त्रिपुरा चुनाव के नतीजों के साथ क्या भाजपा ने सच में ‘माणिक’ की चमक कम कर दी है?

देखिये मैं एक सच्चा माणिक हूं और सच्चे मोती या माणिक की चमक कभी कम नहीं होती. त्रिपुरा चुनाव के नतीजों को आप यूं समझें कि आजकल नकली माणिकों की मांग बढ़ गई है, क्योंकि ‘यूज एंड थ्रो’ के जमाने में लोग टिकाऊ चीजें चाहते कहां हैं! लेकिन एक दिन लोगों को अहसास होगा कि उन्होंने झूठे मोतियों के आगे असली माणिक खोकर बड़ी गलती की थी.

त्रिपुरा में भाजपा के कमल खिलने को आप कैसे देखते हैं?

यही कि देश में कीचड़ बढ़ रहा है और बढ़ते-बढ़ते त्रिपुरा तक आ पहुंचा! (मुस्कुराते हुए)

आखिर 25 साल के शासन के बाद लोगों ने आपको क्यों नकार दिया? क्या आपकी ईमानदारी पर से लोगों का भरोसा उठ गया था?

असल में मेरी ईमानदारी में अब उनका यकीन बढ़ गया था कि जो मुख्यमंत्री 25 सालों में अपनी गरीबी दूर नहीं कर सका, वह उनकी गरीबी क्या खाक दूर करेगा! सो उन्हें उसी व्यक्ति में यकीन जागा जिसने चाय बेचने से लेकर, विदेशों में चाय पीने तक का सफर तय किया. लोगों को लगा कि अब मोदी जी ही उन्हें गरीबी दूर करने का असली राज बता सकते हैं. लेकिन जल्द ही लोगों की यह गलतफहमी दूर हो जाएगी और वे यह जान जाएंगे कि मोदी जी गरीबों के बजाय अमीरों की गरीबी दूर करते हैं!

अच्छा यह बताइये कि अब आप भारत में वामपंथी पार्टियों का क्या भविष्य देखते हैं?

अभी तो अपना ही भविष्य नहीं दिख रहा, वामपंथी पार्टियों का क्या दिखेगा!

वामपंथी पार्टियों को दोबारा राजनीतिक जमीन हासिल करने के लिए आगे क्या करना चाहिए?

वामपंथी पार्टियों को यदि इस देश में अपनी जड़ें फिर से जमानी हैं तो अपने विचार और अपनी विचारधारा को त्यागकर विचारशून्यता की तरफ बढ़ना पड़ेगा और सेल्फी मोड में आना होगा.

विचारशून्यता से आपका क्या मतलब है? और ये सेल्फी मोड क्या है?

सेल्फी मोड वह है जिसमें हमारे प्रधानमंत्री हमेशा रहते हैं! मतलब कि सर्वहारा के बजाय खुद पर फोकस. आप खुद के लिए जितने प्रतिबद्ध होंगे आपका ग्राफ उतनी ही तेजी से उठेगा. और रही विचारशून्यता की बात तो इसे यूं समझें कि फास्टफूड के जमाने में विचारधारा लोगों के लिए सादे पौष्टिक खाने जैसी हो गई है. इससे लोग बोर हो चुके हैं. सो यदि जनता में हमें वापस अपनी पकड़ बनानी है तो विचारधारा जैसी स्वास्थ्यवर्धक लेकिन बोरिंग चीज को छोड़कर फास्टफूड टाइप कुछ विचारों को प्रमोट करना होगा. जैसे पप्पुओं का पप्पू आजकल बिना विचार और विचारधारा के ही कितना छाया हुआ है!

देश में वामपंथी पार्टियों के हालिया पतन के लिए आप किसे जिम्मेदार ठहराते हैं?

देखिये इस देश में पकौड़ों की बिक्री बढ़ाने से लेकर पीएनबी घोटाले तक सिर्फ एक ही व्यक्ति जिम्मेदार है यानी मोदी जी. तो फिर वामपंथियों के इतने पतन के लिए भला और कौन जिम्मेदार होगा!

भला वह कैसे?

