केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को चीन की सीमा पर चार बड़ी रेल लाइनें बिछानी हैं. ये रेल लाइनें रणनीतिक रूप से काफ़ी मायने रखती हैं. इन्हें बिछाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंज़ूरी भी मिल चुकी है. लेकिन सूत्रों की मानें तो अब तक सरकार ये रेल लाइन बिछाने की शुरूआत भी नहीं कर सकी है.

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक चीन की सीमा पर रेल लाइनें बिछाने के लिए दिसंबर 2015 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति (सीसीएस) से मंज़ूरी मिल चुकी है. इसके बाद दो साल पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भी इन परियोजनाओं को हरी झंडी दे दी. इसके बावज़ूद रेल मंत्रालय अब तक इन लाइनाें के लिए फाइनल लोकेशन सर्वे (एफएलएस) भी पूरा नहीं कर पाया है.

सूत्र बताते हैं कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में सीमाई इलाकों में आधारभूत ढांचे के लिए निर्माण के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति (ईसीबीआई) बनी हुई है. इस समिति की बैठकों में हमेशा इन रेल परियोजनाओं के मसले पर चर्चा होती है. लेकिन अब तक इन पर काम शुरू करने का कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका है. सूत्रों से यह भी पता चलता है कि इन परियोजनाओं में देरी की सबसे बड़ी वज़ह आर्थिक है. सरकार को ये रेल लाइनें बिछाने के लिए 2.1 लाख करोड़ रुपए की ज़रूरत है और इतने पैसे का इंतज़ाम हो नहीं पा रहा है.

ये रेल लाइनें बिछाए जाने पर इतने ख़र्च का अनुमान ख़ुद रेलवे ने ही लगाया है और उसने ही अपनी तरफ़ से इस रक़म के इंतज़ाम से हाथ खड़े कर दिए हैं क्योंकि ये रेल लाइनें व्यावसायिक तौर पर मुनाफ़े वाली नहीं हैं. यहां तक कि एफ़एलएस के लिए भी ज़रूरी 344.84 करोड़ रुपए रेलवे को 2016-17 में रक्षा मंत्रालय ने दिए हैं. इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने इन रेल परियोजनाओं पर काम शुरू न होने का मामला सीपीसीएफ़ (सेंट्रल परमानेंट कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क) में उठाया है. सीपीसीएफ़ में रेल मंत्रालय के प्रतिनिधि भी सदस्य होते हैं.

जो रेल लाइनें बिछाई जानी हैं उनमें बिलासपुर-मनाली-लेह लाइन सबसे लंबी (498 किमी) की है. इसके बाद मिसामारी-तेंगा-तवांग लाइन है जो 378 किमी लंबी है. इसके अलावा उत्तर लखीमपुर-बामे-सिलापठार लाइन की लंबाई 249 किमी है और पासीघाट-तेज़ू-रूपाई लाइन की 227.