उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री और केशव प्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बन जाने के बाद खाली हुई लोकसभा की दोनों सीटें भाजपा समाजवादी पार्टी के हाथों हार गई. भाजपा को गोरखपुर में 21,881 और फूलपुर में 59,613 मतों से हार का सामना करना पड़ा है.

आइए ऐसे पांच कारणों की पड़ताल करते हैं जिन्हें जानकार भाजपा की हार और सपा की जीत का कारण मान रहे हैं.

1. सपा और बसपा का एकजुट होना - बसपा ने उपचुनाव के लिए 11 मार्च को होने वाले मतदान के ठीक एक हफ्ते पहले चार तारीख को सपा को समर्थन देने का ऐलान कर सबको चौंका दिया था. ज्यादातर जानकार ताजा नतीजे का मुख्य कारण इस सहयोग को ही मान रहे हैं. इस एकता ने इनके समर्थकों को जीत के भरोसे से भर दिया जिसके बाद इन्होंने सपा उम्मीदवारों से इतर किसी अन्य प्रत्याशी पर भरोसा नहीं किया.

गोरखपुर उपचुनाव में भाजपा को 47 फीसदी मत मिले हैं जबकि बसपा के सहयोग से सपा ने यहां 51 फीसदी मत हासिल किये हैं. इस तरह ताजा चुनाव में भाजपा अपने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के घर में सपा से चार फीसदी मतों से पीछे रह गई है. दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इलाके फूलपुर में सपा ने भाजपा को आठ फीसदी मतों से पीछे छोड़ दिया है. वहां सपा को 47 फीसदी जबकि भाजपा को केवल 39 फीसदी मत मिले हैं.

हालांकि चार साल पहले इन दोनों ही जगहों के हालात एकदम अलग थे. 2014 में गोरखपुर में भाजपा ने 51.8 फीसदी मत प्राप्त किए थे जबकि सपा और बसपा के हिस्से में कुल 38.7 फीसदी मत ही आए थे. उस समय फूलपुर में भाजपा की झोली में 52.4 फीसदी मत गए थे जबकि सपा-बसपा को मिलाकर 37 फीसदी वोट ही डाले गए थे. उस समय यह हाल लगभग पूरे उत्तर प्रदेश का था.

2014 में सपा-बसपा को राज्य में कुल 42.12 फीसदी (सपा 22.35 और बसपा 19.77) मत मिले थे. हालांकि इनके अलग-अलग चुनाव लड़ने का लाभ उठाकर भाजपा ने इस आंकड़े से केवल 1.5 फीसदी ज्यादा मत लाकर 80 में से 73 लोकसभा सीटें अपनी झोली में डाल ली थी. दूसरी ओर 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा ने अलग-अलग 50 फीसदी से भी ज्यादा मत हासिल किए थे. लेकिन इनके एक साथ चुनाव न लड़ने की वजह से नौ फीसदी कम मत पाकर भी भाजपा तीन चौथाई से ज्यादा विधानसभा सीटें जीतने में कामयाब रही थी.

2. भाजपा के खिलाफ दोहरे एंटी-इन्कम्बेन्सी फैक्टर का होना - कई जानकार भाजपा की ताजा हार का कारण केवल सपा-बसपा गठजोड़ के बजाय केंद्र और राज्य की सत्ता पर विराजमान भाजपा से नाराजगी को भी मान रहे हैं. इनके अनुसार खेती-किसानी की समस्या से परेशान किसानों और रोजगार की आस में दर-दर ठोकर खा रहे युवाओं ने भाजपा के विरोध में मत डालकर अपना रोष जताया है. वहीं राज्य में कई जगहों पर दलितों पर हुए हमले और सांप्रदायिक दंगों से भी मतदाताओं को नाराज बताया जा रहा है. कुछ पत्रकारों ने तो यह भी कहा है कि उन्होंने रिपोर्टिंग के दौरान लोगों को यह कहते भी सुना कि भाजपा आरक्षण छीन सकती है लिहाजा वे उसे अपना वोट नहीं देना चाहते हैं. यही वजह है कि इस बार भाजपा के वोट गोरखपुर में करीब पांच फीसदी और फूलपुर में 13 फीसदी से ज्यादा घट गए हैं. इसके चलते कई लोग फूलपुर की हार को गोरखपुर से ज्यादा खराब मान रहे हैं. हालांकि ज्यादातर लोग 29 सालों से अजेय रही गोरखपुर सीट पर हुई हार को ज्यादा बुरा बता रहे है.

3. इस बार गोरखपुर में केवल 43 फीसदी जबकि फूलपुर में 37 फीसदी मतदाताओं ने अपने मत का इस्तेमाल किया है. शहरी इलाकों में इससे भी कम वोट डाले गए हैं. वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में पूरे राज्य में 61 फीसदी लोगों ने मतदान किया था. फूलपुर संसदीय सीट में पड़ने वाली इलाहाबाद उत्तरी विधानसभा के इलाके में इस उपचुनाव में सिर्फ 21 फीसदी के आसपास वोट पड़े हैं. चूंकि शहरी इलाके भाजपा का गढ़ माने जाते हैं इसलिए वहां मतदान का कम होना निश्चय ही भाजपा के लिए नुकसानदेह रहा होगा. कई जानकार 2004 में फूलपुर में मुरली मनोहर जोशी की हार का कारण भी कम मतदान को ही मानते थे.

4. इसके अलावा भाजपा संगठन की सुस्ती और गुटबाजी को भी उसकी हार का कारण माना जा रहा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बुधवार को कहा कि उनके कार्यकर्ता थोड़े संतुष्ट से हो गए थे जिसका खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा है. केशव प्रसाद मौर्य ने कहा, ‘हमें नहीं लगता था कि मायावती के वोटर अखिलेश यादव के पक्ष में इतनी मजबूती से खड़े होंगे लेकिन ऐसा हुआ है.’ हालांकि गुटबाजी को पार्टी का कोई नेता मानने को तैयार नहीं है लेकिन कई जानकार इसे भी एक कारण मान रहे हैं. बताया जाता है कि गोरखपुर के भाजपा प्रत्याशी मुख्यमंत्री की पसंद के नहीं थे. दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य के बीच टकराव को भी फूलपुर की हार की वजह माना जा रहा है.

5. कई जानकार फ्लोटिंग वोटरों को भी इस नतीजे के लिए जिम्मेदार बता रहे हैं. इनके अनुसार 2014 में मोदी लहर के बावजूद सपा और बसपा के साथ जुड़े रहने वाले को उसका कोर वोटर मान सकते हैं. गोरखपुर में ऐसे लोग 38.7 फीसदी रहे हैं जबकि फूलपुर में 37 फीसदी. लेकिन इस बार इन दोनों ही जगहों पर सपा-बसपा के वोटों में क्रमश: 13 और 10 फीसदी का इजाफा हुआ है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ऐसा बदले हालात को देखकर मत डालने वाले मतदाताओं के चलते हुआ है.