आइंस्टीन इस दुनिया में 14 (1879) मार्च को आए थे, और इसी तारीख ने साल 2018 में हमसे हॉकिंग को छीन लिया. इस 139 साल की ‘ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ में भौतिकी की दुनिया के बहुत बड़े बदलाव दर्ज़ हैं. प्रॉफेसर स्टीफन हॉकिंग को किसी परिचय की ज़रूरत नहीं है. ब्लैक होल और रिलेटिविटी पर पर अपने काम के लिए विख्यात हॉकिंग ने पिछले साल अपनी डॉक्टोरल थीसिस को दुनिया भर के लिए उपलब्ध कराते समय कहा था, ‘मैं लोगों को प्रेरित करना चाहता हूं कि वे अपनी नज़र आसमान के सितारों पर रखें, नीचे, अपने पांवों पर नहीं.’ और उम्र का एक बड़ा हिस्सा अपने पांवों को ज़मीन पर रखे बगैर गुज़ारने वाले इस थ्योरिटिकल फिज़िसिस्ट ने अपनी इस बात को ताउम्र जिया भी.

आठ जनवरी 45 को ऑक्सफर्ड, इंग्लेंड में पैदा हुए हॉकिंग 1963 में महज़ 21 साल के थे जब उन्हें अपनी मोटर न्यूरोन डिजीज, अमायोट्रोपिक लेटरल स्क्लेरोसिस के बारे में पता चला. इस बीमारी में मांस-पेशियों को संचालित करने वाले मोटर न्यूरॉन जो दिमाग और मेरुदंड से जुड़े होते है, नष्ट होना शुरू हो जाते हैं. आम तौर पर इस बीमारी का मरीज़ चार से पांच साल तक जीता है. लेकिन अगर मरीज़ की सांस लेने और खाना निगलने में मदद करने वाली मांस-पेशियों को संचालित करने वाले न्यूरॉन नष्ट न हों तो उसके अधिक समय तक ज़िंदा रहने की उम्मीद बढ़ जाती है.

अधिकतर न्यूरॉन्स के खराब होने के कारण हॉकिंग के शरीर का ज़्यादातर हिस्सा निष्क्रिय हो गया था पर खुशकिस्मती से उनके वे न्यूरॉन बचे रहे जो उन्हें सांस लेने और खाना निगलने में मदद कर रहे थे. वरना स्थिति यह थी कि वे व्हीलचेयर पर तो थे ही, बोलने के लिए भी वे अपनी सिर्फ एक मांसपेशी से जुड़ी स्पीच मशीन पर ही निर्भर थे. लेकिन अपने आखिरी दिनों तक वे काम करते रहे.

14 मार्च के शुरूआती घंटों में दुनिया छोड़ देने वाले इस सितारे को दुनियाभर में याद किया जा रहा है. कुछ वैसे ही जैसे वे चाहते थे. ज़्यादातर लोग उनकी प्रेरणास्पद बातों और उनके खुद पर असर को याद करते हुए उनके बारे में लिख रहे हैं.

उनके तीनों बच्चों लूसी, रॉबर्ट और टिम ने एक संयुक्त बयान में कहा, ‘वे एक महान वैज्ञानिक और असाधारण व्यक्ति थे, जिनके काम और परंपरा बहुत सालों तक जीवित रहेंगे. उनकी दृढ़ता, हिम्मत, बुद्धिमत्ता, और हाज़िर जवाबी ने हमेशा दुनिया भर को प्रभावित किया है. उन्होंने एक बार कहा था, ये दुनिया दुनिया नहीं होती, अगर इसमें वे लोग नहीं होते जिन्हें आप प्यार करते हैं. हम उन्हें हमेशा याद करेंगे.’

नासा, कैंब्रिज, ऑक्सफर्ड, रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी आदि ने तो इस महान वैज्ञानिक को श्रद्धांजलि दी ही, दूसरे विशिष्ट लोगों के साथ आम लोग भी उनके चले जाने के दुख को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं. यहां तक कि आर्कबिशप ऑफ कैंटरबरी (चर्च ऑफ इंग्लैंड के प्रधान) ने भी ट्विटर पर लिखा, ‘प्रोफेसर हॉकिंग का विज्ञान के प्रति योगदान वैसा ही अथाह था जैसा यह ब्रह्मांड जिस पर शोध के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया. हम उन सभी के लिए प्रार्थना करते हैं जो उनके निधन से दुखी हैं. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे.’ आर्कबिशप की यह श्रद्धांजलि इसलिए भी खास हो जाती है क्योंकि स्टीफन हॉकिंग ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे.

उन्होंने मृत्यु के बाद जीवन के बारे में 2011 में गार्जियन को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, ‘मेरे लिए दिमाग एक ऐसे कंप्यूटर की तरह है जिसके कलपुर्जे खराब हो जाने पर वह काम करना बंद कर देगा. खराब हो चुके कंप्यूटर्स के लिए कोई दूसरा जन्म या स्वर्ग नहीं होता. ये सब अंधेरे से डरने वाले लोगों के लिए रची परीकथा है.’

उसी साक्षात्कार में मृत्यु के बारे में उन्होंने कहा, ‘मुझे मौत से डर नहीं लगता. पर मुझे मरने की कोई जल्दी नहीं है. उससे पहले मेरे पास बहुत काम है, जिन्हें मैं कर लेना चाहता हूं.’

