पूर्वोत्तर भारत भारतीय जनता पार्टी के लिए हमेशा से देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा है. लेकिन 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से इस क्षेत्र में भाजपा लगातार मजबूत हुई है. पहले भी केंद्र में भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में सरकार बनाई थी. लेकिन उस वक्त पूर्वोत्तर में पार्टी का कोई खास विकास नहीं हुआ था.पर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पार्टी पूर्वोत्तर में अपनी राजनीतिक ताकत लगातार बढ़ा रही है.

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में हुए चुनावों के नतीजों के बाद आज स्थिति यह है कि इस क्षेत्र के आठ राज्यों में से सिर्फ मिजोरम एक ऐसा राज्य है, जहां भाजपा सत्ता में नहीं है. बाकी के सात राज्यों में से कुछ में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं तो कुछ में भाजपा सहयोगी दल के तौर पर सत्ता में हिस्सेदार है.

देश के उत्तर पूर्वी हिस्से में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के उभार के सबसे बड़े शिल्पी के तौर पर पार्टी के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का नाम लेते हैं. पार्टी नेताओं का मानना है कि भाजपा में शीर्ष स्तर पर इन दोनों नेताओं ने यह सुनिश्चित कराया कि पूर्वोत्तर में विस्तार के लिए जो भी जरूरी हो, वह सभी कार्य पार्टी करेगी. लेकिन इन दोनों के अलावा सहयोगी भूमिका में या यों कहें कि जमीनी स्तर पर इनकी कार्ययोजना को लागू कराने वाले भी कुछ पात्र हैं.

राम माधव

राजनीति में राम माधव की पहचान बनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता के तौर पर. वे प्रवक्ता के नाते मीडिया में संघ का पक्ष रखते थे. लेकिन बाद में संघ ने प्रवक्ता का पद खत्म कर दिया. भाजपा और संघ से जुड़े कुछ लोगों का तो यह भी कहना था कि माधव की अत्याधिक मुखरता संघ के शीर्ष नेताओं को ठीक नहीं लग रही थी और उन्हें हटाने के लिए संघ प्रवक्ता का पद खत्म किया गया.

लेकिन राम माधव के राजनीतिक जीवन में अहम मोड़ तब आया जब वे 2014 में भाजपा में महासचिव के तौर पर शामिल किए गए. कुछ ही समय में वे सबसे ताकतवर महासचिव बनकर उभरे. जम्मू कश्मीर चुनावों में पार्टी ने उन्हें लगाया और वहां भाजपा ने अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. इसके बाद पार्टी ने उन्हें पूर्वोत्तर में लगाया. राम माधव पूर्वोत्तर में लगातार काम करते रहे. जानकारों के मुताबिक उन्होंने हर राज्य में एक प्रभावी टीम बनाई. पार्टी के पास अगर स्थानीय कार्यकर्ताओं का अभाव था तो माधव ने दिल्ली और दूसरी जगहों पर रह रहे पूर्वोत्तर राज्यों को युवाओं को जोड़कर संगठन खड़ा किया. सुनील देवधर को त्रिपुरा प्रभारी बनवाने में राम माधव की भूमिका कही जाती है.

हेमंत बिस्वा सरमा

पूर्वोत्तर में भाजपा के विस्तार की पटकथा अगर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राम माधव तैयार कर रहे हैं तो इसका तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक उन्हें जमीन पर मजबूती से लागू करने वाला कोई न मिले. भाजपा को हेमंत बिस्वा सरमा के रूप में ऐसा सिपाही मिला जो दिल्ली के सेनापतियों की बात को बहुत प्रभावी ढंग से जमीन पर लागू कर सके. बिस्वा पहले कांग्रेस में थे और 2015 में उन्हें भाजपा अपने पाले में लाने में कामयाब हुई. बिस्वा को उस समय के कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बहुत भाव नहीं दे रहे थे और इस स्थिति का फायदा उठाते हुए अमित शाह उन्हें भाजपा में ले आए.

बिस्वा भाजपा के लिए कितने उपयोगी हैं और पार्टी के अंदर उनकी क्या हैसियत है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके भाजपा में आने के साल भर के अंदर ही जब पार्टी असम में पहली बार सरकार बनाने की स्थिति में आई तो वे मुख्यमंत्री पद के बड़े दावेदार बनकर उभरे. वे भले ही मुख्यमंत्री नहीं बन पाए लेकिन वे असम सरकार के ताकतवर चेहरे हैं.

