जिस तरह के ध्रुवीकरण के माहौल में हम रहने को मजबूर कर दिए गए हैं, उसमें आप एक पक्ष में ही हो सकते हैं: बीच की जगह सिकुड़ गई है. सारी दृष्टियों को दो व्यापक समूहों में बांटना उनकी अपार बहुलता का सरलीकरण तो है ही, बहुत सारी दृष्टियों की स्वतंत्रता से इनकार भी. पर हमारे अधिकतर लोकतंत्र में यह होता रहा है और इस समय बहुत तीखा हो गया है. अगर स्वयं लोकतंत्र में सक्रिय शक्तियां, चाहे राजनैतिक, चाहे बौद्धिक, इस तरह के ध्रुवीकरण को बढ़ावा दें या पोसें तो इसे एक बड़ी विकृति ही कहा जा सकता है. हर वृत्ति को एक युग्म की तरह बरतना-देखना एक तरह की तानाशाही भी है. वह उस सीमेटिक द्वैत का ही एक संस्करण है जो मानता है कि ‘जो मेरे साथ नहीं है वह मेरा दुश्मन है.’

बहुत सारे लोग, जो राजनीति में सक्रिय नहीं होते पर उससे लगातार प्रभावित और अक्सर त्रस्त होते हैं, और किसी राजनैतिक मुद्दे पर अपना कोई मत या अवधारणा व्यक्त करते हैं तो वे ऐसा कर राजनीति में अपात्र हस्तक्षेप करने से अधिक उसका लोकतांत्रिक विस्तार कर रहे होते हैं. राजनेता ऐसे लोगों से अक्सर चिढ़ते हैं. इसलिए उन्हें अपने पक्ष या विपक्ष में होने की बेहद सरलीकृत स्थिति में घटाते हैं. सौभाग्य से लोग इतने बेवक़ूफ़ नहीं होते जितना कि अधिकतर राजनेता उन्हें मानते या बनाना चाहते हैं. एक तरह का लोकविवेक हमेशा सक्रिय और काफ़ी हद तक सजग रहता है. यह विवेक चुनाव जीते या हारे, बिना पक्षपात के बना रहता है. ऐसे मुकाम आते हैं जब यह लोकविवेक राजनीति को चलाता है और ऐसे भी जब वह राजनीति से दूर चला जाता है.

इन दिनों कई बार लगता है कि लोकविवेक थोड़ा अलसा-भरमा गया है: उसे सुलाने या भटकाने की एक मुहिम ही चली हुई है. वह झांसे में आता लगता है. फिर भी, बीच-बीच में ऐसा कुछ घटता है जिससे वह स्पष्ट नज़र आता है कि वह है और अवसर आने पर प्रगट हो जाता है. सब कुछ को दो टूक बांटने के समय में यह विवेक, ज़ाहिर है, कि कभी इधर झुका दिखेगा और कभी उधर. यह अवसरवादिता नहीं बल्कि गुण-दोष के आधार पर अपना मार्ग तय करना है. विवेक इसका ध्यान नहीं रखता कि उसे इस पक्ष में माना जाएगा कि उस पक्ष में.

लोकविवेक कई बार अबूझ लग सकता है. उसके ऐसा लगने के पीछे वह वस्तुस्थिति है जो पहले की अपेक्षा कहीं ज्‍़यादा उलझी हुई है. पुराने रूढ़ द्वैत या वैचारिक विश्लेषण इस वस्तुस्थिति को समझने के लिए नाकाफ़ी साबित हो रहे हैं, भले ही हमारी उनसे प्रतिबद्धता और लगाव हमें इस तथ्य को देखने-मानने से रोक रहे हैं. वस्तुस्थिति तो कई नई अप्रत्याशित जटिलताएं लिए हुए है, लेकिन हमारे उसे समझने और उसका विश्लेषण करने के औज़ार पुराने हैं और वे लगातार विफल हो रहे हैं- कम से कम अपर्याप्त तो.

जो बौद्धिक और नैतिक ऊहापोह इस समय है उसे आसानी से अनदेखा-अनसुना नहीं किया जा सकता. उसकी जटिलता को स्वीकार कर उसके लिए कुछ नई अवधारणाएं और औज़ारों का ईजाद किए बिना और कोई चारा नहीं. पर ऐसा हो रहा है इसकी आश्वस्ति नहीं.

