खुदरा महंगाई दर में कमी और औद्यो​गिक उत्पादन में बढ़ोतरी से केंद्र की मोदी सरकार ने सोमवार को राहत की सांस ली है. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने बताया है कि फरवरी में खुदरा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की वृृद्धि दर पिछले चार महीनों में सबसे कम यानी 4.44 फीसदी रह गई है. दूसरी ओर जनवरी में औद्योगिक उत्पादन में 7.5 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है. ऐसा विनिर्माण और पूंजीगत क्षेत्रों के बेहतरीन प्रदर्शन के चलते हुआ है.

सीएसओ की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी में खुदरा महंगाई दर में हुई कमी का मुख्य कारण सीपीआई में 46 फीसदी का हिस्सा रखने वाले खाद्य उत्पादों का सस्ता होना रहा है. पिछले महीने फलों को छोड़कर खाने-पीने के ज्यादातर उत्पाद जैसे सब्जियां, अंडे, दाल, चीनी, मिठाइयां आदि जनवरी की तुलना में कम महंगे हुए हैं. सब्जियों के मामले में तो यह आंकड़ा सबसे कम रहा है. यही वजह है कि फरवरी में खाद्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीएफपीआई) केवल 3.26 फीसदी की दर से बढ़ा जबकि जनवरी में यही आंकड़ा 4.70 फीसदी था.

इसका मतलब यह हुआ कि पिछले दो महीनों में खाने-पीने के उत्पादों की महंगाई दर 1.7 फीसदी कम हो गई है. वहीं इस दौरान सभी खुदरा उत्पादों की महंगाई दर 0.77 फीसदी घट गई है. इससे पहले नवंबर के 4.88 फीसदी की तुलना में दिसंबर में खुदरा महंगाई दर 5.21 फीसदी तक चली गई थी. लेकिन जनवरी और फरवरी में इसके कम होकर पूर्वानुमान के दायरे में जाने से आरबीआई और केंद्र सरकार दोनों ने निश्चित रूप से राहत की सांस ली है. इससे पहले दिसंबर में आरबीआई ने कहा था कि मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में खुदरा महंगाई दर 4.3 से 4.7 फीसदी के बीच रह सकती है. हालांकि उसका मध्यकालिक लक्ष्य इसे केवल चार फीसदी तक रखने का रहा है.

वैसे विश्लेषकों का मानना है कि ताजा आंकड़ों से मोदी सरकार को ज्यादा खुश नहीं होना चाहिए क्योंकि गर्मी के मौसम और कई दूसरी वजहों के चलते अप्रैल से महंगाई के फिर से बढ़ने का अंदेशा है. आरबीआई फरवरी की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में ही अनुमान जता चुका है कि वित्त वर्ष 2018-19 की पहली छमाही में खुदरा महंगाई दर 5.1 से 5.6 फीसदी के बीच रह सकती है.

उधर दिसंबर के बाद जनवरी में भी औद्योगिक उत्पादन बेहतर रहने के चलते कई जानकार कह रहे हैं कि अब आरबीआई पर विकास दर तेज करने का दबाव कम हो गया है. उनके अनुसार अब केंद्रीय बैंक का मुख्य लक्ष्य खुदरा महंगाई कम करना ही हो सकता है. दूसरी ओर कुछ जानकारों का मानना है कि लोकसभा चुनाव नजदीक होने से केंद्र सरकार भी महंगाई को नियंत्रित रखने की कोशिश करेगी. इसलिए ऐसे लोगों की राय है कि अप्रैल में होने वाली मौद्रिक नीति समिति की बैठक में ब्याज दरों में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है.

हालांकि ज्यादातर अर्थशास्त्रियों की राय इससे जुदा है. ऐसे लोगों का मानना है कि सीपीआई के आरबीआई के अनुमानित दायरे में रहने के चलते मौद्रिक नीति समिति की पांच और छह अप्रैल को मुंबई में होने वाली अगली बैठक में ब्याज दरों में शायद ही कोई बदलाव हो. इनके अनुसार आरबीआई अगस्त में ऐसा फैसला ले सकता है क्योंकि तब तक जून के आंकड़े आ जाने से उन वजहों का सही अंदाजा हो जाएगा जो महंगाई बढ़ा सकते हैं.

महंगाई बढ़ाने वाले खतरे

1. किसी भी आंकड़े के आकलन में आधार प्रभाव यानी बेस इफेक्ट की बड़ी भूमिका होती है. उदाहरण के लिए वित्त वर्ष 2017-18 की पहली छमाही में खुदरा महंगाई की औसत दर केवल 2.62 फीसदी थी. लेकिन इसके साल भर पहले (2016-17 की पहली छमाही में) यह इसके दोगुने से भी ज्यादा (5.42 फीसदी) थी. जानकारों के अनुसार चूंकि 2017 के अप्रैल से सितंबर के बीच सीपीआई अपेक्षाकृृत कम थी, इसलिए 2018 की समान अवधि में इसके ज्यादा रहने के आसार हैं. इसके चलते भी आरबीआई ने पहली छमाही में इसके 5.1 से 5.6 फीसदी रहने का अंदाजा लगाया है. हालांकि दूसरी छमाही में आधार प्रभाव के उच्च होने के अनुमान से वित्त वर्ष 2018-19 में अक्टूबर से मार्च के बीच खुदरा महंगाई पर अंकुश लगने की संभावना है.

2. केंद्र सरकार 2017-18 और 2018-19 में पहले से ज्यादा राशि खर्च करने जा रही है. इससे दोनों साल राजकोषीय घाटा (वह राशि जो सरकार की आय से ज्यादा खर्च होती है) पूर्व लक्ष्य से 0.3 फीसदी ज्यादा रहेगा. लोकसभा चुनाव के चलते राज्य सरकारों द्वारा भी ज्यादा खर्च किए जाने की संभावना है. इससे अगले कई महीनों तक बाजार में महंगाई के बढ़ने का अंदेशा है.

3. अगले खरीफ सीजन में फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) उनकी लागत का 110 फीसदी रखने के बजाय 150 फीसदी कर देने की घोषणा की गई है. सरकार के इस फैसले से वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी छमाही में फसलों के दाम पहले से एक तिहाई महंगे हो सकते हैं.

4. कच्चे तेल का दाम इस साल हालांकि लगभग 10 फीसदी गिरकर 65 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है. 2018 में इसकी कीमतों का औसत 60 डॉलर से ज्यादा रहने का अंदाजा है जो 2017 से करीब छह डॉलर ज्यादा होगा. इससे निश्चित तौर पर परिवहन और वस्तुओं के महंगा होने का खतरा बना हुआ है. तेल के महंगा होने से डॉलर की तुलना में रुपया भी कमजोर होने लगता है जिससे आयातित उत्पाद और महंगे हो जाते हैं.

5. इसके अलावा मानसून और केंद्र सरकार द्वारा घोषित भत्तों से भी खुदरा महंगाई के प्रभावित होने की संभावना है. अप्रैल के मध्य तक 2018 के मानसून के बारे में पहला पूर्वानुमान आने की संभावना है. जानकारों के अनुसार इसके बाद ही पता चल सकेगा कि इस साल मानसून का हाल कैसा रहेगा. इसके अलावा एक जुलाई, 2017 से सातवें वेतन आयोग के तहत घोषित आवासीय और अन्य भत्तों का भी खुदरा महंगाई पर असर पड़ने की आशंका है.