किसानों के आंदोलन बीते कुछ समय से लगातार चर्चा में रहे हैं. बीते एक साल में राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश, तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ तक तमाम राज्यों से किसानों के सड़क पर उतरने की खबरें आई हैं. ताजा मामला महाराष्ट्र का है जहां अपनी मांगों को लेकर करीब 30 हजार किसान नासिक से पैदल चलकर मुंबई पहुंचे हैं. पिछले सभी आंदोलनों की तरह महाराष्ट्र में भी काश्तकारों ने कर्जमाफी जैसी दूसरी मुख्य मांगों के साथ स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को डेढ़ गुना किए जाने की जरूरत को प्रमुखता से उठाया है.

हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली अपने चौथे बजट में खरीफ की सभी घोषित फसलों के एमएसपी को उत्पादन लागत से कम से कम डेढ़ गुना रखने की बात कह चुके हैं. सरकार बार-बार यह बात दोहरा भी रही है. तो फिर किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं?

किसानों के हक के लिए आवाज उठाने वाले संगठनों का आरोप है कि इस बजट में मोदी सरकार ने न सिर्फ किसानों से वादाखिलाफ़ी की है बल्कि उन्हें छलने की भी कोशिश की है. जानकारों का कहना है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान खुद नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में कहा था कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनते ही राष्ट्रीय किसान आयोग या स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

स्वामीनाथन आयोग का गठन साल 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय हुआ था. खाद्य आपूर्ति को भरोसेमंद और किसानों की आर्थिक हालत बेहतर बनाने जैसे दो प्रमुख उद्देश्यों के साथ बने इस आयोग ने 2006 में अपनी रिपोर्ट दी. इसमें किसानों को उनकी लागत मूल्य का 50 प्रतिशत मुनाफा देने की पुरजोर सिफारिश की गई थी.

लेकिन इसमें एक तकनीकी पेच फंसा था. दरअसल निर्धारित फसलों के लिए एमएसपी का आकलन करने वाले कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) खेती की लागत के तीन वर्ग बनाए हैं - ए2, ए2+एफएल और सी2. ‘ए2’ में फसल उत्पादन के लिए किसानों द्वारा किए गए सभी तरह के नगद खर्च जैसे- बीज, खाद, ईंधन और सिंचाई आदि की लागत शामिल होती है. ‘ए2+एफएल’ में नगद खर्च के साथ फैमिली लेबर यानी फसल उत्पादन लागत में किसान परिवार का अनुमानित मेहनताना भी जोड़ा जाता है. उधर, ‘सी2’ में खेती के व्यवसायिक मॉडल को अपनाया गया है. इसमें कुल नगद लागत और किसान के पारिवारिक पारिश्रामिक के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है.

‘ए2+एफएल’ और ‘सी2’ लागत मूल्यों के बीच के अंतर को गेहूं के उदहारण से समझ सकते हैं. इस फसल (2017-18) के लिए ‘ए2+एफएल’ पर आधारित (अनुमानित) लागत 817 रुपए/क्विंटल है. वहीं ‘सी2’ आधारित लागत मूल्य पर गेहूं की (अनुमानित) लागत 1,256 रुपए/क्विंटल है यानी करीब 53 प्रतिशत ज्यादा. कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि किसानों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ‘सी2’ को लागत मूल्य के तौर पर लेने की बात कही थी. लेकिन यूपीए की ही तरह एनडीए सरकार ने भी ‘ए2+एफएल’ को फसलों का लागत मूल्य मानकर ताजा घोषणा की है.

सत्याग्रह से हुई बातचीत में किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह मेज थपथपाकर वित्तमंत्री के ऐलान का स्वागत किया तो लगा कि कृषकों के हित में कोई बड़ी घोषणा हुई है. लेकिन बाद में जब पता चला कि इन्होंने सी2 की जगह ए2+एफएल को ही लागत मूल्य माना है तो हमारे किसान भाइयों को बड़ी निराशा हुई. कांग्रेस सरकार भी इसी लागत पर डेढ़ गुनी एमएसपी देती थी, फिर इसमें नया क्या है?’

रामपाल जाट आरएसएस के किसान संगठन ‘भारतीय किसान संघ’ में भी बड़ी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. वे कहते हैं, ‘जब लोकसभा चुनावों से पहले मोदी जी ने अपने घोषणा पत्र में लागत का 50 फीसदी लाभ देने की बात जोर-शोर से कही तो हमें भी लगा कि भाजपा सरकार में ‘सी2’ को लागत मूल्य मानकर एमएसपी तय हुआ करेगी. लेकिन बजट में मोदी सरकार ने किसानों को नई पुड़िया में पुरानी गोली देने का काम किया है.’

लागत मूल्य तय होने की प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाते हुए वे आगे कहते हैं, ‘यदि सरकारें ईमानदारी से ए2+एफएल के आकलन पर ध्यान दें तो भी किसानों को कुछ राहत मिल सकती है. लेकिन यहां भी उन्हें किसानों के हितों से कोई सरोकार नहीं होता. पारिश्रमिक तय करते समय किसान परिवार के कई सदस्यों को अकुशल श्रमिक माना जाता है. लिहाजा कई बार उनके दैनिक मेहनताने के तौर पर (औसतन) 15 से 20 रुपए ही फसल लागत में जोड़े जाते हैं.’

