इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर फिर विवाद पैदा हो गया है. ख़बरों के मुताबिक हाईकोर्ट कॉलेजियम ने 33 वरिष्ठ वकीलों को जज के तौर पर नियुक्त करने की केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की है. लेकिन कानून मंत्रालय ने ख़ुफ़िया ब्यूरो (आईबी) को पहले इन सभी वकीलों की पृष्ठभूमि की जांच करने को कहा है.

द टाइम्स ऑफ इंडिया ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि जिन 33 वकीलों को जज बनाने की अनुशंसा की गई है उनमें से अधिकांश देश की इस सबसे बड़ी हाईकोर्ट के ही मौज़ूदा या सेवानिवतृत्त जजों के रिश्तेदार हैं. सूची में शामिल कुछ वकील सुप्रीम कोर्ट के मौज़ूदा या रिटायर्ड जजों के रिश्तेदार भी बताए जाते हैं. ख़बरों के अनुसार इस किस्म के वकीलों की तादाद 30 फ़ीसदी के क़रीब है. यानी संख्या में 10 से 12 के लगभग.

इस सूची में एक नाम तो ऐसा भी शामिल है जो दिल्ली में एक बड़े राजनेता की पत्नी के कानूनी साझीदार रहे हैं. यही नहीं केंद्रीय कानून मंत्रालय को इलाहाबाद हाईकोर्ट और उसकी लखनऊ खंडपीठ की बार काउंसिल (वकीलों की अधिकृत संस्था) के ख़िलाफ़ तमाम शिकायतें भी मिली हैं. इसीलिए मंत्रालय पहले उन तमाम वकीलों की पृष्ठभूमि की जांच करा रहा है जिनके नाम जज के तौर नियुक्ति देने के लिए सुझाए गए हैं.

हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में ऐसा कोई मामला सामने आया हो. सूत्रों की मानें तो यहां 2016 में भी ऐसी ही स्थिति बनी थी. उस वक़्त भी हाईकोर्ट कॉलेजियम ने 30 वकीलों को जज बनाने की अनुशंसा की थी. लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने इनमें से 11 वकीलों के नाम ख़ारिज़ कर दिए थे. क्योंकि उन्हें इनके ख़िलाफ़ तमाम शिकायतें मिली थीं. कानून मंत्रालय ने आईबी के जरिए इन शिकायतों को सही पाया था. इसके बाद सिर्फ़ 19 वकीलों को ही हाईकोर्ट का जज बनाया जा सका था.