एक साल राजनीति में काफी लंबा अरसा होता है. आज से ठीक एक साल पहले भाजपा की अगुवाई में एनडीए ने उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 में से 325 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था. पार्टी का यह प्रदर्शन राज्य में उसके लोक सभा चुनाव के प्रदर्शन के मुताबिक ही था. तब एनडीए को 80 में से 71 लोक सभा सीटों पर जीत मिली थी. इस तरह अगर 2014 पहला संकेत था कि भाजपा देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक पार्टी है तो 2017 में विधानसभा चुनाव से इस बात की फिर पुष्टि हुई थी.

यही वजह है कि बुधवार को दो सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा की हार खासी महत्वपूर्ण मानी जा रही है. इस समय में केंद्र में भाजपा की सरकार है. उत्तर प्रदेश में भी वही सत्ता में है. इन परिस्थितियों के बीच मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री द्वारा छोड़ी गई सीटों – गोरखपुर और फूलपुर में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है. देश में अब तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं था जब किसी मुख्यमंत्री द्वारा छोड़ी गई लोक सभा सीट पर उसकी पार्टी चुनाव हारी हो.

हालांकि यहां गोरखपुर से ही जुड़ा हुआ एक दिलचस्प उदाहरण जरूर मौजूद है जब 1971 में तत्कालीन मुख्यमंत्री टीएन सिंह ने मनिराम विधान सभा सीट पर हुआ उपचुनाव हार गए थे और उन्हें पद छोड़ना पड़ा था. सालों बाद यही कहानी झारखंड में शिबू सोरेन के साथ भी दोहराई गई थी.

इसमें कोई दोराय नहीं कि उपचुनाव को आमचुनाव की तरह नहीं देखा जा सकता. लेकिन फूलपुर सीट पर करीब 60 हजार वोटों और गोरखपुर में करीब 22 हजार वोटों से भाजपा की हार दिखाती है कि अब पार्टी पर ‘संतुलन का नियम’ लागू हो रहा है. यानी कि अतीत में पार्टी यहां अपने पक्ष में प्रचंड लहर देख चुकी है और अब उसकी स्थिति नीचे ही आनी है.

यहां भाजपा की हार का सीधा और पहला कारण तो यही जान पड़ता है कि समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने मिलकर यह चुनाव लड़ा था. लेकिन सत्ताधारी पार्टी की हार का यह अकेला कारण नहीं है. 2014 के लोक सभा चुनाव में गोरखपुर सीट पर भाजपा को 51.8 प्रतिशत वोट मिले थे. वहीं बसपा और सपा दोनों के कुल मिलाकर 39.6 प्रतिशत वोट थे. वहीं पिछले आम चुनाव में फूलपुर में भाजपा को 52.43 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि सपा-बसपा को 37.38 प्रतिशत वोट मिले थे. ये आंकड़े बताते हैं कि ताजा चुनाव में मतदाताओं का निर्णायक रुझान सपा और बसपा के पक्ष में रहा है.

हालांकि इसकी एक वजह कम मतदान भी हो सकता है. इस बार गोरखपुर में 47 तो फूलपुर में महज 37 प्रतिशत मतदान हुआ है. क्या इसका एक मतलब यह भी है कि भाजपा का परंपरागत मतदाता इस बार अति-आत्मविश्वास में था कि उसकी पार्टी तो यह चुनाव आसानी से जीत लेगी?

इन नतीजों की एक वजह नोटबंदी और जीएसटी भी हो सकती है. इन दोनों की वजह से छोटे व्यापारियों को काफी तकलीफ झेलनी पड़ी है. नोटबंदी के बाद खेती-किसानी पर आया संकट आज भी पूरी तरह दूर नहीं हुआ है और उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे भारत में इसने किसानों में आक्रोश पैदा किया है.

वहीं बिहार में अररिया लोक सभा सीट पर हुए उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भाजपा-जदयू के उम्मीदवार को हराया है. इस नतीजे ने दिखाया कि जो सच में प्रभावशाली पार्टियां हैं, उनका गठबंधन किस तरह कारगर साबित होता है. इससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव में गठबंधन की यही ताकत राजद और जदयू साबित कर चुके हैं.

इन नतीजों का एक बड़ा हासिल यह भी है कि ईवीएम से छेड़छाड़ के आरोप कुछ ज्यादा ही बढ़चढ़े हैं और भारत में चुनाव प्रक्रिया तकरीबन निष्पक्ष है. आखिर में इन नतीजों का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यही है कि 2019 का आमचुनाव भाजपा के लिए 2014 की तरह आसान नहीं रहने वाला. (स्रोत)