त्रिपुरा में भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने राजनीतिक पंडितों को चकित करने के साथ गैर-भाजपा दलों को सचेत करने का काम भी किया है. हालांकि, देश की राजनीति और अगले साल होने वाले आम चुनाव में इसका कितना असर पड़ेगा, इसे लेकर जानकारों के बीच अब भी एकमत नहीं है. लेकिन यह जरूर है कि एक के बाद एक राज्यों में भाजपा की जीत ने विपक्षी दलों के माथे पर बल डाल दिए हैं. माना जा रहा है कि इसके चलते ही आम चुनाव से पहले तीसरे मोर्चे की चर्चा चल पड़ी है. हाल में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव ने इसके गठन पर जोर दिया. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इसका समर्थन किया है. इसके अलावा कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी एक बार फिर विपक्षी दलों में एकता के लिए इस महीने एक बैठक बुलाई है.

देश के 21 राज्यों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार के गठन के बाद भाजपा की नजर बाकी के राज्यों पर है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लगातार कह रहे हैं कि भाजपा का स्वर्णिम काल उस वक्त होगा जब उसका पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक और ओडिशा में शासन होगा. इन राज्यों में भी पश्चिम बंगाल को भाजपा के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है. 2011 में 34 साल के वाम शासन को सत्ता से बाहर करने के बाद ममता बनर्जी यहां लगातार मजबूत दिखी हैं. भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भी उन्होंने बीते आम चुनाव और साल 2016 के विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज की थी.

साल 2016 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन | साभार : चुनाव आयोग
साल 2016 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन | साभार : चुनाव आयोग

दूसरी ओर, वाम दलों और कांग्रेस के हाशिए पर जाने के बाद सूबे में भाजपा भी अपनी राजनीतिक जमीन लगातार बढ़ाती हुई दिख रही है. लोक सभा चुनाव (2014) में दो और 2016 के विधानसभा चुनाव में केवल तीन सीटें जीतने वाली भाजपा को अब पश्चिम बंगाल में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी माना जा रहा है. बीते तीन वर्षों में स्थानीय के साथ कई उप-चुनाव इसकी पुष्टि करते भी दिखाई देते हैं. पार्टी के वोट शेयर में लगातार बढ़ोतरी दर्ज हुई है. 2011 के विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा को केवल 4.6 फीसदी वोट हासिल हुए थे. इसके पांच साल बाद यह आंकड़ा बढ़कर 10.2 फीसदी हो गया. उधर, 2014 के आम चुनाव में पार्टी ने 17 फीसदी मतदाताओं का विश्वास हासिल किया था.

त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की सियासी हवा की बात करें तो यहां कई चुनावी मुद्दे एक जैसे हैं. जैसे बांग्लादेश से तस्करी या वहां से होने वाली अवैध घुसपैठ. भाजपा के स्टार प्रचारक नरेंद्र मोदी ने इन मुद्दों को त्रिपुरा की चुनावी रैली में भी उठाया था. राज्य में भाजपा और संघ के लोग लगातार इस मुद्दे पर ममता बनर्जी को घेरने की कोशिश में हैं. इसके अलावा सारदा और अन्य चिटफंड घोटालों का मामला भी दोनों राज्यों से संबंधित है. त्रिपुरा की भांति पश्चिम बंगाल भी वित्तीय संकट की स्थिति का सामना कर रहा है. माना जा रहा है कि ममता बनर्जी अब तक पर्याप्त निवेश आकर्षित कर रोजगार पैदा करने में विफल रही हैं. माना जा रहा है कि इन मामलों को लेकर भाजपा पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की पुरजोर कोशिश कर सकती है. इसके अलावा पार्टी अपनी हिंदुत्व की राजनीति को भी आगे बढ़ाती हुई दिख रही है. भाजपा ममता बनर्जी सरकार पर मुसलमानों के तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए लगातार हमलावर है. सूबे में मुसलमानों की आबादी करीब 27 फीसदी है.

पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा, दोनों वाम के गढ़ रहे हैं. पश्चिम बंगाल की तुलना में त्रिपुरा को देखें तो पार्टी ने पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में वहां सिर्फ डेढ़ फीसदी मत हासिल किए थे. पार्टी के 50 में से 49 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. लेकिन अगले पांच साल में ही पार्टी के प्रदर्शन में असाधारण परिवर्तन आ गया. पश्चिम बंगाल में भी भाजपा तेजी से जमीन पर विस्तार कर रही है. अमित शाह बीते कुछ समय से धड़ाधड़ राज्य के दौरे कर रहे हैं. वे नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा व्यापारियों और किसानों तक सब से मिल रहे हैं. इसके अलावा पार्टी के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा भी उसके लिए जमीन तैयार की जा रही है. संघ प्रमुख मोहन भागवत लगातार पश्चिम बंगाल में कई रैलियां कर चुके हैं. इसके अलावा वहां संघ की शाखाओं में भी तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है.

