राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में इन दिनों कुछ बेचैनी है. यह बेचैनी सह-सरकार्यवाह (संयुक्त महामंत्री) दत्तात्रेय होसबोले को लेकर है. ख़बर है कि नौ से 11 मार्च के बीच नागपुर में हो रही अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (एबीपीएस) की बैठक में उन्हें सरकार्यवाह का पद सौंपा जा सकता है. एबीपीएस संघ में निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है. एबीपीएस की बैठक में संघ के तमाम अनुषांगिक संगठनों के 1,500 से ज़्यादा प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं.

इस मसले आगे कुछ बात करने से पहले संघ के सांगठनिक ढांचे से जुड़ी कुछ मूलभूत चीजें जान लेते हैं. संघ में सबसे बड़ा पद सरसंघचालक का होता है. यह पद वर्तमान में मोहन भागवत के पास है. लेकिन चूंकि सरसंघचालक को आरएसएस के संविधान के हिसाब से मार्गदर्शक-पथप्रदर्शक का दर्ज़ा मिला है इसलिए वे संघ की रोजमर्रा की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका नहीं निभाते. ऐसे में उनके मार्गदर्शन में संघ का पूरा कामकाज सरकार्यवाह (महामंत्री) और उनके साथ चार सह-सरकार्यवाह (संयुक्त महामंत्री) ही देखते हैं.

चूंकि सरकार्यवाह इस पांच सदस्यीय टीम के मुखिया होते हैं. इसलिए संघ में उनके रुतबे का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है. फिर भी और आसानी से समझें तो कॉरपोरेट संस्कृति के हिसाब से कहा जा सकता है कि सरकार्यवाह असल में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) जैसे होते हैं. जिन पर किसी कंपनी या संगठन के कार्यसंचालन की असल ज़िम्मेदारी होती है. इस पद की ये अहमियत ही वह बड़ा कारण भी है जिसके चलते संघ ने अब तक अपने इतिहास में आरएसएस की मौलिक पृष्ठभूमि से आने वाले स्वयंसेवक को ही हमेशा यह जिम्मा सौंपा है.

और यही दत्तात्रेय होसबोले को लेकर संघ में कसमसा रही चिंता की वज़ह भी है. क्योंकि कर्नाटक से ताल्लुक़ रखने वाले वाले 63 वर्षीय होसबोले ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत आरएसएस से नहीं की थी. बल्कि वे संघ प्रचारक बनने से पहले ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) में सक्रिय थे. यानी भारतीय जनता पार्टी छात्र इकाई (एबीवीपी) में राजनीति करते थे. यही नहीं, वे एबीवीपी में ही आरएसएस की तरफ से दो दशक तक संगठन महामंत्री भी रहे हैं. इसके बाद उन्होंने पूरी तरह अपने आप को आरएसएस की गतिविधियों में लगाया है.

चिंता की दूसरी बड़ी वज़ह नरेंद्र मोदी और राजनीति से नज़दीकी भी

होसबोले को लेकर संघ के एक वर्ग में चिंता की दूसरी वज़ह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी निकटता भी है. बल्कि उन्हें संघ में प्रधानमंत्री का मोदी का सबसे बड़ा समर्थक तक कहा जाने लगा है. और इसका पर्याप्त आधार भी है. मसलन- एक तथ्य तो यही कि अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर होसबोले की संघ में तरक्की का ग्राफ कमोबेश उन्हीं बीते चार साल में बढ़ा जब भाजपा में नरेंद्र मोदी की पकड़ मज़बूत हुई. बीते साल उत्तर प्रदेश चुनाव में तो आलम यह रहा कि होसबोले पटना से बोरिया-बिस्तर समेटकर लखनऊ में आ जमे थे. यहां उन्होंने भाजपा के चुनाव प्रबंधन के लगभग हर पहलू में अहम भूमिका निभाई. उम्मीदवारों की पहचान से लेकर मतदान केंद्र प्रबंधन, ज़मीनी सर्वे और मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचाने की हर रणनीति में उनका दखल रहा.

यही वज़ह है कि संघ के एक बड़ा वर्ग का मानना है कि उन्हें सरकार्यवाह बनवाकर प्रधानमंत्री मोदी आरएसएस पर भी अपनी पकड़ मज़बूत करना चाहते हैं. इस वर्ग में यह धारणा भी बन रही है कि होसबोले सरकार्यवाह बनते हैं तो आरएसएस पर प्रधानमंत्री मोदी का समर्थक तबका हावी हो जाएगा. और भाजपा के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में संघ कमजोर पड़ने लगेगा. संभवत: इसीलिए केंद्र में मोदी सरकार बनने के क़रीब 10 महीने बाद मार्च-2015 ऐसी ही बैठक के दौरान होसबोले को सरकार्यवाह का पद दिए जाने का प्रयास इस वर्ग ने विफल कर दिया था.

उस वक्त 2009 से यह पद संभाल रहे सुरेश राव जोशी (भैयाजी) को ही तीन साल का एक और कार्यकाल दिए जाने पर ही सहमति बन सकी थी. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बीते अक्टूबर में संघ के केंद्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक हुई थी. उस दौरान भी होसबोले को सरकार्यवाह की ज़िम्मेदारी दिए जाने के प्रयासों ने जोर पकड़ा था. लेकिन तब भी संघ के भीतर से ही ये प्रयास नाक़ामयाब कर दिए गए.

लेकिन अब दिक़्क़त यह है कि मौज़ूदा सरकार्यवाह जोशी का स्वास्थ्य दो साल से उनका साथ नहीं दे रहा है. हालांकि उनका समर्थक तबके के एक सूत्र का कहना है, ‘उनके स्वास्थ्य में अब सुधार हो रहा है. उनके घुटनों का प्रत्यारोपण हो चुका है. उन्होंने 25-30 किलो वजन भी कम किया है और अपनी आधिकारिक ज़िम्मेदारियों का निर्वाह भी फिर से करने लगे हैं.’ जोशी के समर्थकों की दलील यह भी है कि वे मूल रूप से संघ से उपजे और उसमें पले-बढ़े स्वयंसेवक हैं, पूरी तरह संघ की धारा में काम करते हैं, संगठन के आदमी हैं और राजनीति में भी ज़्यादा दिलचस्पी नहीं लेते. लिहाज़ा सरकार्यवाह जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पद की ज़िम्मेदारी उन तक ही रहनी चाहिए.

मगर भाजपा और मोदी के बढ़ते असर से संघ अछूता कैसे रह पाएगा?

हालांकि भाजपा और मोदी का बढ़ता असर पूरे देश में दिख रहा है. त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य में वाम दलों का बड़ा किला इसी असर ने उखाड़ दिया. मेघालय और नगालैंड में इसी असर ने भाजपा को सत्ता तक पहुंचा दिया. इसके साथ असम सहित पूर्वोत्तर के आठ में सात राज्यों में भाजपा का परचम फहराने लगा है. देश के बाकी राज्यों की कहानी भी यही है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि संघ इस असर से अछूता रह पाता है, या फ़िर होसबोले की तरक्क़ी के साथ वह भी ‘मोदीमय’ होता है.