हाल में राजस्थान के मीणा समाज के कद्दावर नेता और विधायक किरोड़ी लाल मीणा ने भाजपा में फिर से शामिल होने का फैसला किया. वे करीब एक दशक पहले प्रदेश के गुर्जर समुदाय को एसटी कोटे में आरक्षण दिए जाने की बात पर भाजपा से नाराज हो गए थे. चूंकि राजनैतिक हलकों में रूठने-मनाने के सिलसिले चलते रहते हैं इसलिए अधिकतर लोगों के लिए यह एक आम घटना हो सकती है. लेकिन राजस्थान के राजनीतिकार जानते हैं कि मीणा के इस कदम से न सिर्फ सूबे का वर्तमान बल्कि आने वाला कल भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएगा.

राजस्थान देश के उन राज्यों में शामिल है जहां अरसे से सिर्फ भाजपा और कांग्रेस ही चुनावी अखाड़े में ताल ठोकती आई हैं. तीसरा मोर्चा इस मैदान से लगभग नदारद रहा है. लेकिन पिछले कुछ सालों से प्रदेश में किरोड़ी लाल मीणा को तीसरे विकल्प की धुरी के तौर पर देखा जाने लगा था. इसी बीच प्रदेश भाजपा के एक अन्य बागी विधायक और प्रभावशाली जाट समुदाय पर खासी पकड़ रखने वाले हनुमान बेनीवाल का साथ मिलने से मीणा को जबरदस्त मजबूती मिली. फिर हाल ही में जब इस जोड़ी को भाजपा के वरिष्ठ ब्राह्मण विधायक घनश्याम तिवाड़ी का अंदरखाने समर्थन हासिल होने की खबरें आईं तो प्रदेश में तीसरे मोर्चे की संभावनाएं प्रबल हो गईं. तिवाड़ी भी इन दोनों की तरह पार्टी के प्रदेश नेतृत्व से खासे नाराज हैं.

जानकार मानकर चल रहे थे कि 2018 में होने वाले विधानसभा चुनावों में इस जाट-मीणा-ब्राह्मण तिकड़ी के साथ उतरने से भाजपा को खासी चुनौती मिलेगी. लेकिन ऐन मौके पर मीणा को अपने साथ लेकर या कहें कि तोड़कर भाजपा ने विरोधियों के इस मंसूबे पर पानी फेर दिया है.

सवाल उठता है कि अपने अलग वजूद और जनाधार के बावजूद किरोड़ी लाल मीणा जैसे बड़े नेता को आखिरकार किसी स्थापित संगठन से जुड़ने का फैसला क्यों करना पड़ा है. प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘किसी भी राज्य की राजनीति में लंबे समय तक टिके रहने के लिए एक नेता की स्वीकार्यता पूरे प्रदेश में होनी चाहिए खासतौर पर जब उसका ख्वाब मुख्यमंत्री बनने का हो.’ वे आगे कहते हैं, ‘राजस्थान में यह तभी हो सकता है जब आप या तो ऐसे समुदाय से ताल्लुक रखते हों जो पूरे प्रदेश में लगभग एकसार फैला हो या फिर आपका संगठन इतना बड़ा हो. और किरोड़ी लाल मीणा के साथ ये दोनों ही बातें नहीं थीं.’

किरोड़ी लाल राजस्थान के पूर्वी भाग से ताल्लुक रखते हैं जो मीणा बाहुल्य क्षेत्र है. इस क्षेत्र में उनकी पकड़ इस बात से समझी जा सकती है कि 2013 के विधानसभा चुनावों में मोदी लहर के बावजूद उनके संगठन ‘एनपीपी’ ने यहां से चार सीटें जीती थीं और 10 से ज्यादा सीटों पर उनके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे थे. लेकिन यदि इस इलाके के अलावा बात करें तो बाकी राजस्थान में किरोड़ी लाल का कुछ खास प्रभाव नहीं दिख रहा था. यहां तक कि आदिवासी बेल्ट माने जाने वाले दक्षिणी राजस्थान (जहां मीणा समुदाय खासी संख्या में है) में भी वे दखल तो रखते थे लेकिन निर्णायक स्थिति में नहीं आ पा रहे थे. जानकारों के मुताबिक हनुमान बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी के साथ आ जाने से जीत के आंकड़े निश्चित तौर पर बढ़ तो जाते लेकिन तब भी खींचतान कर इस गणित के 50 सीटों के इर्द-गिर्द ही रहने की संभावनाएं जताई जा रहीं थीं.

विश्लेषक बताते हैं कि 10 साल तक वनवास झेल चुका एक बड़ा नेता कभी न कभी तो सरकार में आना ही चाहेगा और इसके लिए मीणा को राजस्थान में किसी न किसी प्रमुख दल का सहारा लेना पड़ता. वैसे 2008 में भाजपा छोड़ने के बाद किरोड़ी लाल मीणा कुछ समय के लिए कांग्रेस से भी जुड़े थे. तब उनकी पत्नी गोलमा देवी को तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी कैबिनेट में भी शामिल किया था. लेकिन किन्हीं कारणों से मीणा की यहां भी अनबन हो गई और उन्होंने पार्टी का साथ छोड़ दिया. अब-जब दोनों पार्टियां इस मामले में मीणा के लिए बराबरी पर थीं तो उन्होंने आरएसएस से लंबे समय तक जुड़े रहने की वजह से स्वाभाविक झुकाव के तौर पर भाजपा को चुना.

दूसरे, कुछ जानकारों के मुताबिक किरोड़ी लाल मीणा मानते हैं कि राजस्थान में चाहे जो हो लेकिन केंद्र की सत्ता में एक बार फिर भाजपा के ही लौटने की पूरी संभावना है. ऐसे में उन्हें जब पार्टी की तरफ से राज्यसभा जाने का मौका मिला तो उन्होंने इसे जाने नहीं दिया. सूत्रों का कहना है कि राजस्थान में ऊंच-नीच होने की स्थिति में मीणा ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने की शर्त पर ही भाजपा का हाथ थामा है.

हालांकि यह एक अलग चर्चा का विषय है कि राजस्थान में हिचकोले लेती भाजपा की नाव को मीणा कितना सहारा दे पाएंगे. लेकिन जानकारों का कहना है कि प्रदेश में चुनावी बयार बहना शुरु हो गई है जिसमें कई लोग अपना पाला बदलेंगे. वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषक नारायण बारहेठ इस आयाराम-गयाराम की राजनीति के दौर को एक खतरनाक ट्रेंड मानते हैं. उनके शब्दों में ‘जब नेता जनता के बजाय सिर्फ अपना भला-बुरा सोचता है और बिना किसी सैद्धांतिक कारण के एक पार्टी से अलग होता है या जुड़ जाता है तो न सिर्फ उसके सम्मान में कमी आती है बल्कि एक आम वोटर भी खुद को ठगा सा महसूस करता है.’

वैसे यह कहानी सिर्फ राजस्थान की नहीं है. हाल ही में उत्तर प्रदेश से भी खबर आई है कि व्हिस्की में विष्णु और रम में राम बताने वाले समाजवादी पार्टी के नेता नरेश अग्रवाल भी अब भाजपा का दामन थाम लिया है. वे भी कांग्रेस, बसपा, सपा आदि पार्टियों से गुजकर भाजपा में पहुंचे हैं. शायद इसलिए ही कई चुटकी लेते हुए कहते हैं कि यह राजनीति के ‘भूमंडलीकरण’ का दौर है.