बेसुबूत सच

एक सार्वजनिक बातचीत में कथाकार-बुद्धिजीवी अरुन्धति राय ने पते की एक बात यह कही कि सुर को अपने सच होने का कोई सुबूत नहीं देना पड़ता: जब सच्चा सुर लगता है तो सभी समझ जाते हैं कि सच्चा सुर लगा है. उन्हें लगता है कि इसी तरह गल्प (कहानी) को अपनी सच्चाई स्वयं अर्जित करना चाहिए: उसकी सच्चाई को बाहर के किसी प्रमाण की दरकार नहीं. यह एक ऐसा लेखक कह रहा है जो अपने विचारों में लगभग अतिवाम रहा है और जिसने सत्ता-प्रतिष्ठान-समाज-राजनीति-आर्थिक व्यवस्था के बारे में लगातार बेहद तीख़े सवाल उठाए हैं. इसके बरक्स साहित्य के बारे में जिन अवधारणाओं का इन दिनों हमारे यहां वर्चस्व है उनमें साहित्य से बराबर यह अपेक्षा है कि वह अपने से बाहर से अपना सत्यापन कराए. इसका आशय प्रायः यह भी रहा है कि साहित्य का अपना सच पर- निर्भर सच ही है. सुर की सच्चाई पर अरुन्धति इस बातचीत में कई बार लौटीं. साहित्य की सच्चाई पर यह आग्रह, कम से कम मुझे, उसकी स्वायत्तता का सहज स्वीकार लगा.

अरुन्धति ने अपने नए उपन्यास के अगले महीने प्रकाशित होनेवाले हिन्दी और उर्दू अनुवाद के सिलसिले में यह ज़िक्र किया कि हमारी भाषाओं में कई पौधों और फूलों के नाम नहीं हैं और अक्सर ये नाम विदेशियों ने रखे हैं जिनसे हम काम चलाते हैं. इसका एक कारण तो यह रहा होगा कि बहुत सारे पौधे और फूल यहां विदेशी लाए हैं और हो सकता है सभी के देसी नाम विकसित नहीं हो पाए. लेकिन हमारे यहां नामों की कमी है यह सही नहीं लगता. याद आता है कि हिन्दी के लगभग आख़िरी बड़े प्रकृति-कवि अज्ञेय के यहां ऐसे अनेक नाम हैं जो प्रचलित न हों पर भाषा में हैं और उनमें से बहुतों का उन्होंने अपनी कविता और गद्य में इस्तेमाल किया है.

इसी सन्दर्भ में मुझे बिहार के एक अपेक्षाकृत अल्पज्ञात कवि इक़बाल बहादुर सिंह राकेश की एक कविता याद आती है जिसमें न जाने कितने पक्षियों के नाम हैं जो मैंने कभी उससे पहले जाने-पढ़े ही नहीं थे. मुझे यह भी याद आता है कि 1958 में जब अज्ञेय पहली बार हमारे न्योते पर सागर विश्वविद्यालय छात्र संघ का उद्घाटन करने सागर आए थे तो उनसे मैंने और मेरे अभिन्न सखा रमेशदत्त दुबे ने पहली बार सागर कैंटोनमैंट में सड़कों के दोनों ओर लगे ऊंचे वृक्षों को आकाशनीम के वृक्ष हैं ऐसा जाना था. संस्कृत काव्य, प्राकृत की कविता और रीति काव्य में फूलों-पौधों के अपार नामोल्लेख हैं. हिन्दी में ऐसे कई नाम पड़ोसी भाषाओं से भी आए हैं. समाजचिन्तक शिव विश्वनाथन का एक लेख छपा है जिसमें बताया गया है कि भारत में धान की एक लाख चालीस हज़ार क़िस्में हैं. उनमें हरेक का कोई न कोई स्थानीय नाम ज़रूर होगा. धान के ऐसे कई नाम मैंने छत्तीसगढ़ में दशकों पहले पहली बार जाने थे. इसलिए हम पौधों-फूलों के नाम देने में कुछ पिछड़ गए हों यह बात ठीक नहीं लगती.

यों याद तो यह भी किया जा सकता है कि नाम की हमारी संस्कृति की अनेक परम्पराओं में बड़ी महिमा रही है: यहां तक कि ‘राम ते अधिक राम कर नामा’.