मशहूर साइंस कम्युनिकेटर हाशिम अल गाइली ने सोशल मीडिया पर लिखा है, ‘श्रद्धांजलि, स्टीफन हॉकिंग. हमने एक महान मस्तिष्क और एक असाधारण इंसान को खो दिया है.’ उन्होंने एक पोस्टर में स्टीफन हॉकिंग के हवाले से यह भी लिखा है कि ‘एक. याद रखो कि तुम्हें नीचे पांवों की तरफ नहीं, ऊपर सितारों की तरफ देखना है. दो. काम कभी मत छोड़ो क्योंकि काम आपके जीवन को अर्थ और उद्देश्य देता है. इसके बिना ज़िंदगी खाली है. तीन. अगर आप इतने खुशकिस्मत हैं कि आपको अपना प्यार मिल गया है तो इसे कभी खुद से दूर मत जाने दो.’

बाकी दुनिया की तरह हिंदुस्तान में भी स्टीफन हॉकिंग को उतने ही सम्मान के साथ याद किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके उन्हें श्रृद्धांजलि दी है और कहा है कि पूरी दुनिया को उनकी लगन और दृढ़ता ने प्रेरित किया है. वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने ट्विटर पर लिखा, ‘हम चुनावों के विश्लेषण में व्यस्त हैं, पर शायद हमें इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण घटना पर ध्यान देना चाहिए. हमारे समय के महान लोगों में से एक स्टीफन हॉकिंग, जो हिम्मत और बुद्धिमत्ता की मिसाल थे, दुनिया से चले गए है. श्रद्धांजलि.’

गीतकार और पटकथा लेखक वरुण ग्रोवर का कहना है, ‘अलविदा मेरे पहले (और शायद अंतिम) हीरो. मुझे फिज़िक्स से कभी प्यार नहीं होता और मेरा भाई कभी एक फिज़िसिस्ट नहीं बनता अगर आपके स्पष्ट और उत्साहित करने वाले लेख हम बच्चों के लिए एक नई दुनिया के दरवाज़े नहीं खोलते. हमारे समय की ‘ब्रीफ हिस्ट्री’ आपको हमेशा बहुत प्यार से याद रखेगी.’

जलवागाह नाम के एक ट्विटर हैंडल ने उनके एक विचार के साथ उन्हें आखिरी अलविदा कहा - ‘मुझे आश्चर्य होता है कि हम भौतिकी, अंतरिक्ष, ब्रह्माण्ड, जीवन-दर्शन, हमारे उद्देश्य और गंतव्य के प्रति इतने उदासीन कैसे हो सकते हैं. संसार बहुत रोमांचक है अपना कौतूहल बनाए रखिये : स्टीफन हॉकिंग.’

पेशे से इंजीनियर नीतू शर्मा ने फेसबुक पर लिखा है, ‘स्टीफन हॉकिंग का जन्म आठ जनवरी को हुआ जिस तारीख को गैलीलियो की मौत हुई. और उन्होंने ठीक उस दिन दुनिया छोड़ी जिस दिन आइंस्टीन का जन्म हुआ था.’

डॉक्टर बाबा साहिब अंबेडकर रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की विदुला सोनाग्रा ने लिखा, ‘अलविदा स्टीफन हॉकिंग. दुनिया आपको सिर्फ ब्रह्मांड विज्ञान (कॉस्मोलॉजी) में आपके योगदान के लिए ही नहीं, आपकी वैज्ञानिक परंपरा, युद्ध-विरोधी विचारों और मानवीय मूल्यों के लिए भी याद रखेगी.’

हॉकिंग को याद करने वालों की लिस्ट लंबी है और बढ़ती ही जा रही है. लेकिन हम आखिर में आपको बताना चाहेंगे पीटर गज़ार्डी हॉकिंस को कैसे याद किया है. गज़ार्डी हॉकिंग के संपादक रहे हैं. हॉकिंग की किताब ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ के छपने से पहले के वक्त को याद करते हुए पीटर द गार्जियन के लिए लिखते हैं, ‘मैंने सबसे पहले हॉकिंग को न्यू यॉर्क टाइम्स के कवर पर देखा. फिर जिस दिन उनका आर्टिकल पढ़ा तो उनका ज़िक्र मैंने एजेंट एल ज़करमैन से किया. ज़करमैन ने बताया कि वे पहले ही हॉकिंग को छापने के लिए उनसे संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे.’

वे लिखते हैं कि कुछ दिनों बाद मुझे एक छोटी मेनुस्क्रिप्ट के साथ ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ के प्रकाशन अधिकार के लिए लगने वाली बोली में जाने का न्योता मिला. ‘उन दिनों मैं बैंटम बुक्स का वरिष्ठ संपादक था. और क्योंकि ऑक्शन में तमाम प्रतिष्ठित और परंपरागत प्रकाशक समूह आने वाले थे तो हमें उसे छापने का मौका मिलने के आसार न के बराबर थे. पर हम पॉपुलर पेपरबैक्स छाप रहे थे. और किताबों की दुकानों से कहीं आगे जाकर हम अपनी किताबें, दवा की दुकानों, सुपर मार्केट्स और हवाई अड्डों पर बेच रहे थे. मैंने प्रोफैसर हॉकिंग को अपने ऑफर के साथ एक चिट्ठी लिखी. ये बताते हुए कि बैंटम उनकी किताबों को ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक ले जा सकता था. और उन्होंने हमें चुन लिया.’

हॉकिंग ने न सिर्फ ब्लैक होल पर थ्योरी दी, उन्होंने 15 किताबें भी लिखीं, जो एक आम पाठक को इस ब्रह्मांड को समझने में मदद करती हैं. उनके प्रेरणादायी जीवन पर ‘थ्योरी ऑफ एव्रीथिंग’ नाम से फिल्म भी बनी है. इसके लिए स्टीफन हॉकिंग की भूमिका निभाने वाले एडी रेडमेन को 2015 के ऑस्कर से नवाज़ा गया.