कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए इन दिनों सियासी सरगर्मियां तेज हैं. भाजपा कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार को घेरने की कवायद में जुटी है तो सिद्धारमैया भी भाजपा पर लगातार हमले कर रहे हैं. इस बीच, भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने रविवार को 72 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है. इसमें भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बीएस येद्दियुरप्पा का नाम भी है जो शिकारीपुरा सीट से चुनाव लड़ेंगे.

येद्दियुरप्पा इसी वर्ष 75 साल के हुए हैं. फरवरी में उनके जन्मदिन के मौके पर आयोजित जनसभा में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की थी. उन्होंने कहा था कि अगर सरकार बनी तो येद्दियुरप्पा मुख्यमंत्री होंगे. इसके बाद से भाजपा में इस सवाल पर बहस चल रही है कि क्या 75 साल की उम्र सीमा का अब पार्टी में कोई मतलब नहीं रह गया है. इस बहस के अलग-अलग पहलुओं को समझने से पहले 75 साल की उम्र सीमा से संबंधित कुछ बुनियादी बातों को जान लेना जरूरी है.

जून 2013 में नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया था. उसी साल सितंबर में उन्हें भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया. इसके बाद भाजपा के अंदर जैसे-जैसे नरेंद्र मोदी का कद बढ़ने लगा, वैसे-वैसे पार्टी के अंदर मोदी और उनके समर्थकों ने इस धारणा को मजबूत किया कि पार्टी और सरकार में सेवानिवृत्ति की अघोषित उम्र सीमा 75 साल होनी चाहिए. मई, 2014 में जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा लोकसभा चुनाव जीत गई तो सरकार के गठन से पहले यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया कि 75 से अधिक उम्र के किसी भी नेता को सरकार में शामिल नहीं किया जाएगा.

अब तक जिन राज्यों में भी भाजपा ने कांग्रेस को पटखनी दी है, वहां कांग्रेस के पास स्थानीय स्तर पर कोई मजबूत नेतृत्व नहीं रहा है. लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के पास सिद्धारमैया के रूप में मजबूत चेहरा है  

75 साल का जो कट ऑफ चुनाव लड़ने के वक्त रखने की कोशिश हुई और जिसे सरकार गठन के वक्त लागू किया गया था, उसके बारे में राजनीतिक जानकार स्पष्ट तौर पर मानते हैं कि मोदी और उनके सहयोगियों ने यह फॉर्मूला सीधे तौर पर लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को रोकने के मकसद से तैयार किया था. वैसे आडवाणी के बारे में तो माना ही जा रहा था कि वे नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार में कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे लेकिन मुरली मनोहर जोशी के बारे में यही बात पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती थी. कई लोगों को लगता था कि अगर जोशी को मानव संसाधन या और कोई प्रमुख मंत्रालय देने की पेशकश की जाएगी तो संभवत: वे इसके लिए मना नहीं करेंगे. ऐसे में यदि जोशी को भी रोकना था तो 75 साल की उम्र सीमा तय करने वाला फॉर्मूला उस वक्त बेहद काम का था.

जानकारों के मुताबिक उस फॉर्मूले का जो राजनीतिक मकसद था, वह पूरा हो गया है. आडवाणी और जोशी की इस दौरान न सिर्फ सियासी हैसियत घटी है बल्कि पार्टी के अंदर भी इनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं हैं. दोनों उस मार्गदर्शक मंडल के सदस्य हैं, जिसके मार्गदर्शन की जरूरत अभी की भाजपा को चलाने वाले नेता समझते ही नहीं हैं. कहा जा सकता है कि दोनों में से कोई या दोनों मिलकर भी ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि भाजपा के मौजूदा नेतृत्व के लिए कोई चुनौती पेश कर सकें. कभी पार्टी के अंदर दो धुर विरोधी खेमों का नेतृत्व करने वाले आडवाणी और जोशी के पास आज पार्टी में कोई खेमा ही नहीं है.

बाद में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा भी इसी नियम के शिकार हुए. गुजरात की राजनीति में अमित शाह की प्रतिद्वंदी मानी जाने वाली आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा भी इसी नियम की वजह से देना पड़ा. मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे नजमा हेपतुल्ला और कलराज मिश्र को भी इसी नियम की वजह से मंत्री पद छोड़ना पड़ा.

ऐसे में सवाल उठता है कि फिर येद्दियुरप्पा के मामले में पार्टी इस नियम को लागू करने में खुद को अक्षम क्यों पा रही है. दरअसल, येद्दियुरप्पा के मामले में अगर नरेंद्र मोदी और अमित शाह इस उम्र सीमा को लागू करने की कोशिश करते तो इसके कई जोखिम होते. सबसे पहला संकट तो यही है कि अब तक जिन राज्यों में भी भाजपा ने कांग्रेस को पटखनी दी है, वहां कांग्रेस के पास स्थानीय स्तर पर कोई मजबूत नेतृत्व नहीं रहा है. लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के पास सिद्धारमैया के रूप में मजबूत चेहरा है. वे राज्य के मुख्यमंत्री भी हैं और उनके कद का कोई नेता भाजपा में येद्दियुरप्पा के अलावा कोई और नहीं है. ऐसे में अगर भाजपा बगैर किसी मुख्यमंत्री उम्मीदवार के चुनावों में जाती तो सिद्धारमैया का चेहरा सामने होने की वजह से कांग्रेस को फायदा मिल सकता था.