भाजपा ने जो पूर्वोत्तर जनतांत्रिक गठबंधन बनाया है, बिस्वा उसके अध्यक्ष हैं. पूरे पूर्वोत्तर में राजनीतिक प्रबंधन करने की उनकी क्षमता है. भाजपा के नेता अनौपचारिक बातचीत में मानते हैं कि पिछले साल मणिपुर और इस साल मेघालय में संख्या बल नहीं होने के बावजूद भी अगर भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हुई तो इसकी सबसे बड़ी वजह हेमंत बिस्वा सरमा हैं. भाजपा के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘उनके होने से पूर्वोत्तर में चुनाव लड़ने के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को संसाधनों की भी कोई खास चिंता नहीं करनी पड़ती.’

सुनील देवधर

त्रिपुरा में वाम का किला ढहाने में सबसे बड़ी भूमिका सुनील देवधर ने निभाई. देवधर मूलतः महाराष्ट्र के हैं, लेकिन पूर्वोत्तर में उनके प्रभावी होने की वजह उनके साथ काम कर चुके लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक के तौर पर काम करने के उनके अनुभव को बताते हैं. नितिन गडकरी जब अध्यक्ष बने तो उनकी टीम में पूर्वोत्तर प्रकोष्ठ के अध्यक्ष के नाते सुनील देवधर शामिल हुए.

इसके बाद से उन्होंने लगातार पूर्वोत्तर के लोगों को पार्टी के साथ जोड़ने के लिए काम किया. उन्होंने ‘माय होम इंडिया’ के नाम से एक अभियान चलाकर देश के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे पूर्वोत्तर के छात्रों की मदद का काम किया. सुनील देवधर के एक सहयोगी बताते हैं कि इस अभियान के दौरान उनके संपर्क में उस क्षेत्र के कई अच्छे युवा आए और इनमें से कई बाद में पार्टी के कार्यकर्ता बने. इन युवाओं में से कई ने हालिया संपन्न चुनावों में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

पूर्वोत्तर के युवाओं के बीच देवधर का काम देखते हुए अमित शाह ने उन्हें 2014 में त्रिपुरा का प्रभारी बनाया. पूर्वोत्तर में काम करने की देवधर की प्रतिबद्धता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र का होने के बावजूद उन्होंने उत्तर पूर्वी राज्यों की तीन भाषाएं बोलने की क्षमता विकसित कर ली.

बिप्लब कुमार देब

त्रिपुरा के नए मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब पिछले दो दशक से अपने लिए राजनीतिक संभावनाएं दिल्ली में तलाश रहे थे. लेकिन त्रिपुरा के बिप्लब देब को वापस अपने गृह राज्य ले जाने का काम सुनील देवधर ने किया. देवधर ने जब त्रिपुरा प्रभारी के नाते काम शुरू किया तो उन्हें एक स्थानीय चेहरे की जरूरत महसूस हुई. उन्होंने इस भूमिका के लिए बिप्लब को ठीक समझा और बिप्लब देब को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को तैयार किया. बिप्लब 2016 की शुरुआत में प्रदेश अध्यक्ष बने तो भारतीय स्टेट बैंक में दिल्ली की संसद भवन शाखा में काम करने वाली उनकी पत्नी नीति को इस बात से बहुत आपत्ति थी कि बिप्लब को अब अगरतल्ला में रहना पड़ेगा और वे दिल्ली में उनके और अपने बच्चों के साथ नहीं रह पाएंगे.

लेकिन दो साल से थोड़े ही अधिक वक्त में उनके पति त्रिपुरा के मुख्यमंत्री हैं. जो राजनीतिक जगह तकरीबन 20 साल में दिल्ली में बिप्लब की नहीं बन पाई, उससे कहीं बड़ी जगह बिप्लब ने दो साल में अपने गृह राज्य में बना ली. त्रिपुरा में उनके साथ काम करने वाले एक सहयोगी कहते हैं, ‘सुनील देवधर के साथ मिलकर बिप्लब ने त्रिपुरा में दिन-रात एक करके मेहनत किया. दिल्ली में लंबे समय तक काम करने की वजह से उन्हें पेशेवर लोगों की एक टीम बनाने में सुविधा हुई. वहीं स्थानीय होने की वजह से जमीनी स्तर पर भी वे लोगों से संवाद स्थापित करने में कामयाब हुए.’