फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध फिर चर्चा में हैं. यूरोप का यह देश एक लंबे अरसे से भारत के साथ मजबूती से खड़ा रहा है, हालांकि इस बारे में हमारे यहां ज्यादा चर्चा नहीं होती. इस मौके पर याद किया जा सकता है कि 1998 के दौरान जब पोखरण में परमाणु परीक्षण हुआ था तब पश्चिमी देशों में सिर्फ फ्रांस था जिसने भारत का समर्थन करते हुए कोई भी द्विपक्षीय प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया था.

आज की बात करें तो मैक्रों यूरोपीय संघ (ईयू) की तरफ से सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में शुमार किए जाते हैं और वे अंतरराष्ट्रीय फलक पर फ्रांस की वजनदारी बढ़ाना चाहते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि वे अंतरराष्ट्रीय संबंधों को चीन या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चश्मे से नहीं देखते जहां किसी दूसरे का नुकसान उनके लिए फायदे का सौदा बने. यह नजरिया भारत और फ्रांस के बीच हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग से जुड़े संयुक्त रणनीतिक दृष्टिपत्र में भी देखा जा सकता है.

इसके तहत दोनों देश चाहते हैं कि भारत-प्रशांत क्षेत्र में सामुद्रिक परिवहन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में बेरोकटोक हो और यहां सामुद्रिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए. इस सहयोग को कारगर बनाने के लिए दोनों देशों के बीच एक समझौता भी हुआ है जिसके तहत हिंद महासागर में दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे के बंदरगाहों और अन्य सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकती हैं.

पिछले साल भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में एक बेहद अहम समझौता ‘लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट’ (लेमोआ) हुआ था. इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं, रसद और एक निश्चित सीमा में सैन्य ठिकानों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इस कड़ी में फ्रांस के साथ हुआ ताजा समझौता भारत के लिए सामुद्रिक सुरक्षा के और विकल्प उपलब्ध कराएगा. चीन जिस तरह से भारत को हिंद महासागर में घेरने की कोशिश कर रहा है, उस लिहाज से यह समझौता काफी महत्वपूर्ण हो जाता है.

पिछले दिनों भारत में फ्रांस से खरीदे जा रहे 36 राफेल विमानों का सौदा काफी चर्चा में रहा है. विपक्ष खासकर इसकी कीमत को लेकर सवाल उठाता रहा है. इस यात्रा के दौरान राफेल सौदे का जिक्र करते हुए एक इंटरव्यू में मैक्रों ने कहा है कि अगर भारत सरकार विपक्ष के साथ बहस में सौदे से जुड़ी कुछ बारीकियों पर से परदा उठाना चाहती है तो फ्रांस को इस पर आपत्ति नहीं होगी. मैक्रों की यह बात कुछ तल्ख लग सकती है, लेकिन चूंकि उन्हें दूरदृष्टि वाला व्यक्ति माना जाता है तो ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि वे भारत को सिर्फ रक्षा उपकरणों या परमाणु रिएक्टरों के बाजार के रूप में नहीं देख रहे होंगे.

मैक्रों की इस यात्रा के दौरान फ्रांस और भारत ने एक दूसरे की शैक्षिक उपाधियों को मान्यता देने का समझौता भी किया है जो दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत करेगा. इस बात से भी संकेत मिलता है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति भारत के साथ एक लंबी और बड़ी साझेदारी पर आगे बढ़ना चाहते हैं.

कल फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता की है. उम्मीद की जानी चाहिए कि फ्रांस भारत को अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में और दूसरे क्षेत्रों में भी उच्च तकनीक उपलब्ध कराएगा और कारोबार बढ़ाते हुए भारत में निवेश भी करेगा. अब तक भारत के मित्र देशों में रूस ही इतने अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग करता आ रहा था, लेकिन बीते समय में उसकी नई दिल्ली के साथ रणनीतिक साझेदारी की गर्माहट कम हुई है और चीन से नजदीकी बढ़ी है. ऐसे में भारत को इस बात की संभावना तलाशनी चाहिए कि क्या फ्रांस उसकी जगह ले सकता है. (स्रोत)