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (उदयपुर) के पूर्व निदेशक सुखदेव सिंह बुरडक भी इससे सहमति जताते हैं. वे कहते हैं, ‘ए2+एफएल के तहत पारिश्रमिक की गणना में सिर्फ वही समय जोड़ा जाता है जब तक किसान खेत में मौजूद रहता है. जबकि कर्ज के लिए किसान को हफ़्तों बैंक या साहूकार के पास जाना पड़ता है, बीज खरीदने के लिए कई-कई दिन मंडियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जुताई और बुवाई से पहले घंटों तैयारी करनी पड़ती है या फिर ट्रैक्टर और अन्य जरूरी साधनों के लिए किसी बड़े किसान के यहां कई दफ़ा मिन्नत करनी पड़ती है. लेकिन यह सारा समय किसान की दिहाड़ी में शामिल नहीं माना जाता.’

बुरडक आगे कहते हैं, ‘पारिवारिक पारिश्रमिक के नाम पर भी किसान को ठगा ही जाता है. मान लें किसी खेत में तीन घंटे ट्रैक्टर से जुताई हुई. तब अकेले मुखिया किसान का ही तीन घंटे का मेहनताना लागत मूल्य में जुड़ता है. जबकि ट्रैक्टर के साथ किसान की पत्नी, बच्चों या घर के अन्य सदस्यों को जुताई के समय खेत में दसियों तरह के अलग-अलग काम करने पड़ते हैं. लेकिन फसल की लागत तय करते समय उनकी मेहनत को भुला दिया जाता है.’

नाम न छापने की शर्त पर सीएसीपी के एक कर्मचारी बताते हैं कि किसी खेत की बुवाई या जुताई में लगे समय को अधिकारी (अनुकूल परिस्थियों में लगे समय को औसत मानकर) अपने अंदाजे से तय करते हैं. ऐसे में यदि किसी कारणवश किसान को कृषि कार्यों में देरी हो जाए (जो कि अमूमन होती ही है) तो अतिरिक्त समय का मेहनताना भी फसल लागत में अक्सर नहीं जुड़ता.

पारिश्रमिक के बाद फसलों का कुल लागत मूल्य तय होते समय भी अधिकतर किसानों के साथ न्याय नहीं हो पाता. लंबे समय से कृषि क्षेत्र से जुड़े पत्रकार पीयूष शर्मा बताते हैं, ‘अव्वल तो कृषि विश्वविद्यालयों में बैठे अर्थशास्त्री पुराने फॉर्मूलों और (कृषि आंकड़ों के संकलन की बेहद धीमी प्रक्रिया होने की वजह से) दो-तीन साल पुराने दाम और दरों से ही वर्तमान उपज की डेढ़ गुनी कीमत तय करते हैं. यानी 2018 में उपयोग में आए सभी कृषि संसाधनों जैसे- बीज, मजदूरी, ट्रैक्टर और वॉटर पंप में इस्तेमाल हुए डीज़ल आदि की लागत 2016 की कीमत और दर के हिसाब से तय होती है. इस तरीके की सटीकता हमेशा संदिग्ध रहती है. दूसरी बात, वैज्ञानिक अनुमानों और व्यावहारिक तरीके से खेती की लागत में जमीन-आसमान का अंतर होता है. यदि सरकार किसानों को लागत से डेढ़ गुना लाभकारी मूल्य देने की मंशा रखती है तो उसे ये फॉर्मूले बदलने के साथ लागत के वर्ष दर वर्ष ताजा आंकड़ों पर काम करना होगा.’ वे आगे कहते हैं, ‘सिंचित और असिंचित क्षेत्र में पैदा हुई फसल की उत्पादन लागत अलग-अलग होती है. ऐसे ही सतही और भू-जल से सिंचित फसलों की लागत भी अलग-अलग होती है. ऐसे में सभी किसानों को लाभकारी मूल्य मिलने की बात पर संशय हमेशा रहता है.’

अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमराराम सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘जब सरकारें फसल खरीदेंगी ही नहीं तो लागत मूल्य चाहे जो हो क्या फर्क पड़ता है.’ चौधरी के मुताबिक सिर्फ छह फीसदी फसलों को सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता है बाकी 94 प्रतिशत फसलें किसानों को बाजार में औने-पौने दामों में बेचनी पड़ती हैं. वे कहते हैं, ‘जब किसान अपने हक के लिए लड़ने की कोशिश करते हैं तो बदले में उन्हें पुलिस की गोलियां और लाठियां मिलती हैं.’ उनका मानना है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को जमीन पर उतारने के लिए मनरेगा बिल की तरह देश में बाकायदा कानून बनना चाहिए ताकि सरकारें किसानों की सुध लेने को मजबूर हो सकें.

उधर, ‘सी2’ को फसलों का लागत मूल्य घोषित करने को लेकर सरकारों के पक्ष में अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि ऐसा करते ही खाने-पीने की चीजों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और उपभोक्ताओं पर भारी बोझ आ पड़ेगा. लेकिन अमराराम इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. बाजार में बीज से लेकर खाद तक पर विदेशी कंपनियों का एकाधिकार बताते हुए वे तंज भरे लहजे में कहते हैं, ‘मंदसौर जैसी जगहों पर जिस आलू की कीमतें आठ रुपए प्रतिकिलो करवाने की मांग करते किसानों को बेरहमी से मार दिया जाता है, बाहरी कंपनियों का ठप्पा लगते ही वही आलू (चिप्स) 800 रुपए किलो तक बिकता है. इस तरह आर्थिक वजन से न किसान बच पाता है और न ही उपभोक्ता. इसलिए कुतर्क की बजाय सरकारों को अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए ताकि समर्थन मूल्यों के नाम पर किसानों के साथ हो रहे इस मजाक को रोका जा सके.’