हिन्दुस्तान के काबे में ग़ालिब

महाकवि ग़ालिब रहे तो बनारस कुछ दो महीने, पर इतना रम गए कि उन्होंने फ़ारसी में उस पर 108 अशआर की एक मसनवी ‘चराग़-ए-दैर’ लिख डाली. इसमें उन्होंने काशी में ‘बेशक’ ‘हिन्दुस्तान का काबा’ बताया है. उर्दू कवि-विद्वान् सादिक़ ने इस मसनवी का हिन्दी अनुवाद किया है जो रज़ा पुस्तकमाला के अन्तर्गत राजकमल प्रकाशन से इसी शीर्षक से पुस्तक के रूप में आया है. ग़ालिब ने अपने एक मित्र राय छजमल खत्री को फ़ारसी में एक पत्र लिखा था जिसमें एक क़तआ भी लिखा था जिसका उर्दू अनुवाद सादिक़ ने यों किया है: ‘लोग कहते हैं वो जा पहुंचा बनारस ज़िंदा, हमको उस घास के तिनके से यह उम्मीद न थी.’ दिलचस्प यह याद करना भी है कि ऐसी कोई मसनवी ग़ालिब ने अपनी जन्मभूमि आगरा या कर्मभूमि देहली पर नहीं लिखी।

ग़ालिब को लगा था कि ‘देहली ने बनारस को कभी सपने में देखा है.’ उनके अनुसार ‘.... और इसकी धूल मानो आत्मा का सार लगती है’. वे कहते हैं: ‘यहां/ इस शहर में/ पतझड़ का मौसम/ जब कभी आता है/ माथे पर/ बनारस के/ तिलक चन्दन का/ बन जाता है.’ ‘बनारस के/ गुलिस्तां में/ हर इक मौसम/पवन को/ इस तरह से मान देता है/ झुका सिर को/ हंसीं-रंगीन फूलों की तरंगों का/ जनेऊ/ धार लेता है.’ वे यह कविजिज्ञासा भी करते हैं: ‘नहीं है वह/ यदि आकाश के/ माथे की शोभा या तिलक/ तो फिर बताओ/ हर सुबह/ हर शाम जो आती नज़र आकाश पर/ ऊषा की रंगीनी/ वो क्या है?’

बनारस की सुंदरता-सुषमा, उसकी युवतियों की अठखेलियां, आध्यात्मिक वैभव पर रीझते हुए भी ग़ालिब अपने समय की क्रूर सच्चाइयों से मुंह नहीं मोड़ते इस मसनवी में. उन्हें याद है कि ‘धर्म और ईमान केवल नाम को ही रह गए हैं’, ‘बाप पीने को है तत्पर अपने ही बेटे का ख़ून’, ‘प्रेम और शान्ति/ अब हर दिशा से/ मुंह छिपाये भागते हैं’. वे एक दरवेश से पूछते हैं: ‘जब हैं जग-ज़ाहिर निशान/ सब निशान/ आती क्यों नहीं/ फिर क़यामत?’ दरवेश मुस्कुरा कर कहता है: ‘फिर बनारस की तरफ़/ करके इशारा/ फ़रिश्तों की तरह/ गम्भीर लहजे में/ यूं बोला: ‘भूल कारण यह मुक़द्दस शहर है.’ ग़ालिब को वे लोग भी याद आते हैं जिन्हें पीछे छोड़कर वे बनारस में हैं और जो अब भी उनसे आस लगाए बैठे हैं.

मसनवी का आख़िरी याने 108वां शेर इस तरह है: ‘‘ला’/ के माने हैं ‘नहीं’/ और अर्थ है/ ‘इल्ला’ का ‘किन्तु’/ या ‘अलावा’/ ज़ोर से/ सतनाम बोलो/ और/ अल्लाह/ईश्वर/ परमेश्वर के/ है अलावा जो/ उसे कर दो स्वाहा.’ इससे बहुत पहले 32वें शेर में वे यह कह आए हैं: ‘यहां आई/ यदि मृत्यु/ तो समझो/ साथ ही/ अमरत्व भी पाया.’

मसनवी : उर्दू की लंबी कविताओं के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द
चराग़-ए-दैर : मंदिर का दिया
दरवेश : साधु, महात्मा
मुक़द्दस : पवित्र, प्रतिष्ठित