अरे यह विश्लेषण मैं अकेले कैसे कर सकता हूं. जल्दी ही देशभर के बचे-खुचे वामपंथी त्रिपुरा में पार्टी की हार का स्यापा करने के लिए जुटेंगे, तब यह विश्लेषण किया जाएगा कि अपनी नाकामी छिपाने के लिए मोदी जी को इसमें कैसे घसीटा जाए!

क्या आपको लगता है कि त्रिपुरा में भाजपा की जीत में कांग्रेस भी बड़ी मददगार साबित हुई है?

अभी तो कांग्रेस अपनी ही मदद करने लायक नहीं बची, भाजपा की मदद क्या करेगी!

बीते साल 15 अगस्त पर प्रसार भारती ने रेडियो-टीवी पर पहले आपके भाषण को प्रसारित करने से मना कर दिया था और फिर उसे संपादित करके प्रसारित किया. इस बारे में आपका क्या कहना है?

इस देश में एक व्यक्ति को जब मर्जी ‘मन की बात’ करने की आजादी है और दूसरे व्यक्ति को साल में सिर्फ एक बार ‘ढंग की बात’ करने की भी आजादी नहीं! यह कैसा लोकतंत्र हैं, जो लोगों में फर्क करता है. यह तो सीधे-सीधे तानाशाही है.

अब आगे आपकी क्या करने की योजना है?

पकौड़ा तो नहीं ही बेचूंगा कम से कम! मैं लोगों के स्वाद का नहीं स्वास्थ्य का ख्याल करता हूं. राज्य में अचानक से जो इतने कमल उग आए है, सोच रहा हूं कि कमल ककड़ी बेचकर अपने परिवार का पेट पालूं. साथ ही खाली समय में मोदी जी की ढेर सारी आदमकद मूर्तियां बनवाऊंगा.

मोदी जी की मूर्तियां क्यों?

ताकि समय आने पर उनको भी ठीक लेनिन की मूर्ति के अंदाज में गिराकर, कॉमेरड अपनी जीत का जश्न मना सकें!

भाजपा समर्थकों द्वारा लेनिन की मूर्ति गिराए जाने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

पच्चीस सालों में हमने एक यही तो अहम निर्माण कार्य कराया था! लेकिन मोदी भक्तों को दूसरों का विकास पसंद कहां आता है. समय आने पर लेनिन की मूर्ति का हर्जाना सरदार पटेल या स्वयं मोदी जी की मूर्तियों को भरना पड़ सकता है!

एक बात बताइये. वामपंथी मूलतः मूर्तिपूजा के विरोधी होते हैं फिर आप लोग जगह-जगह लेनिन की मूर्ति लगाते ही क्यों हैं?

हम मूर्ति पूजा के विरोधी हैं, लेकिन लेनिन से तो हम प्यार करते हैं. उनकी मूर्ति में हमारा रब बसता है...हम क्या करें! (मुस्कुराते हुए)

वही तो मैं पूछ रही हूं कि क्यों?

देखिये इस देश में आकर तो इस्लाम और ईसाइयत ने भी थोड़ी-बहुत जात-पात अपना ली है. फिर वामपंथी क्या मूर्तिपूजकों से लेनिन की मूर्ति की पूजा भी नहीं सीखेंगे!

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति ढहाए जाने के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में महापुरुषों की मूर्तियों पर हमले हुए हैं. इस पर क्या कहेंगे?

आप देख लीजिए कि यहां भी वामपंथियों के गुरू लेनिन ने ही समाज को राह दिखाई है.

क्या मतलब?

अरे मतलब कि लेनिन की मूर्ति के बाद ही बाकियों की मूर्तियों पर हमले हुए हैं. और मूर्तियों पर हमलों में कम से कम इंसानी खून तो नहीं बह रहा. इंसानों पर हमले को मूर्तियों पर हमले में बदलने की राह आखिर किसने दिखाई? लेनिन की मूर्ति ने ही न!... आप एक और बात पर भी गौर करिये. देशभर में निर्दोष लोगों के ऊपर हमले के बाद भी मौन रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री जी ने, मूर्तियों पर हमले के खिलाफ अपनी चुप्पी तोड़ी है. ये सब बातें बताती हैं कि इस देश को सही रास्ते पर लाने की कूव्वत सिर्फ कॉमरेडो में ही है, लाल सलाम.