यह 25 फरवरी, 2015 की बात है जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने घोषणा की थी कि दोनों पार्टियों ने अपने वैचारिक मतभेद सुलझा लिए हैं. फिर छह दिन बाद जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी गठबंधन सरकार ने सत्ता संभाल ली. यह एक तरह से विरोधाभासों के गठबंधन की सरकार थी.

दोनों पार्टियां जिन क्षेत्रों और विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं, उससे उम्मीद जगी थी कि जम्मू और कश्मीर के बीच दूरियां कम होंगी, साथ ही नई दिल्ली और श्रीनगर भी करीब आएंगे. हालांकि ऐसा हुआ नहीं.

वहीं अब राज्य के वित्त मंत्री हसीब द्राबू को सरकार से बर्खास्त करके मुफ्ती ने दो संदेश दिए हैं : पहला यह कि गठबंधन में बढ़ते टकराव के बीच भाजपा को किसी तीसरे व्यक्ति को आगे करने के बजाय खुद उनसे बात करनी चाहिए. इस समय जब पीडीपी की क्षमता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं, मुफ्ती भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद अपनी पहचान कायम रखना चाहती हैं और यह संदेश भी देना चाहती हैं कि अपनी पार्टी की विचारधारा की लक्ष्मण रेखा वे खुद तय करेंगी.

द्राबू को उनके एक बयान के चलते मंत्रिपद से हटाया गया है. बीते नौ मार्च को उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर को राजनीतिक मसले की तरह नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि यह एक ऐसा समाज है जो अपनी सामाजिक समस्याओं से जूझ रहा है. पीडीपी के इस वरिष्ठ नेता का बयान अपनी पार्टी की मूल विचारधारा के विपरीत है, जिसके मुताबिक कश्मीर एक राजनीतिक मसला है और इसका समाधान भी राजनीतिक तौर से ही निकलना है. द्राबू का बयान कश्मीर को लेकर भाजपा की राय के ज्यादा करीब है और यह बात तब साबित भी हो गई जब राज्य में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से द्राबू का समर्थन किया.

एक वरिष्ठ मंत्री की बर्खास्तगी को महबूबा मुफ्ती द्वारा अपनी खोई राजनीतिक जमीन हासिल करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है. बीते समय में भाजपा को लेकर पीडीपी की असहजता बढ़ी ही है. मुफ्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु के बाद महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री पद स्वीकार करने में काफी वक्त लिया था और इसे देखते हुए गठबंधन का अस्तित्व खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा था. तीन साल बाद द्राबू की बर्खास्तगी पीडीपी की यह असहजता ही दिखा रही है.

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जम्मू-कश्मीर में गठबंधन की दोनों पार्टियों ने अपने मतभेद सुलझाने के बजाय उन्हें सार्वजनिक होने से रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है. कई मौकों पर भाजपा मुख्यमंत्री और सरकार के सहयोगी के बजाय उसे चुनौती देते हुए विपक्ष की भूमिका में आती रही है.

पिछले दिनों जब कठुआ में आठ साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार और उसकी हत्या का मामला सामने आया तब भाजपा के मंत्री आरोपित के पक्ष में खड़े दिखाई दिए. इन्होंने अपनी ही सरकार के कानून-प्रशासन पर सवाल उठाते हुए इस मामले की सीबीआई से जांच करवाने की मांग की थी. वहीं पिछले महीने ही शोपियां में सेना की गोलीबारी में मारे गए नागरिकों की जांच के सरकार के आदेश का भाजपा ने विरोध किया था. इन दोनों पार्टियों के बीच बुनियादी अंतर तब खासतौर पर जाहिर हुआ जब मुफ्ती ने कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत का समर्थन किया.

आज घाटी में जारी तनाव जम्मू, पूंछ और कठुआ तक दिखने लगा है. 2015 में जनता ने जिस तरह से दोनों पार्टियों को समर्थन दिया था, अगर उसका ईमानदारी से सम्मान नहीं होता तो यह निश्चित है कि गठबंधन टूटेगा ही, लेकिन इसके साथ जम्मू और कश्मीर के बीच खाई और बढ़ जाएगी. (स्रोत)