2008 में कर्नाटक में बीएस येद्दियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा ने कर्नाटक में सरकार बनाई थी. उस जीत का पूरा श्रेय पार्टी येद्दियुरप्पा को देती है   

लेकिन इससे भी बड़ा संकट भाजपा के लिए आंतरिक है. पहली बार दक्षिण भारत में कर्नाटक में ही कमल खिला था. 2008 में कर्नाटक में बीएस येद्दियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा ने कर्नाटक में सरकार बनाई थी. उस जीत का पूरा श्रेय पार्टी येद्दियुरप्पा को देती है क्योंकि उस दौर की भाजपा के पास न तो अटल बिहारी वाजपेयी थी और न ही नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय स्तर पर उभार हुआ था. लाल कृष्ण आडवाणी की अपील सीमित थी. 2008 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में भाजपा की ओर से शामिल नेता यह मानते हैं कि उस पूरे चुनाव को येद्दियुरप्पा अपने कंधों पर लेकर चले और पार्टी को जीत दिलाई.

पार्टी के अंदर के ही लोग मानते हैं कि येद्दियुरप्पा मुख्यमंत्री भले ही बन गए, लेकिन कर्नाटक भाजपा में खेमेबाजी चलती रही. इसमें एक खेमे का नेतृत्व अभी मोदी सरकार में मंत्री अनंत कुमार करते रहे. बीच में येद्दियुरप्पा पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे और उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा. इसके बाद भाजपा ने कर्नाटक में येद्दियुरप्पा की टक्कर का विकल्प विकसित करने की कोशिश की, लेकिन कुछ हो नहीं पाया.

इस बीच भाजपा से येद्दियुरप्पा की नाराजगी बढ़ती गई. उस वक्त येद्दियुरप्पा के कद का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज मोदी सरकार में बहुत ताकतवर मंत्री की पहचान रखने वाले धर्मेंद्र प्रधान को जब भाजपा ने नाराज येद्दियुरप्पा से बात करने भेजा तो उन्होंने यह कहकर प्रधान से मिलने से इनकार कर दिया कि इतने जूनियर नेता से वे बात नहीं करेंगे.

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस सबके बावजूद न तो इसके खतरों को उस वक्त आडवाणी समझ पाए और न ही उस वक्त के पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी. इसका नतीजा यह हुआ कि येद्दियुरप्पा ने भाजपा से अलग होकर अपनी नई पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष बना ली और 2013 का विधानसभा चुनाव अलग होकर लड़े. इस पार्टी के जरिए येद्दियुरप्पा ने 2013 के चुनावों में यह सुनिश्चित कर दिया कि उनकी पार्टी भले न जीते, लेकिन भाजपा भी कर्नाटक में सरकार न बना पाए.

इसके बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को येद्दियुरप्पा की राजनैतिक हैसियत और उनकी उपयोगिता का अहसास हुआ. 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले नरेंद्र मोदी उन्हें वापस भाजपा में लेकर आए. लोकसभा चुनाव जीतने के बावजूद येद्दियुरप्पा ने केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने का प्रस्ताव ठुकरा दिया. पार्टी में उनके एक करीबी सांसद बताते हैं, ‘उन्होंने वापस आने के बाद पहले दिन से स्पष्ट कर दिया था कि उनका लक्ष्य कर्नाटक में भाजपा सरकार बनवाना है. इसलिए वे केंद्र में मंत्री बनने के लोभ में नहीं पड़े और लगातार कर्नाटक में सक्रिय रहे. अगर इसके बावजूद नरेंद्र मोदी, अमित शाह या पार्टी में कोई और कर्नाटक चुनावों से पहले उनके 75 साल की उम्र को मुद्दा बनाता तो आपको क्या लगता है कि वे चुपचाप बैठे रहते! वे अलग पार्टी बनाते और 2013 की घटना कर्नाटक में फिर से 2018 में दोहरा देते.’

यही वह जोखिम है जिसे 75 साल में सेवानिवृत्ति का नियम बनाने वाले नरेंद्र मोदी नहीं उठाना चाहते. क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों में मिली सफलता के बाद उनकी और अमित शाह की बातों से बिल्कुल स्पष्ट है कि ये दोनों हर हाल में कर्नाटक में जीतना चाहते हैं. मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में पूरे विपक्ष की एक ही उम्मीद है और वह है कर्नाटक. अगर यहां कांग्रेस हारती है तो फिर 2019 के लोकसभा चुनावों के लिहाज से नरेंद्र मोदी और भाजपा की दावेदारी और मजबूत हो जाएगी और विपक्ष के लिए मजबूती से चुनाव अभियान खड़ा कर पाना मुश्किल होगा.