साल 2011 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन | साभार : चुनाव आयोग
साल 2011 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन | साभार : चुनाव आयोग

माना जा रहा है कि त्रिपुरा में भाजपा की भारी जीत और सूबे में लोगों के बीच उसकी बढ़ती पहुंच ने तृणमूल कांग्रेस के साथ वाम दलों को भी चौकन्ना कर दिया है. सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने 23 मार्च को राज्य सभा के लिए होने वाले चुनाव में एक सीट पर कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी को समर्थन देने की बात की है. हालांकि, पार्टी ने अब तक उनके नाम की घोषणा नहीं की है. इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस ने वाम दलों द्वारा समर्थित उम्मीदवार के साथ खड़े होने का संकेत दिया है.

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इससे संकेत मिलता है कि ममता बनर्जी कांग्रेस को अपने साथ लाने की इच्छा रखती हैं. माना जा रहा है कि ऐसा करके वे कांग्रेस के वाम दलों के साथ जाने की संभावना को खत्म करना चाहती हैं. दूसरी ओर, प्रदेश कांग्रेस तृणमूल के बजाय वाम दलों के साथ जाने की इच्छा रखती हुई दिखती है. माना जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों (सारदा और नारदा मामले) के चलते प्रदेश कांग्रेस के नेता उससे दूरी बनाकर रखना चाहते हैं.

उधर, पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी के नेतृत्व में सीपीएम का बंगाल कैडर कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करने के पक्ष में है. बीते जनवरी में पार्टी की केंद्रीय समिति ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. पार्टी के पूर्व महासचिव प्रकाश करात और केरल कैडर इसके विरोध में है. केरल में कांग्रेस, वाम दलों की प्रमुख प्रतिद्वंदी पार्टी है. हालांकि, त्रिपुरा चुनाव के बाद माना जा रहा है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर पार्टी में सीताराम येचुरी का पक्ष मजबूत हुआ है. प्रकाश करात के साथ माणिक सरकार ने भी अगले महीने हैदराबाद में हो रही पार्टी की सबसे बड़ी बैठक में इस प्रस्ताव पर फिर से विचार किए जाने की बात कही है.

पिछले विधानसभा चुनाव में सीपीएम और कांग्रेस साथ चुनाव लड़े थे, लेकिन, इस गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा. इससे पहले वाम दल कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए-1) का हिस्सा रह चुके हैं. हालांकि, पार्टी ने साल 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. इसके बाद से पश्चिम बंगाल में वाम दलों का आधार लगातार सिमटता जा रहा है.

उधर, भाजपा राज्य में फ्रंटफुट पर खेलती हुई दिख रही है. जैसा कि पहले भी जिक्र हुआ, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह खुद संगठन के कामकाज को देख रहे हैं. इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस के पूर्व वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय के भाजपा में शामिल होने से पार्टी और मजबूत हुई है. भाजपा ने मुकुल रॉय को इस साल होने वाले पंचायती चुनाव का संयोजक बनाया है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में पंचायती चुनाव को विधानसभा चुनाव के नतीजे की भविष्यवाणी माना जाता है. अभी तक पंचायती चुनाव में जीत हासिल करने वाली पार्टी ने ही वहां विधानसभा चुनाव में भी अपना परचम लहराया है.

सियासी मामलों के जानकारों की मानें तो त्रिपुरा में उम्मीद से भारी जीत हासिल करने के बाद भाजपा बंगाल की राजनीति में और आक्रामक रुख अपना सकती है. प्रदेश पार्टी अध्यक्ष दिलीप घोष ने भी इसके संकेत दिए हैं. एक अखबार से बातचीत उन्होंने कहा, ‘त्रिपुरा के बाद हमारा अगला मकसद बंगाल है. हमने छोटे से संगठन के बल पर त्रिपुरा जीता है. इसकी तुलना में पश्चिम बंगाल में हमारा संगठन काफी बड़ा और विस्तृत है.’ इसके साथ ही वे तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी पर भी निशाना साधने से नहीं चूके. दिलीप घोष ने कहा, ‘मैं नहीं जानता कि त्रिपुरा में हार के बाद सीपीएम कितना बुरा महसूस कर रही है. लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बहुत उदास हैं.’

दूसरी ओर, तृणमूल नेता पार्थ चटर्जी ने त्रिपुरा के चुनावी नतीजे का बंगाल पर किसी तरह का असर पड़ने से इनकार किया है. खुद ममता बनर्जी ने भी त्रिपुरा की जीत के बाद उत्साहित भाजपा को चेताया है. उन्होंने बीती आठ मार्च को कहा, ‘अगर आप (भाजपा) बंगाल को टारगेट करोगे तो बंगाल दिल्ली के लाल किले को अपना निशाना बनाएगा. याद रखो, बंगाल सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए काम कर रहा है.’ उन्होंने 2019 के आम चुनाव में भाजपा को हराने के लिए विपक्षी पार्टियों के साथ आने पर भी जोर दिया. इससे पहले भी त्रिपुरा चुनाव में गठबंधन न करने को लेकर उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाया था.

जानकारों के मुताबिक भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में देखें तो ऐसे कम ही मौके सामने आए हैं जब त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य के चुनावी नतीजे ने राष्ट्रीय राजनीति को इस हद तक प्रभावित किया हो. इसके बाद विपक्षी खेमे में हो रही कवायदों के लिहाज से देखें तो यह चुनाव पश्चिम बंगाल के साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी बदलाव लाता दिख रहा है.