बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशी राम के जन्मदिन से एक दिन पहले उत्तर प्रदेश की दो महत्वपूर्ण लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे घोषित हुए. देश की सियासत में कांशी राम की पहचान दलितों और पिछड़ों की राजनीति को एक नया आयाम देने वाले नेता की रही है. उनके जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले आए उपचुनावों के ये नतीजे भी पिछड़ों और दलितों की राजनीति को नई दिशा देने का आभास कराने वाले हैं.

दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की जीत ने करीब-करीब यह पक्का कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में भी आने वाले दिनों में महागठबंधन दिखने वाला है. 2014 में भारतीय जनता पार्टी की जबर्दस्त कामयाबी के बाद 2015 में बिहार में महागठबंधन का सफल प्रयोग हुआ था. लेकिन नीतीश कुमार के भाजपा का दामन थामते ही 2017 में वह बिखर गया. इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश में धुर विरोधी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के महागठबंधन की चर्चा भी चलती रही है. बिहार की तरह ही उत्तर प्रदेश के महागठबंधन में भी कांग्रेस की भूमिका सहयोगी के तौर पर देखी जा रही थी. लेकिन यह बात अब तक बहुत आगे बढ़ नहीं पा रही थी.

ऐसे में उपचुनाव सपा और बसपा के लिए महागठबंधन के ‘फील्ड ट्रायल’ का एक अवसर लेकर आए. समर्थन के लिए बसपा को मनाने में लगे सपा के एक नेता बताते हैं कि उपचुनाव की वजह से मायावती भी महागठबंधन के प्रयोग को आजमाने को तैयार हो गईं. उन्हें यह समझाया गया कि उनकी पार्टी तो वैसे भी उपचुनाव नहीं लड़ती. ऐसे में अगर बसपा के दूसरे नेता यह बयान दें कि वह इन उपचुनावों में सपा का साथ देगी तो इससे उन्हें और उनकी पार्टी को सिर्फ फायदा होगा, नुकसान नहीं. उन्हें समझाया गया कि अगर यह प्रयोग असफल रहता है तो बसपा यह कहकर अपना बचाव कर सकती है कि वह तो उपचुनाव लड़ती नहीं और सपा का साथ देने का निर्णय स्थानीय नेताओं का था.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं और समाजवादी पार्टी दोनों लोकसभा सीटें जीत गई. इनमें गोरखपुर की सीट तो ऐसी है जहां 29 साल बाद भाजपा हारी है. चाहे लहर किसी की भी रही हो, 1989 से लेकर इस उपचुनाव के पहले तक गोरखनाथ पीठ के प्रमुख ही इस सीट से सांसद बने रहे. पहले महंथ अवैद्यनाथ और बाद में योगी आदित्यनाथ. पहली बार इस सीट पर भाजपा ने मठ से बाहर के किसी व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया और केंद्र और राज्य में अपनी सरकार होने के बावजूद उसे यहां पर मुंह की खानी पड़ी.

इसके उलट फूलपुर भाजपा की पारंपरिक सीट नहीं है. 2014 में पहली बार उसे इस सीट पर सफलता मिली थी. तब उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य यहां से जीते थे. उस वक्त केशव प्रसाद मौर्य को कुल 52.43 फीसदी वोट मिले थे. फिर भी इस उपचुनाव में भाजपा यहां से नहीं जीत सकी. अतीक अहमद के निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कुछ मुस्लिम वोट काटने के बावजूद यहां से सपा चुनाव जीत गई.

इसका मतलब बिल्कुल साफ है. दो बिल्कुल अलग-अलग तरह की सीटों पर सपा-बसपा के साथ का प्रयोग सफल हो गया है. कई राजनीतिक विश्लेषक पिछले साल हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मुस्लिम समाज के वोटों के पूरी तरह बंट जाने को भी भाजपा की ऐतिहासिक कामयाबी की बहुत बड़ी वजह मानते हैं.

पिछले लोकसभा चुनावों के आंकड़ों का अध्ययन करने वाले जानकारों का मानना है कि अगर सपा और बसपा के वोट एक साथ जोड़ दें तो 2014 में भाजपा और उसके सहयोगियों को 73 नहीं बल्कि 35 सीटें मिली होतीं. उपचुनाव के नतीजों ने भी सपा-बसपा के एक साथ होने की ताकत को दिखा दिया है. लेकिन महागठबंधन तो तब बनेगा जब कांग्रेस भी इसमें हो और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल के अजित सिंह भी इसकी हिस्सा हों.

हालांकि इन उपचुनावों में कांग्रेस ने भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे लेकिन इनके नतीजे आने से ठीक एक दिन पहले सोनिया गांधी ने विपक्षी नेताओं से मुलाकात भी की थी. इनमें सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोक दल के नेता शामिल थे. इससे साफ है कि अब महागठबंधन बनाने की कोशिशों में तेजी आने वाली है. अगर कांग्रेस भी इसमें शामिल हो जाती है तो जिन सीटों पर वह अगड़ी जातियों के उम्मीदवार खड़ा करेगी, उन पर महागठबंधन को उनका भी वोट मिल सकता है. ऐसे ही पश्चिम उत्तर प्रदेश में कुछ सीटों पर अजित सिंह महागठबंधन को ताकत दे सकते हैं.

उत्तर प्रदेश में भाजपा के साथ दो छोटे दल भी हैं. महागठबंधन के शिल्पकार इन्हें भी भाजपा से तोड़कर अपने पाले में लाने की कोशिश करते दिखें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. अगर आने वाले कुछ महीनों में महागठबंधन आकार लेता दिखता है तो उत्तर प्रदेश के विभिन्न दलों से भाजपा में गए कई दलबदलू नेता भी अपनी मूल पार्टियों में वापस आ सकते हैं.

सपा-बसपा के एक साथ आने की सबसे बड़ी समस्या गेस्टहाउस कांड को माना जाता है. लेकिन आज की सपा में उस ‘कांड’ में शामिल रहा कोई नेता बचा ही नहीं हैं. ऐसे में इन उपचुनावों ने विपक्ष के सामने महागठबंधन बनाने की पृष्ठभूमि तैयार कर दी है. अब इससे आगे यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अखिलेश यादव, मायावती, राहुल गांधी और अजित सिंह एक-दूसरे के लिए इस महागठबंधन में कितनी गुंजाइश छोड़ने के लिए तैयार हैं.