहवाही लूटने के लिए नहीं किया गया. अपनी चाल में, उदासी व्यक्त करने के अंदाज में, कोंकणी हिंदी बोलने के दौरान और खासतौर पर कॉफी पिलाने के वक्त- रेणुका शहाणे किरदार को पूरी तरह आत्मसात करती हैं.

अरे हां! इसी कहानी में रेणुका शहाणे के अपोजिट पुलकित सम्राट भी हैं, जिनके अभिनय व चाल-ढाल में से ‘सलमान खान हैंगओवर’ को इस बार भाई की भाभी भी नहीं निकाल पाई हैं (संदर्भ - हम आपके हैं कौन!).

फिल्म की कुछ न छिपने वाली कमियों में से एक यह है कि एक के मुकाबले बाकी दो कहानियों का रहस्योद्घाटन तीव्रता से आकर आपके मुख पर चोट नहीं कर पाता. वो किसी ड्रामा फिल्म की तरह धीरे-धीरे खुलता है और कहानियों में आए इस टोनल शिफ्ट की वजह से कुछ दर्शकों को निराशा हो सकती है. आखिरी हिस्से में आकर फिल्म अपनी कहानियों को जल्दी-जल्दी समेटने भी लगती है. कुछ सब-प्लॉट्स छूट जाते हैं, तो कुछ किरदारों पर वापस जाकर फिल्म बात ही नहीं करती और हमेशा ही, बढ़िया फिल्में देखकर जो तृप्ति मिला करती है (जैसे बढ़िया भोजन से मिलती है!) वह तृप्ति ‘3 स्टोरीज’ के अंत में उम्मीद से थोड़ी कम मिलती है.

लेकिन,‘3 स्टोरीज’ को अगर आप वह पतली-सी किताब मान कर चलें, जिसे आपने बस यूं ही दो-चार पन्ने पलटने के लिए कभी उठा लिय़ा था, लेकिन जिसकी छोटी-छोटी लघु कहानियों ने आपको तफ्सील से कुछ जिंदगियों से मिलवाने का आनंद देने के अलावा कुछ रोचक प्रसंग भी पढ़ाए थे और न भूलने वाले ट्विस्ट भी अक्षरों में छिपाए थे. तो आपको ‘3 स्टोरीज’ बेहतर फिल्म जान पड़ेगी.

क्योंकि सचमुच, कुछ कहानियां परदे पर ऐसे चलती हैं जैसे आप कोई पठनीय किताब पढ़ रहे हों.