उत्तर प्रदेश और गुजरात की राज्य सभा सीटें के लिए कड़ा और कड़वा संघर्ष होने वाला है. भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तरफ़ से इसका पूरा बंदोबस्त कर दिया है. राज्य सभा की खाली हो रही 50 से अधिक सीटों के लिए विभिन्न राज्यों में 23 मार्च को चुनाव हो रहे हैं.

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक उत्तर प्रदेश में राज्य सभा की 10 सीटों के चुनाव होने हैं. इनमें भाजपा को आठ सीटें आसानी से बिना किसी संघर्ष के मिल रही हैं. भाजपा ने पहले केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली सहित आठ ही उम्मीदवारों की घोषणा की भी थी. इससे बाकी दो सीटों में एक समाजवादी पार्टी और दूसरी बहुजन समाज पार्टी को मिल रही थी जिसे कांग्रेस का भी समर्थन हासिल है.

लेकिन सोमवार को भाजपा ने बाकी बची दो सीटों के लिए अपने तीन अतिरिक्त उम्मीदवारों- विद्यासागर सोनकर, सलिल विश्नोई और ग़ाज़ियाबाद के कारोबारी अनिल अग्रवाल के नाम की घोषणा कर सबको चौंका दिया. साथ में यह भी पक्का कर दिया कि इनमें से कम से एक सीट पर सपा और बसपा-कांगेस के बीच सीधा चुनावी मुकाबला हो. दरअसल भाजपा के अपने आठ अधिकृत उम्मीदवारों काे चुनने के बाद 28 अतिरिक्त वोट बच रहे हैं. और पार्टी नेताओं की मानें तो भाजपा इन वाेटों को यूं ही बर्बाद नहीं होने दे सकती.

इसी तरह भाजपा ने गुजरात में भी राज्य सभा चुनाव को संघर्षपूर्ण बना दिया है. भाजपा यहां चार में से दो सीटें जीत रही है. इनके लिए दो उम्मीदवार वह पहले ही घोषित कर चुकी है. लेकिन अब उसने राज्य के पूर्व मंत्री किरीट सिंह राणा को भी प्रत्याशी बना दिया है. ख़बरों के मुताबिक कांग्रेस के उम्मीदवार नारनभाई राठवा के नामांकन को लेकर हुई ग़फ़लत का भाजपा ने आख़िरी मौके पर फ़ायदा उठाने की योजना बनाई है.

दरअसल राठवा पूर्व लोक सभा सदस्य हैं. लिहाज़ा नामांकन दाख़िल करने वक़्त उन्हें संसद से हासिल किया गया ‘नो ड्यूज़’ सर्टिफ़िकेट भी लगाना था. लेकिन वह उनके पास नहीं था. इससे यह आशंका बनी कि उनका नामांकन ख़ारिज़ हो सकता है. इस आशंका के चलते कांग्रेस ने अपने एक अन्य राज्य सभा सदस्य राजीव शुक्ला को अहमदाबाद जाने के लिए कहा. उनका कार्यकाल भी जल्द ही ख़त्म होने वाला है. इसलिए उन्हें राठवा की जगह नामांकन दाख़िल करने का निर्देश दिया गया. लेकिन वे भी नहीं पहुंच सके.

ऐसे में भाजपा ने अपने तीसरे उम्मीदवार का पर्चा दाख़िल करा दिया. अब हालांकि कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि राठवा का कागज़ात सही हैं और संसद के ‘नो ड्यूज़’ की ज़रूरत होती नहीं है. फिर भी पार्टी ने ऐहतियातन निर्दलीय प्रत्याशी और पूर्व आईएएस पीके वलेरा को भी अपना समर्थन दे दिया है. इस तरह यहां भी पिछले साल अगस्त की तरह रोचक संघर्ष की भूमिका तैयार हो गई है. उस वक्त तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ऐसे ही कड़-कड़वे संघर्ष में बमुश्किल अपनी राज्य सभा सीट बचा पाए थे.