पिछले एक हफ्ते से जबरदस्त चर्चा थी कि दत्तात्रेय होसबोले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में नंबर दो यानी सरकार्यवाह बनने वाले हैं. लेकिन रविवार को संघ की प्रतिनिधिसभा में ठीक उल्टा हुआ. सभा की बैठक से पहले माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की पसंद दत्तात्रेय होसबोले को ही संघ का जनरल सेक्रेटरी यानि सरकार्यवाह बनाया जाएगा. लेकिन एक बार फिर इस पर सुरेश भैयाजी जोशी चुन लिए गए. प्रतिनिधिसभा में होसबोले के नाम पर चर्चा तक नहीं हुई.

संगठन ने भैयाजी जोशी को लगातार चौथी बार यह जिम्मेदारी दी है. 2009 से आरएसएस का सरकार्यवाह पद संभाल रहे जोशी अब 2021 तक इस पद पर बने रहेंगे. वे एचवी शेषाद्रि के बाद इतने लंबे कार्यकाल के लिए आरएसएस के सरकार्यवाह रहने वाले दूसरे व्यक्ति हैं. शेषाद्रि 1987 से 2000 तक इस पद पर रहे थे. संघ के सरकार्यवाह इसके कार्यकारी प्रमुख होते हैं जो संगठन के रोजाना के कार्यों को देखा करते हैं.

कुल मिलाकर जिसको भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आरएसएस का नंबर दो बनाना चाहता था वह नंबर तीन पर रह गया और 70 की उम्र पार कर चुके भैयाजी जोशी एक बार फिर सरकार्यवाह बन गए. यानी 2019 के लोकसभा चुनाव के वक्त भी आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत होंगे तो डिप्टी भैयाजी जोशी रहेंगे. मोदी और अमित शाह के करीबी कहे जाने वाले दत्तात्रेय होसबोले सिर्फ चार सह सरकार्यवाह में से एक होंगे.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह दोनों को पता था कि इस बार भी दत्तात्रेय होसबोले को सरकार्यवाह नहीं बनाया जाएगा. बताते हैं कि अमित शाह की मोहन भागवत से मुलाकात हुई थी और इस मुलाकात में भी शाह को बता दिया गया था कि आरएसएस क्या फैसला करने वाला है.

अब सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ. प्रतिनिधि सभा में शामिल आरएसएस के कुछ अधिकारियों से बात करने पर तस्वीर बहुत हद तक साफ हो जाती है. पिछले तीन साल के दौरान बार-बार चर्चा हुई थी कि दत्तात्रेय होसबोले को सरकार्यवाह बनाया जाएगा और गिरते स्वास्थ्य की बात कहकर भैयाजी जोशी रिटायर हो जाएंगे. लेकिन हर बार की तरह इस बार भी आरएसएस का एक खेमा हावी रहा और भैयाजी जोशी को फिर मौका मिल गया.

अंदर की खबर रखने वाले सूत्र साफ बताते हैं कि आरएसएस में मोदी समर्थक और मोदी विरोधी नाम के दो खेमे साफ दिख रहे हैं. एक खेमा दत्तात्रेय होसबोले के समर्थन में था और दूसरा विरोध में. आखिर में मोदी विरोधी खेमा हावी रहा.

सुनी-सुनाई पर जाएं तो ऐसा नहीं है कि यह सब एक दिन या एक हफ्ते में हुआ. भाजपा और आरएसएस के बीच तालमेल बनाकर चलने वाले कुछ खास लोगों के मुताबिक दत्तात्रेय होसबोले के समर्थक अब भी संघ में अल्पसंख्यक हैं जबकि बीते कुछ समय के दौरान संगठन में मोदी-शाह विरोधियों की संख्या बढ़ी है. संघ के अंदर ऐसे विचार रखने वाले लोग कुछ ज्यादा ही हैं जो मानते हैं कि मोदी-शाह की जोड़ी पर नज़र रखने के लिए यह जरूरी है कि सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ही रहें. मीडिया में ऐसी खबरें फैलने से, कि दत्तात्रेय होसबोले मोदी और शाह के अपने हैं, ज्यादा भ्रम फैला. इसका नतीजा यह हुआ कि दत्तात्रेय होसबोले सरकार्यवाह बनते बनते रह गए.

करीब छह महीने पहले यह करीब-करीब तय था कि दत्तात्रेय होसबोले ही सरकार्यवाह बनेंगे. लेकिन इस दौरान अलग-अलग राज्यों में चुनावी जीत के बाद भाजपा ज्यों-ज्यों मजबूत हुई, मोदी और शाह की जोड़ी की स्थिति जैसे-जैसे दिल्ली में ताकतवर होती गई. नागपुर में माहौल बनता गया कि संघ में एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को समझा-बुझा सके. संघ की खबर रखने वाले भाजपा नेता बताते हैं कि इस वक्त संघ में ही वह शक्ति है जो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से भी अपनी बात मनवा सकती है. भाजपा में ऐसा भले ही न रहा हो, लेकिन संघ में अब भी बहुमत की राय मायने रखती है.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि ऐसा ही प्रतिनिधि सभा की बैठक से पहले हुआ. संघ के ज्यादातर पदाधिकारी एक साथ आए और उन्होंने दत्तात्रेय होसबोले को कुछ महीने और इंतजार करने के लिए कहा. अब यह लग रहा है कि संघ में अगर नेतृत्व परिवर्तन होगा तो वो 2019 के चुनाव के बाद ही होगा.

संघ ने ऐसा क्यों किया, इसके पीछे संघ नेतृत्व की अपनी अलग वजह है. संघ की कार्य पद्धति भाजपा से एकदम अलग है. अब भी सरसंघचालक का पद मार्गदर्शक का है. वे संघ प्रमुख हैं लेकिन वे चाहकर भी अपने मन की बात नहीं मनवा सकते. संघ अब भी सामूहिक नेतृत्व की परंपरा से फैसले लेता है. संघ में करीब 10 लोग ऐसे हैं जो किसी भी समस्या पर साथ बैठकर मंथन करते हैं और फिर सहमति से फैसला करते हैं. सरसंघचालक हों या सरकार्यवाह, सब इस फैसले से बंधे होते हैं.

इस बार भी ऐसा ही हुआ. संघ नेतृत्व जानता था कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व क्या चाहता है. इसके बावजूद संघ ने सोच विचारकर एक ऐसा फैसला किया जो भाजपा नेतृत्व की चाह के खिलाफ जाता है. लेकिन भाजपा को इसे मन मसोसकर ही सही पचाना होगा. संघ को जानने-समझने वाले बताते हैं कि आरएसएस ने ऐसा ही अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त में भी किया था. तब वाजपेयी चाहकर भी संघ नेतृत्व को अपने साथ नहीं ला पाए थे. अब नरेंद्र मोदी के वक्त में भी ऐसा ही हुआ है. मोदी-शाह के लाख चाहने के बाद भी संघ ने वही किया है जो उसके हिसाब से सही था. इस एक फैसले ने संघ को भी ताकतवर बनाया है और मोहन भागवत को भी.